महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के लिए अपनी समलैंगिकता को स्वीकार करना ज़्यादा कठिन क्यों होता है! 18 मई 2014

मेरा जीवन

पिछले सप्ताह मैंने आपको बताया था कि सन 2006 में मुझे बहुत सी ऐसी महिलाओं से मिलने का मौका मिला था जो लम्बे समय तक और कई पुरुषों के साथ सम्बन्ध रखने के बाद अचानक महिलाओं के साथ हमबिस्तर होने लगीं। दूसरी तरफ वे समलैंगिक पुरुष, जिन्हें जानने का मुझे मौका मिला था, मुझे बताते थे कि वे जीवन में कभी भी महिलाओं की ओर आकृष्ट ही नहीं हुए। जबकि पिछले हफ्ते मैंने अपनी बात को महिला समलैंगिकों के नज़रिए पर केन्द्रित किया था, आज मैं पुरुष समलैंगिकों के रवैये और इस संबंध में उनके दृष्टिकोण से इस विषय पर चर्चा करूंगा।

सर्वप्रथम, मैं पुनः यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि हज़ारों लोगों से मिलकर बात करने के बाद मेरा यह व्यक्तिगत कार्यानुभव है। यह किसी वैज्ञानिक शोध पर आधारित नहीं है लेकिन जितने पुरुष समलैंगिकों से मैं मिला हूँ, उनमें से अधिकतर ने यही कहा कि: 'मैं शुरू से ही समलैंगिक रहा हूँ!'

वे मुझे बताते थे कि उन्होंने जीवन में कभी भी महिलाओं के प्रति आकर्षण महसूस नहीं किया और बचपन से ही वे अपने पुरुष मित्रों, सहपाठियों या आसपास के दूसरे पुरुषों की ओर आकृष्ट होते थे। बहुत पहले ही, अधिकतर किशोर होते-होते ही उन्हें इसका आभास हो गया था कि टीवी पर सुंदरियों और युवा फिल्म अभिनेत्रियों को देखकर वे अपने दूसरे हमउम्र मित्रों की तरह आकर्षित नहीं होते। स्वाभाविक ही, कुछ ऐसे प्रकरण भी सामने आए, जिनमें पुरुषों ने 'महिलाओं के साथ भी कोशिश की' मगर वह उन्हें 'अप्राकृतिक और अनुचित' लगता था। कुल मिलाकर, पुरुष समलैंगिकों ने महिलाओं के साथ हमबिस्तर होने का कोई अनुभव प्राप्त नहीं किया था। तब यह सवाल उठता है कि समलैंगिक पुरुषों से सुनी बातें महिला समलैंगिकों की बातों से इतनी भिन्न क्यों हैं।

यह भी संभव है कि वास्तव में पुरुष समलैंगिकों की संख्या हमारी जानकारी से काफी अधिक हो-क्योंकि बहुत से ऐसे पुरुष मजबूरन उभयलैंगिक संबंधों के साथ जीते होंगे! मुझे लगता है कि समलैंगिक और उभयलिंगी महिलाएँ अधिक बड़ी संख्या में अपने परम्परागत संबंधों से बाहर निकलकर खुले आम अपनी इच्छाओं और वरीयताओं का स्वीकार करती हैं।

मुझे लगता है कि समाज में महिलाओं के लिए समलैंगिक होना पुरुषों के समलैंगिक होने के मुकाबले अधिक आसान है। पुरुषों के लिए समलैंगिक होना उनके पौरुष पर कलंक जैसा है, कि वह मज़बूत, फौलादी जिस्म का मालिक नहीं है बल्कि एक नर्मो-नाज़ुक इंसान है। वह महिलाओं के दिलों पर छा जाने वाला इश्कबाज़ नहीं है बल्कि उनसे डरकर दूर भागता है। उन्हें लोगों के मज़ाक का केंद्र बनना पड़ता है और न सिर्फ समाज का बहिष्कार झेलना पड़ता है बल्कि कई बार कैरियर में आगे बढ़ने में रुकावटें आती हैं और नौकरी तक से हाथ धोने की नौबत पेश आती है और इस तरह वे आर्थिक रूप से कम सुरक्षित हो जाते हैं। इसके विपरीत, महिलाओं की बात अलग होती है। इस पुरुष-वर्चस्व वाले (पुरुष-सत्तात्मक) समाज में-और दुर्भाग्य से पश्चिमी समाजों में भी आज भी यह स्थिति बनी हुई है-एक महिला का किसी दूसरी महिला का चुम्बन लेना बहुत उत्तेजक और सेक्सी माना जाएगा जबकि किसी पुरुष का किसी दूसरे पुरुष का चुम्बन लेना बहुत बहुत फूहड़ माना जाता है। जहाँ उनका बॉस पुरुष है और जहाँ सारे पुरुष मित्र समलैंगिकों से घृणा करते हैं, वहां एक समलैंगिक पुरुष अपनी यौनेच्छाओं और यौन प्राथमिकताओं की ओर कदम भी रखना नहीं चाहेगा।

इसके अलावा, जैसा कि पिछले हफ्ते मैंने इशारा किया था, मैं मानता हूँ कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएँ आपस में एक-दूसरे के साथ ज़्यादा खुली होती हैं। वैसे भी वे अपनी सबसे विश्वस्त सहेलियों के साथ अपने सारे रहस्य साझा करती हैं और उनकी आपसी मित्रता पुरुषों के मुकाबले अक्सर बहुत ज़्यादा गहरी होती है। पुरुष अपने मन की बातें दूसरे पुरुषों के सामने उतनी आसानी से उजागर नहीं करते जितनी सहजता से महिलाएँ खोलकर रख देती हैं। शारीरिक खुलेपन की बात करें तो भी महिलाएँ एक-दूसरे के साथ ज़्यादा खुलकर सामने आती हैं! जिमों में (व्यायामशालाओं में), खेल के मैदानों, तरणतालों या ऐसी ही दूसरी जगहों में अक्सर महिलाओं को बिना किसी विशेष हिचक या शर्मो-हया के नहाते या कपड़े बदलते देखा जा सकता है। मेरे खयाल से, समाज में घुलने-मिलने की सहजता महिलाओं में पुरुषों के मुक़ाबले अधिक मात्रा में पाई जाती है। और इसलिए दो या तीन दशकों तक बिल्कुल अलग तरीके से रहने के बावजूद अपनी आतंरिक इच्छाओं को व्यक्त करना और अपनी वरीयताओं के अनुसार आगे बढ़ना उनके लिए अधिक आसान होता है!

लेकिन कुछ भी हो, मेरे संपर्क में आए लगभग सभी समलैंगिकों ने मुझे बताया कि उन्होंने अब अपने आप को पहचान लिया है। और मैं मानता हूँ कि यही बात महत्वपूर्ण और ज़रूरी है।

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