अपनी छुट्टियों में मैं होटल में रहना क्यों पसंद करता हूँ – 1 फरवरी 2015

मेरा जीवन

अब मैंने हर रविवार को अपनी निजी ज़िंदगी के बारे में कुछ न कुछ लिखने का फैसला किया है। क्रमबद्ध नहीं और हमेशा यह नहीं कि पिछले हफ्ते क्या हुआ बल्कि जो हुआ उसके बारे में विस्तार से, कि क्यों हुआ और मैंने उस पर क्या महसूस किया और अब भी क्या महसूस कर रहा हूँ। अपनी छुट्टियों के दौरान एक खास मामले में मैं किस बात को वरीयता देता हूँ, आज मैं इस विषय पर लिखना चाहता हूँ: वास्तव में मैं अपने किसी दोस्त के घर पर नहीं बल्कि किसी होटल में रुकना पसंद करता हूँ।

अपनी अमृतसर यात्रा में मैंने अपने एक मित्र से वास्तव में यही कहा था। हमने अपनी दो शामें उसके घर पर बिताई थीं और वह हमारा बहुत अच्छा सुखद समय रहा। जब हम वापस लौटने लगे तो घर की महिला ने हमसे कहा कि अगली बार जब हम वहाँ आएँ तो होटल की बजाय सोने के लिए उनके घर रुकें। तब मैंने ठीक यही जवाब दिया था: जब मैं छुट्टियाँ बिताने कहीं जाता हूँ तो अपनी पत्नी और बेटी के साथ मैं स्वतंत्र समय गुज़ारना चाहता हूँ।

यह जानकार आपको हँसी आती होगी क्योंकि आपने पहले पढ़ रखा है कि मैं कितनी जल्दी मित्र बना लेता हूँ और अक्सर उन्हें अपने घर पर बुलाता भी हूँ और बड़े प्रेम के साथ उनका स्वागत करके मुझे बड़ी खुशी होती है। लेकिन इसका ठीक-ठीक कारण यह है: हम हमेशा ही लोगों के बीच रहते हैं। निश्चय ही, हम खुद भी एक संयुक्त परिवार में रहते हैं लेकिन इसका अर्थ सिर्फ इतना ही नहीं है: अपने भाइयों, पिताजी, नानी और बच्चों के अलावा यहाँ हर वक़्त हमारे आसपास हमारे कर्मचारी, स्कूल के बच्चे और आश्रम आने वाले मेहमान भी होते हैं!

साल भर हमारे यहाँ मेहमान आते रहते हैं और अधिकतर हम उन्हें जानते नहीं होते। हम एक-दूसरे के साथ तालमेल बनाते हैं, हम एक दूसरे को जानने लगते हैं और स्वाभाविक ही इन सब के बीच हम थोड़ा-बहुत अपना निजी जीवन भी जीते हैं। और हम इसे पसंद करते हैं, हम वाकई ऐसा जीवन पसंद करते हैं।

लेकिन जब हम छुट्टियाँ बिताने कहीं बाहर जाते हैं तब बात कुछ अलग होती है। मैं किसी के घर पर नहीं रहना चाहता क्योंकि तब मैं अपनी पत्नी के कंधे पर सुकून का हाथ रखकर घूमना-फिरना छोड़कर हर किसी की भावनाओं का आदर करते हुए उनकी इच्छाओं का भार नहीं ढोना चाहता। या उनके साथ तालमेल बिठाऊँ कि जब वे सोकर उठें तब उठूँ, जब बाथरूम खाली हो तो नहा लूँ, आदि, आदि। मैं होटल पसंद करता हूँ, जहाँ मुझे आसपास मौजूद लोगों की भावनाओं या इच्छाओं का ध्यान न रखना पड़े।

आप मुझे गलत न समझें। इस बार भी जब हम अमृतसर में थे और तब भी जब और कहीं छुट्टियाँ बिताने जाते हैं, हम वहाँ रहने वाले अपने मित्रों से अवश्य मिलते हैं। हम उनके साथ काफी समय गुज़ारते हैं, उनके साथ उनके स्नेहासिक्त हाथों से बनाया हुआ भोजन करते हैं और घंटों गपशप करते हैं। वह हमारा बड़ा खुशनुमा समय होता है-लेकिन फिर भी रमोना, अपरा और मुझे एक साथ अपने होटल के एकांत में रहना भी बहुत पसंद है, अपने आप में मस्त!

तो जब मैं आपके शहर आऊँ और आपके यहाँ न रहूँ तो कृपा करके न तो आश्चर्यचकित हों और न ही अपमानित महसूस करें- मैं आपसे मिलकर बहुत खुश होऊँगा लेकिन रहना चाहूँगा वहीं-अपने होटल में!

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