कल मैंने आपको नकारात्मकता के बारे में बताते हुए आश्रम के सामूहिक आयोजनों में एक नकारात्मक व्यक्ति की उपस्थिति के प्रभाव के अपने अनुभवों का ज़िक्र किया था। मैंने इस बात का भी ज़िक्र किया था कि कैसे वे लोग दूसरों को बेचैन और अस्तव्यस्त कर देते हैं और उन्हें भी नकारात्मकता की ओर ले जाने में सफल हो जाते हैं। इस समस्या से निपटने के कुछ गुर भी मैंने बताए थे। एक मित्र ने इस पर यह टिप्पणी की: वास्तव में ऐसे नकारात्मक लोगों को अपनी नकारात्मकता का एहसास ही नहीं होता! वे सोचते हैं कि दरअसल वे इस क्रूर संसार द्वारा उत्पीड़ित व्यक्ति हैं!
यह सच है। उनकी नकारात्मकता उन्हें अंधा कर देती है और वे यह तथ्य जान नहीं पाते कि यह नकारात्मकता उन्हीं के अन्दर से आ रही हैं। सभी उस मुहावरे को जानते हैं कि आप किसी आधे भरे गिलास को आधा भरा या आधा खाली कह सकते हैं। ये लोग हमेशा गिलास को आधा खाली कहते हैं और यह नहीं देखते कि वह आधा भरा हुआ भी है। वे इसी तरह सोचने के आदी हो चुके होते हैं और समझ नहीं पाते कि ऐसा करते हुए वे खुद कितना नकारात्मक व्यवहार कर रहे हैं।
इसके विपरीत वे दुनिया पर इसका दोष मढ़ते हैं कि वह उनके साथ ज्यादती कर रही है! वे अपने आपको पीड़ित समझने लगते हैं और सोचते हैं कि दूसरे सभी कितना अच्छा जीवन जी रहे हैं और उनके भाग्य मे ऐसा बदनसीब जीवन बदा है। सारे लोग मुझ पर नाराज़ क्यों हैं, क्यों मेरा बुरा चाहते हैं और मुझसे लड़ते-झगड़ते रहते हैं? मैं दूसरों की तरह खुश क्यों नहीं रह सकता?
वे यह समझ ही नहीं पाते कि वे नकारात्मक चश्मे से दुनिया को देख रहे हैं! और इसलिए कोई उनकी मदद को आगे नहीं आता। अपनी नकारात्मकता का मुक़ाबला करने के लिए उन्हे स्वयं अपने रवैये में परिवर्तन करके खुद अपनी मदद करनी होगी।
दुर्भाग्य से वे अपने आपको पीड़ित घोषित करने की आदत का शिकार हो जाते हैं और फिर उस बनावटी पीड़ा का मज़ा लेते रहते हैं। यह अनुभूति उनके लिए इतनी आह्लादकारी होती है कि वे उससे बाहर आना ही नहीं चाहते! सहानुभूति पाने के लिए वे ऊंचे स्वर में शिकायत करते रहते हैं और खुले आम अपनी पीड़ा की घोषणा करते रहते हैं।
दुर्भाग्य से यह भी ज़्यादा समय तक कारगर नहीं होता! कल्पना कीजिए कि आपका ऐसा कोई दोस्त आपके आसपास पूरे समय मंडराता रहे। कुछ समय तो आप सोचेंगे कि वाकई इसके साथ नियति ने बुरा मज़ाक किया है और उस पर दया करेंगे। लेकिन कुछ वक़्त बीतने के बाद आप नोटिस करेंगे कि यह व्यक्ति हर वक़्त शिकायत ही करता रहता है और अपनी हालत को बदलने के लिए कोई खास प्रयास नहीं करता! ऊपर से उसे कोई अच्छी सलाह दो तो वह उसे अनसुना करता है। उसके जीवन के वास्तविक दुखों को दूर करने के उपायों के बारे में चर्चा उसे पसंद ही नहीं है। वे चाहते हैं कि आप भी उनके लिए सिर्फ रोएँ, उनके दुर्भाग्य का इलाज करने की कोशिश भी न करें! वे सिर्फ आपका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना चाहते हैं-बहाना है उनका दुर्भाग्य! अगर वे अपने दुर्भाग्य से बाहर निकलना ही नहीं चाहते तो उनके मित्र धीरे-धीरे उनका साथ छोड़ते चले जाते हैं और आखिर में वे अकेले पड़ जाते हैं।
तो आप जब भी इस बात का अहसास करें कि आप में नकारात्मकता प्रवेश कर गई है या आप दूसरों से अपने लिए दया की अपेक्षा रखते हैं और अपने आपको पीड़ित बताकर आपको अच्छा महसूस होता है तो समझ लीजिए कि आपको बिना देर किए उठ बैठना चाहिए अन्यथा यह बीमारी और बुरा रूप ले लेगी! आपके मित्र आपके लिए महत्वपूर्ण हैं? अगर हैं तो उनकी बातों पर कान दीजिए और अपने जीवन में आने वाली खुशियों का स्वागत कीजिए, उनका आनंद उठाइए! अपने आप पर दया करना बंद कीजिए! पीड़ित होने का ढोंग बंद कीजिए और इस बात पर ध्यान दीजिए कि आपका गिलास भी आधा भरा हुआ है!
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