जहाँ तक हो सके, नकारात्मक लोगों से दूर रहें – 3 नवंबर 2015

कल मैंने उन लोगों की चर्चा की थी, जिन्हें संतुष्ट करना वास्तव में असंभव कार्य है क्योंकि वे अंदरूनी तौर पर भयंकर रूप से नकारात्मक होते हैं। इस प्रकार वे न सिर्फ खुद हर वक़्त दुखी रहते हैं बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी दुखी कर देते हैं। जैसा कि मैंने बताया, हालांकि कभी-कभार ही हुआ है, लेकिन आश्रम में हमारा पाला भी ऐसे नकारात्मक लोगों से पड़ता रहा है। कभी-कभार ही क्यों? क्योंकि हमारे यहाँ आने के इच्छुक लोगों के साथ अपनी ईमेल चर्चाओं में ही हम यह जान लेने की कोशिश करते हैं कि हम उन्हें संतुष्ट कर पाएँगे या नहीं।

सामान्यतया हमारे यहाँ आने के इच्छुक लोग ईमेल द्वारा हमसे संपर्क करते हैं। जो लोग हमारे साथ आश्रम में रहना चाहते हैं, हमसे तरह-तरह के प्रश्न पूछते हैं और हम अपने प्रस्तावित विश्रांति कार्यक्रमों की और पर्यटन व्यवस्था संबंधी जानकारियाँ देते हुए उन्हें प्रत्युत्तर भेजते हैं। अपने ईमेल संदेशों में ही ज़्यादातर लोग यह साफ बताते हैं कि वे क्या चाहते हैं और हमसे उन्हें क्या अपेक्षाएँ हैं-अगर वे नहीं बताते तो हम ही उनसे साफ़-साफ़ पूछ लेते हैं। हम उन्हें स्पष्ट कर देते हैं कि हम कौन हैं और कैसे लोग हैं, कि हम ईश्वर या धर्म पर विश्वास नहीं रखते, कि हमारे आश्रम में कोई गुरु नहीं है और अधिकतर हम लोग समय की पाबंदी को लेकर पूरी तरह स्वतंत्र हैं, जैसे रात को कब सोना है या सुबह कब जागना है।

इतने से ही भगवद्भक्ति हेतु वृंदावन आने वाले, तीर्थयात्री टाइप के और गुरुओं की खोज में निकले लोग हमारी सूची से बाहर हो जाते हैं, जो या तो श्रद्धावश, ईश्वर की आराधना हेतु या फिर गुरुओं से आदेश प्राप्त करने वृंदावन आते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं, जिनकी कोई न कोई अपेक्षा होती है लेकिन उनका क्या किया जाए, जो सिर्फ नकारात्मक होते हैं और किसी ऐसी चीज़ की तलाश में होते हैं जो उन्हें सुखी और संतुष्ट कर सके?

लेकिन इमेल्स आपको ध्यान से पढ़ने होंगे। बल्कि, इमेल्स से अधिक आपको ईमेल पढ़ते हुए उनके बारे में होने वाली अनुभूति पर ध्यान देना होगा। कभी-कभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं होता लेकिन अक्सर आपसे बहुत से शंकालु प्रश्न किए जाते हैं, जिनसे आपको एहसास हो जाता है कि वह व्यक्ति दरअसल अभी से, आपको बिना जाने-पहचाने, बिना रूबरू मुलाक़ात किए, बिना पता किए कि आप क्या करते हैं, आपकी आलोचना कर रहा है।

अगर आपको शुरू में ही यह एहसास हो जाए कि कोई आपके साथ व्यर्थ ही नकारात्मक हो रहा है, जबकि वह व्यक्ति अभी हज़ारों मील दूर है, यदि आपको लगे कि आपको किसी बात पर अपनी सफाई देनी पड़ रही है और लगे कि इस व्यक्ति के साथ किसी वाद-विवाद में पड़ने से अच्छा होगा कि अपनी सामान्य, शांतिपूर्ण, कामकाजी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएँ और यह एहसास हो कि यह व्यक्ति समय गुज़ारने के लिए ठीक नहीं है। अपने घर पर लगातार कुछ हफ्ते रहने के लिए तो बिल्कुल नहीं, जब उसके साथ आपको सशरीर भी साथ रहना होगा!

ऐसे किसी भी मामले में उन्हें मना करने की हम पूरी कोशिश करते हैं। उनके साथ ईमेल पर हुई बातचीत के दौरान होने वाले अपने एहसासात पर गौर करते हुए और इस बात पर विचार करते हुए कि उस व्यक्ति को अपने आश्रम में आमंत्रित किया जाना आसान होगा या कठिन, हम बारीकी से परीक्षा करते हैं। हम जानते हैं कि हम हर व्यक्ति को खुश और संतुष्ट नहीं कर सकते। यह जीवन का एक सामान्य सच है और हम उसे स्वीकार करते हैं। लेकिन हम कोशिश करते हैं कि जिसे कोई भी खुश और संतुष्ट नहीं कर सकता, उसे आमंत्रित करके अपने लिए कठिनाई मोल न लें!

इन सभी भरसक कोशिशों के बाद भी कभी-कभी यह संभव नहीं हो पाता कि सिर्फ ईमेल के ज़रिए आप लोगों के मन की सारी बातें पढ़ सकें। अनुभव के साथ इस बात में महारत हासिल होती जाती है और अब क्वचित ही होता है कि कोई ऐसा व्यक्ति आश्रम का मेहमान बन सके लेकिन यह सामाजिक व्यवहार की सामान्य दैनिक उलझनें हैं और अब भी यह कभी-कभी हो ही जाता है।

तो क्या किया जाए अगर ऐसे किसी व्यक्ति के साथ आपका पाला पड़ ही जाए? कल के ब्लॉग में मैं इसी विषय पर लिखना चाहता हूँ।

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