क्या आपके ‘जीवन का सबसे खराब समय’ चल रहा है? उससे बाहर निकलिए! 9 सितंबर 2015

कल मैंने आपको एक आस्ट्रियन मित्र के बारे बताया था, जिसने मुझे फोन पर अपनी एक समस्या के बारे में बताया, जिस पर वह अपने करीबी मित्रों के साथ चर्चा नहीं कर सकता था। चर्चा के दौरान किसी बिन्दु पर उसने कहा कि जिन परिस्थितियों से वह अभी गुज़र रहा है, वह उसके जीवन का सबसे अशुभ समय है। अपने जीवन में न जाने कितनी बार मैं ये शब्द सुन चुका हूँ। मेरे सलाह-सत्रों में अक्सर लोग इस ‘अशुभ समय’ की चर्चा करते हैं और इसलिए मैंने सोचा, आज के ब्लॉग में कुछ पंक्तियाँ इसी विषय पर लिखी जाएँ- इन परिस्थितियों पर और उनसे उपजी अनुभूतियों पर।

जब भी आपको लगे कि आप ऐसी किसी परिस्थिति से गुज़र रहे हैं तो सबसे पहले उसे ठीक-ठीक जान-समझ लें। जब आपको पूरी तरह विश्वास हो जाए कि आप ‘जीवन के सबसे खराब समय’ से गुज़र रहे हैं, तभी आप शांतिपूर्वक चीजों को तब्दील करने का उपाय कर सकते हैं।

ऐसी परिस्थिति तब उत्पन्न होती है, जब जीवन में अचानक, अनपेक्षित और अप्रत्याशित परिवर्तन आते हैं; जब ऐसी बातें होती हैं, जिनसे निपटने की तैयारी आपने नहीं की होती, आपके पास सोचने का इतना समय ही नहीं होता कि इस परिस्थिति का मुक़ाबला कैसे किया जाए। कोई अपघात, बीमारी, प्राकृतिक आपदाएँ, अपने किसी प्रियकर की मृत्यु, नौकरी छूटना, जीवनसाथी, रिश्तेदारों या मित्रों से संबंध-विच्छेद या परस्पर संबंधों में छल-कपट का अंदेशा। स्वाभाविक ही, इनमें और भी बहुत सी बातें जोड़ी जा सकती हैं लेकिन मूल बात यह है कि ये बातें आपको निराश करती हैं, आप दुखी और इतने अवसाद-ग्रस्त हो जाते हैं कि आपका मस्तिष्क कोई सकारात्मक बात सोच ही नहीं पाता। अक्सर ऐसा इसलिए होता है कि कई चीज़ें, एक के बाद एक, बहुत तेज़ी से घटित होती हैं और वास्तव में सोचने का समय ही नहीं मिल पाता।

जिस किसी भी घटना के कारण आप उन परिस्थितियों से दो-चार हो रहे हों, उस पर ठहरकर समग्र विचार करें। समझने की कोशिश करें कि इस परिवर्तन का या इस परिस्थिति का ठीक-ठीक कारण क्या है और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करें। थोड़ा सा समय इस दुख को दें क्योंकि जिसके खोने का दुख आपको हो रहा है या जो तकलीफ आपको पहुँची है, उसका बाहर निकलना आवश्यक है। यह पूरी तरह सामान्य बात है और आपको इस भावनात्मक दौर से गुज़रना ही होगा। और उसके बाद आप उससे बाहर निकल आएँ।

सुनने में आसान लगता है न? लेकिन अमल में लाना मुश्किल है! क्योंकि उसके प्रति आपका रवैया गलत है! असल में लोग उसकी छोटी-मोटी बातों के विस्तार को पीछे छोड़ना नहीं चाहते। वे उसके मामूली 'अगर-मगर' में उलझे रह जाते हैं- अगर यह होता तो क्या होता, वैसा होता तो अच्छा होता, आदि आदि- जबकि ये बातें उन्हें कहीं नहीं ले जातीं। वे घटनाओं के मुख्य हिस्सों को मन में दोहराते रहते हैं या किसी तरह उन्हीं पिछली बातों पर आने की कोशिश करते हैं और इस तरह वहीं गोल-गोल घूमते रहते हैं।

और जब अंततः समझ में आ जाता है कि यह संभव ही नहीं है, कितना भी संघर्ष या कोशिश कर लें, पीछे नहीं लौटा जा सकता तो अत्यंत निराश हो जाते हैं, अवसादग्रस्त हो जाते हैं। आप समय को वापस नहीं ला सकते, घटित हो चुकी बातों को अघटित नहीं किया जा सकता और अतीत के अपने कर्मों को आप बदलकर ठीक नहीं कर सकते। लेकिन जो हो चुका है, आपके सामने घटित हो रहा है, उस पर अपना सोचने का तरीका आप बदल सकते हैं, उस पर अपना नजरिया बदल सकते हैं-और इस तरह उस परिस्थिति से और उस पर अपने नकारात्मक सोच से पार पा सकते हैं।

जो हो चुका है, उसका विश्लेषण करने और उसे समझने के लिए आपको समय चाहिए। लेकिन एक समयांतराल के बाद आपको अतीत के बारे में सोचना छोड़ना ही होगा और यह समझना होगा कि आपके सामने, आगे एक नया सबेरा है। ये भावनाएँ और ये एहसासात ताउम्र नहीं रहने वाले हैं! अच्छा समय फिर आएगा और हमेशा से हम रोज़ सबेरे उठकर इसी दिशा में प्रयत्न करते हैं!

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