अगर आप आध्यात्मिक परिदृश्य के मध्य रहते हैं या आत्मसुधार की पुस्तकों आदि में रुचि रखते हैं तो आपने उस सिद्धांत के बारे में पहले ही पढ़ रखा होगा या उसके बारे में किसी से सुना होगा जिसके अनुसार दूसरे आपको आपका ही आईना दिखा रहे होते हैं। अक्सर इस सिद्धांत को खींच-खाँच कर काफी दूर तक ले जाया जाता है-मेरे हिसाब से, कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही-लेकिन इस बात में काफी हद तक सत्यता भी है। सिर्फ एक दृष्टिकोण से: जब हम किसी समूह में या कुछ लोगों के साथ होते हैं तो हम आसानी के साथ खुद अपना व्यवहार बदलकर दूसरों के साथ सामंजस्य बिठा लेते हैं और दूसरों जैसे दिखाई देने की कोशिश करते हैं। स्वाभाविक ही, हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम किस प्रकार के रवैये को स्वीकार कर सकते हैं और किसे नहीं!
संभव है आपने खुद इसे नोटिस किया हो या न भी किया हो। आप अपने दिन का एक हिस्सा अपने काम में खर्च करते हैं, एक हिस्सा अपने परिवार के साथ और शायद एक और हिस्सा अपने दोस्तों के साथ। इस तरह आपके आसपास अलग-अलग समय पर शायद दो या तीन तरह के लोगों का समूह होता है-और उनके साथ भिन्न तरह का व्यवहार करते हैं, न सिर्फ इसलिए कि हर बार समय की प्रकृति भिन्न होती है बल्कि इसलिए भी कि हर बार वे भी भिन्न-भिन्न तरह से व्यवहार कर रहे होते हैं और आप उनके व्यवहार के साथ अपने व्यवहार का सामजस्य बिठाते हैं।
उदाहरण के लिए अगर आपके कार्यालय का रवैया नकारात्मक है तो आप पाएँगे कि आपके सहकर्मी बहुत अधिक शिकायत करते हैं। जब आप यह बात नोटिस करते हैं, तत्क्षण आपको याद आता है कि आप भी यही करते हैं! क्यों? क्योंकि यह आपके कार्यालय का सामूहिक रवैया है! एक समूह में हम दूसरे सभी लोगों की स्वीकृति चाहते हैं और इसलिए, जान-बूझकर भले न करते हों मगर, हम दूसरों की नकल कर रहे होते हैं। वे कुढ़ते हैं? हम भी कुढ़ते हैं। और नकारात्मकता के मामले में यह नीचे, और नीचे खींचने वाला भँवर बन जाता है! जब आप इसे नोटिस कर लेते हैं तब कह सकते हैं कि वे आपको आईना दिखा रहे हैं या आप यह भी कह सकते हैं कि आपने माहौल के साथ तालमेल बिठा लिया। लेकिन कुछ भी हो, आपको अधिकाधिक सकारात्मक बने रहने की कोशिश करनी चाहिए।
यही बात सकारात्मक तरीके से भी होती है। अगर आप सकारात्मक लोगों के बीच रहते हैं तब भी आप उनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकते। अगर आपके आसपास के लोग सकारात्मक हैं तो आपके लिए भी सकारात्मक होना बहुत आसान हो जाता है! हँसते-बोलते, चुटकुलेबाज़ी करते हुए, मौज-मस्ती करते हुए-जो लोग ऐसा करते हैं, उनके साथ यह सबसे बढ़िया होता है!
इसका अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि दूसरे आप पर कोई प्रभाव डाल रहे हैं और इसका यह अर्थ भी नहीं है कि अगर आप किसी नकारात्मक व्यक्ति से मुलाक़ात करते हैं तो आप बहुत ज़्यादा नकारात्मक हो जाते हैं। इसका सिर्फ इतना अर्थ है कि आपके आसपास उपस्थित लोगों पर आपका भी काफी तगड़ा असर हुआ है, विशेष रूप से उन पर, जिनके साथ आप दिन का अधिकाधिक समय गुज़ारते हैं!
इसलिए चाहे आप काम कर रहे हों, चाहे घर पर हों या दोस्तों के साथ समय बिता रहे हों- सकारात्मक बने रहने पर ध्यान दें और तब आप उनकी नकारात्मकता के साथ तालमेल बिठाने से बचते हुए अपनी सकारात्मकता से उन्हें प्रभावित कर पाएँगे!
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