कल मैंने सकारात्मक या नकारात्मक नज़रिए के बारे में संक्षेप में लिखते हुए बताया था कि कैसे वह आपके जीवन को प्रभावित कर सकता है या नहीं कर सकता। क्या कभी किसी ऐसे व्यक्ति से आपका सामना हुआ है जो इतना अधिक नकारात्मक है कि किसी भी स्थिति में संतुष्ट नहीं रह सकता? जहाँ तक मेरा सवाल है, मुझे कई बार ऐसे लोग मिले और मेरा दावा है कि उनके लिए आप कुछ भी कर लें, वे कभी संतुष्ट नहीं हो सकते-क्योंकि सकारात्मकता भीतर से आती है!
इसलिए स्वभाव से ही ऐसे लोग जीवन में किसी ऐसी वस्तु की तलाश में होते हैं जो उन्हें संतोष प्रदान कर सके। अपने व्यक्तिगत सलाह-सत्रों में मैं ऐसे कई लोगों से मिला हूँ और समय-समय पर हमारे आश्रम के कई अतिथियों से भी। जो व्यक्ति किसी भी सेवा क्षेत्र के उद्यम से जुड़ा है, जानता होगा कि ऐसे लोग सबसे अक्खड़ और तकलीफदेह ग्राहक साबित होते हैं!
अब यह कोई ज़रूरी नहीं है कि ऐसे लोग भले व्यक्ति नहीं हो सकते, कि वे अक्सर बहुत कुत्सित या बुरे इंसान ही होते हों या आपका बुरा चाहने वाले हों या आपको ही बुरा व्यक्ति समझते हों! स्वाभाविक ही, ऐसे लोग भी हो सकते हैं लेकिन मैंने अक्सर देखा है कि यह कोई नियम नहीं है कि ऐसा ही हो! वास्तव में वे अपने स्वभाव से मजबूर होते हैं, वे भीतर से ही ऐसे होते हैं कि हर वक़्त शिकायत करते रहें, हर बात में नकारात्मकता की तलाश में रहें और किसी भी स्थिति में सुखी और संतुष्ट न हों!
उदाहरण के लिए, एक बार हमारे आश्रम में एक आस्ट्रेलियाई महिला आई, जो अपने पूरे मुकाम के दौरान कोई न कोई नकारात्मक बात ढूँढ़ती ही रहती थी। उसके यहाँ पहुँचते ही हमने उसकी यह आदत भाँप ली। क्योंकि मैं इत्तफाकन बाहर ही था, जैसे ही उसकी कार आश्रम पहुँची, मैंने ही उसका स्वागत किया। अधिकतर लोग लंबी यात्रा के बाद किसी ठिकाने लगने पर प्रसन्न ही होते हैं और सोचते हैं कि देखें, आगे क्या-क्या नया देखने को मिलता है लेकिन उसके साथ तत्क्षण मुझे प्रतीत हुआ कि यह महिला वैसी प्रसन्नचित्त महिला नहीं है-उसी पल मुझे उसके चेहरे पर यह लिखा दिखाई दे रहा था।
उसे खुश करने के लिए हमने वह सब किया, जो कर सकते थे-लेकिन उसे खुश करने में सफल नहीं हो सके। जब बाज़ार में वह साफ़-सफाई के सामान की दुकान खोज नहीं पाई तो उसे उसकी मर्ज़ी का सारा सामान उपलब्ध कराने से लेकर उसके संपूर्ण विश्रांति कार्यक्रम में परिवर्तन करने तक, हमने सब कुछ आजमाया मगर अफसोस…
मैं घटनाओं के विस्तार में नहीं जाना चाहता किंतु आप कल्पना कर सकते हैं-वे कोई महत्वपूर्ण मामले नहीं थे याकि ज़रूरी चीजें नहीं थीं, पहले किसी अतिथि को उनसे कोई दिक्कत नहीं हुई थी और कुछ वस्तुएँ उसके देश में उपलब्ध उन्हीं वस्तुओं से सिर्फ देखने में अलग थीं और सिर्फ इसीलिए वे उसके काम नहीं आ सकती थीं।
मज़ेदार बात यह कि सिर्फ भारत में मौजूद परिस्थितियाँ ही उसकी परेशानी का सबब नहीं थीं या सिर्फ भारतीयों से ही उसे परेशानी नहीं थी! वास्तव में प्रकृति से ही उसे किसी भी बात से खुश न होने की आदत थी यानी यह उसकी स्वभावगत विशेषता ही बन गई थी। और इस स्वभाव में बाहर से कोई सुधार संभव नहीं था। आप कितनी ही खूबसूरत जगह चले जाएँ, आपको अगर उसमें नुस्ख ही देखना है तो वही आपको नज़र आएगा! आप अच्छे से अच्छा खाना सामने रख दें, अच्छे से अच्छे कपड़े या ज़रूरी सामान ले आएँ या चर्चा करने के लिए एक से एक जानकार लोगों को बिठा दें-उन्हें संतुष्टि न मिलनी है, न मिलेगी।
अगर उपरोक्त वर्णन में आपको अपनी थोड़ी भी झलक दिखाई देती है तो जान लीजिए कि खुश रहने के लिए खुद आपको ही अपने आप में बदलाव लाना होगा! मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कभी-कभी आप कितना अधिक दुखी महसूस कर सकते हैं कि न जाने क्यों कोई बात ठीक हो ही नहीं रही है। आप अच्छे व्यक्ति हैं, आसपास के लोग अच्छे हैं और कोई घटना भी ऐसी नहीं हुई है जिसे दुखद कहा जा सके। तो इन बातों पर गौर करें और समझें कि आपको भीतर से बदलने की ज़रूरत है! यह लंबा काम हो सकता है और कभी-कभी कठिन भी, लेकिन आप ऐसा कर सकते हैं!
मैं अपने जीवन में सदा खुश रहा हूँ और मुझे चीजों को सकारात्मक रोशनी में देखना पसंद है। कृपया मेरे इस नज़रिये के साझीदार बनें। अगले कुछ दिन मैं आपको बताऊँगा कि यदि आप भी ऐसे लोगों के बीच रहते हैं तो आप क्या कर सकते हैं-और हम ऐसी परिस्थितियों से पल्ला झाड़ने के लिए क्या करते हैं।
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