यूरोप में शरणार्थियों की दुखद परिस्थिति – 31 अगस्त 2015

समाचार

पिछले कुछ हफ्तों से मुझे बड़ी संख्या में बेहद विचलित और विक्षुब्ध कर देने वाले समाचार मिल रहे हैं-क्योंकि लाखों लोग तकलीफ झेल रहे हैं।

कहा जा सकता है कि यूरोप में शरणार्थियों की बाढ़ आई हुई है। यह भी कहा जा सकता है कि कुछ देशों में लंबे समय से चले आ रहे खराब हालात अब चरम पर पहुँच गए हैं और लाखों लोग अपने घर-बार और देश छोड़कर, जहाँ सिर समाए भाग निकलने को मजबूर हो चुके हैं। और वही लोग अब यूरोप पहुँच रहे हैं, अक्सर बड़े खतरनाक रास्तों से और बेहद तकलीफदेह यात्राएँ करके। सिर्फ शरणार्थियों की विशाल संख्या ही यूरोपीय देशों को प्रलयंकारी नज़र आ रही हैं। और इसलिए शरणार्थी आवास, अस्थाई कैंप, व्यायामशालाएँ, टाउनहॉल, पुराने मालगोदाम, और ऐसी ही दूसरी तमाम जगहें लोगों से बजबजाई हुई हैं। सरकारें संघर्ष कर रही हैं कि प्रशासन तेज़ गति से काम करे और दफ्तरी औपचारिकताओं को जल्द से जल्द निपटाया जाए।

रिपोर्टों का अवलोकन करने, उनकी कहानियाँ पढ़ने और यह जानने के बाद कि वे लोग किन बदतरीन स्थितियों से गुज़र रहे होंगे, आप अवसादग्रस्त हो जाते हैं कि इस तरह की चीज़ें वर्तमान में, आज की दुनिया में भी संभव हैं। परिवार, जिन्होंने यह यात्रा साथ-साथ शुरू की थी, बीच रास्ते में इधर-उधर बिखर गए। अभिभावक अपने बच्चों की खोज में लगे हुए हैं, पति अपनी पत्नियों को ढूँढ़ रहे हैं। दूसरे बहुत से हैं, जो जान गए हैं कि अब अपने रिश्तेदारों को ढूँढ़ना व्यर्थ है, वे अब ज़िंदा नहीं बचे हैं।

वे सैकड़ों, हजारों मील लंबा रास्ता पैदल चलकर आए हैं। उनमें से बहुत से उस भयानक जहाजों और नावों में सवार थे और किसी तरह भूमध्य सागर पार करने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन बहुत सी नावें बीच समुद्र में डूब गईं, अर्थात उनमें सवार हजारों लोग निश्चित ही मारे गए। पिता अपने बेटों और बेटियों को डूबता देखता रह गया-उन्हें अमानवीय दैत्यों ने जहाज़ से उठाकर बाहर फेंक दिया, जबकि सुरक्षित उस पार पहुँचाने की एवज में वे पहले ही बहुत बड़ी रकम ले चुके थे।

दलाल, बिचौलिये, गुंडे, अपराधी, सभी उन लोगों का शोषण कर रहे हैं, जो पहले ही युद्ध और अपने देशों के तानाशाहों की प्रताड़ना से बुरी तरह टूट चुके हैं, अपने धर्म और अपनी जाति के कारण आतंकियों के ज़ुल्मों सितम झेल चुके हैं। इस आशा में कि उन्हें कहीं कोई शांतिपूर्ण, सुरक्षित जगह रहने को मिल पाएगी- कहीं न कहीं, कहीं भी, थोड़ी सी जगह – वे यह भयंकर शोषण, मारपीट, अपमान सहन करते चले जा रहे हैं और अंततः यूरोप के किसी अजनबी हाइवे पर किसी ट्रक के पीछे दम घुटने से मारे जा रहे हैं या और भी कई तरह से मृत्यु का खतरा उठा रहे हैं।

वे काँटेदार तारों की बाड़ लांघकर या नीचे से निकलकर सीमा पार करते हैं। बिना टिकिट ट्रेनों में चढ़ जाते हैं। वे गैरकानूनी रूप से सुरंग के भीतर प्रवेश कर जाते हैं और समुद्र के नीचे 50-50 किलोमीटर पैदल चलकर किसी न किसी तरह उस पार निकल जाते हैं। वे पहले से खुद ही गैरकानूनी हो चुके हैं, उनमें अब कोई शक्ति नहीं बची है, प्राणों के सिवा वे अपना सब कुछ खो चुके हैं और क्वचित ही किसी का कोई रिश्तेदार बचा है। इससे बुरा और क्या हो सकता है?

ओह! क्या ऐसा भी हो सकता है! दुर्भाग्य से यह सच सिद्ध हो रहा है: जब उन्हें वादे के मुताबिक़ किसी जगह पर पहुँचा दिया जाता है कि अब वे वहाँ रह सकेंगे, कागज़ी कार्यवाहियाँ चल रही हैं, शायद वीजा मिल जाएगा, मामूली रोज़गार करने की इजाज़त मिल जाएगी, सम्भव है, शरण भी मिल जाए- तभी उनका सामना लोगों की भीड़ से होता है, जो उनके अस्थाई आवासों के सामने आंदोलन कर रहे होते हैं, नारेबाज़ी कर रहे होते हैं, उन्हें उनका वहाँ होना पसंद नहीं है! उनके आबाद होने से पहले ही, उनके सामने कुछ लोगों ने उनके घरों में आग लगा दी है! सुना है, लोग सड़कों पर निकल आए हैं और उन्हें निकाल बाहर करने की मांग कर रहे हैं- उनकी उपस्थिति उन्हें पल भर के लिए भी बर्दाश्त नहीं है!

इतनी दूर बैठकर भी ये समाचार देखकर मेरा मन दुःख और अवसाद से भर उठता है, कि हालत यहाँ तक पहुँच गई है! बहुत से लोगों के जीवन में न सिर्फ इतना भयानक परिवर्तन आया हुआ है बल्कि उसने उन्हें बरबाद कर दिया है, वे परिस्थितियों के ग्रास बन रहे हैं, मर-खप रहे हैं! इतनी बड़ी संख्या में लोग भीषण दुःख उठा रहे हैं, जबकि कुछ लोगों ने अपने लिए आवश्यकता से अधिक सरंजाम इकठ्ठा कर रखा है!

और बहुत से लोग हैं जो उनके विरुद्ध अपमानजनक नारे लगा रहे हैं, अखबारों में लेख लिख रहे हैं, आंदोलन कर रहे हैं कि इन पीड़ित, मार खाए लोगों को वे बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह आश्चर्यजनक है, मेरी कल्पना से बाहर की बात है!

लेकिन अंत में आशा की किरण भी दिखाई देती है, लंबी अँधेरी गुफा के बाद प्रकाश चमक रहा है क्योंकि और भी लोग हैं- ऐसे लोग, जो अलग तरह से सोचते हैं, जिनकी इंसानियत अभी मरी नहीं है, वे मदद का हाथ बढ़ा रहे हैं! लेकिन उनके विषय में मैं कल लिखूँगा।

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