क्या करें जब आपको नकारात्मक लोगों की संगत में रहना पड़े? 4 नवंबर 2015

नकारात्मकता

दो दिन पहले मैंने आपको उन लोगों के बारे में बताया था जो भीतर से ही बेहद नकारात्मक होते हैं, इतने कि उन्हें किसी हालत में संतुष्ट नहीं किया जा सकता। कल मैंने बताया कि हमारे आश्रम आने के इच्छुक लोगों के बारे में हम पहले से पता करने की भरसक कोशिश करते हैं कि वह अपने निवास के दौरान हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं, जिससे ऐसी स्थितियों से बचा जा सके। लेकिन ऐसा हो ही जाता है कि ऐसे लोग हमारे यहाँ प्रवेश पा जाएँ। हम उनसे किस तरह निपटते हैं और जब आप अपने आपको ऐसे अत्यंत नकारात्मक लोगों के बीच पाएँ तो आप क्या कर सकते हैं।

सेवा क्षेत्र के उद्यमी होने के नाते इसे हम अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं कि अपने हर ग्राहक को संतुष्ट करें। यह एक बहुत रूखा वाक्य लगता है लेकिन यही सच है: जब हमारा काम ही है कि हम अपने आश्रम में लोगों के ठहरने की व्यवस्था करें तो चाहते हैं कि आश्रम आने वाला हर ग्राहक हमसे संतुष्ट हो! यह एक खुली दुकान की तरह है, हम उसका विज्ञापन भी करते हैं और सामान्यतया वह सबके लिए खुली है। और इसीलिए हम सभी को पूरी तरह संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं।

उन लोगों के साथ भी, जो हमेशा नकारात्मक रवैया रखते हैं, हम संपूर्ण व्यावसायिक कौशल और सत्यनिष्ठा के साथ पेश आते हैं। हम उन्हें भी संतुष्ट करने की पूरी कोशिश करते हैं, उनसे फीडबैक लेते हैं, उनकी हर तरह की मांग पूरी करने का प्रयास करते हैं। लेकिन जो लोग नकारात्मक होते हैं, हर बात में नुख्स निकालना जिनकी आदत होती है, वे हमेशा नकारात्मक ही बने रहना चाहते हैं। जब हमें महसूस होता है कि उन्हें संतुष्ट करना किसी भी हाल में संभव नहीं है, कि खुश होने के लिए उन्हें स्वयं बदलने की ज़रूरत है तो हम अपनी रणनीति बदल देते हैं।

स्वाभाविक ही, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सामने वाले के साथ आपके संबंध कैसे हैं-कि उसे संतुष्ट और प्रसन्न करने के लिए आपको इतनी ज़हमत उठाने की ज़रूरत है भी या नहीं। अगर ऐसे लोगों के साथ रहने की मजबूरी पेश आ ही गई है तो भरसक उनसे वाद-विवाद से बचने की कोशिश करें। ऐसी स्थिति पैदा न होने दें जहाँ सामने वाला बहुत परेशान हो जाए। वे क्या कह रहे हैं, सुनें और जहाँ सहमत होने की संभवना हो, अपनी सम्मति दें। अगर सहमत न हों तो प्रखर रूप से अपना विरोध प्रकट करने की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ सुनें-जब बहुत ज़रूरी हो तभी अपना मत प्रकट करें। आप पहले से ही जानते हैं कि हर बात में नकारात्मक होने की उनकी आदत है इसलिए शांत और संयत बने रहें और उन्हें जो कहना है, कहने दें।

निश्चित ही, आप कह सकते हैं कि इससे, स्वाभाविक ही, बातचीत में कमी आ जाती है। आप जानते हैं कि कुछ भी पूछने से कुछ निकलकर नहीं आने वाला है इसलिए सामने वाले से आप पूछने में भी घबराते हैं कि उसके क्या हालचाल हैं। आप प्रश्न पूछना कम कर देते हैं लेकिन जो थोड़ी बहुत प्रसन्नता और संतुष्टि या आपसी समझ बची रह गई है, उसे बचाए रखने के लिए आप गुड मॉर्निंग, गुड ईवनिंग जैसा सामान्य औपचारिक वार्तालाप जारी रखते हैं।

इसके बावजूद सामने वाला असंतुष्ट या नाखुश होने के लिए कोई न कोई बात ढूँढ़ ही सकता है। ऐसे लोग सिर्फ इस बात पर दुखी हो सकते हैं कि दूसरे इतने खुश क्यों हैं। वास्तव में यह उनके लिए खुश होने का एक मौका सिद्ध हो सकता है-लेकिन मौके का लाभ उठाने के स्थान पर वे पछताने का मौका ढूँढ़ते हैं कि दूसरे खुश क्यों हैं।

जैसा कि मैंने कहा, खुश रहने में आप उनकी मदद कर ही नहीं सकते। जैसी भी परिस्थिति हो, आपको सिर्फ उसे स्वीकार करने की ज़रूरत है और संयत रहने की। पहले भी आप ऐसे लोगों से मिल चुके होंगे और मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि यह आगे भी होता रहेगा। कुछ समय के लिए आपके रास्ते मिलेंगे लेकिन एक दिन आएगा जब आप अपने-अपने अलग रास्तों पर चल पड़ेंगे।

आपके लिए भी यह एक मौका है कि चीज़ें या परिस्थितियाँ जैसी भी हों, उन्हें आप स्वीकार करना सीखें-बिना उन पर अधिक परेशान हुए!

Leave a Comment