पाश्चात्य लोगों का गुरु बनना – पश्चिम के आध्यात्मिक जगत का अनुभव – 27 जनवरी 2013

मेरा जीवन

मैं वर्ष 2005 में कई लोगों से मिला जो कि अलग-अलग जगहों, अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि और अलग-अलग रुचियों के व्यक्ति थे। वहां मैं कुछ ऐसे लोगों के सम्पर्क में आया जो कि स्वयं को आध्यात्मिक कहते थे और उनसे मिलकर मैंने यह महसूस किया कि वह खुद को गुरु समझते थे। सिर्फ भारत के ही गुरुओं से नहीं बल्कि आधुनिक और पाश्चात्य गुरुओं व उनके अनुयायियों से भी मिला। दरअसल वे लोग अपने आप को भारतीय गुरुओं के शिष्य मानते थे और उन्होंने अपना धन्धा शुरू कर दिया था, कुछ बिन्दुओं में वह अपने गुरुओं की नकल, व तौर-तरीकों का अभिनय भी करते थे। बहुत सी बातें है, पश्चिमी आध्यात्मिक लोग जिसमें विश्वास करते है, यह कुछ मेल नहीं खाता।

मैं भी एक गुरु की पृष्ठभूमि से था। मैंने इस पेशे को छोड़ दिया क्योंकि मुझे इस पेशे में एक बात नहीं अच्छी लगती कि गुरु अनुयायी बनाते है और मैं लोगों को अपना अनुयायी नहीं बल्कि मित्र बनाना चाहता हूं। मुझे यह भी पता चला कि कुछ पाश्चात्य लोग भारतीय गुरुओं के शिष्य हैं परन्तु मैंने हमेशा उन्हें गले से लगाया भोजन पर निमंत्रित किया और यह प्रयास किया कि हमारे बीच में कोई दूरी न रहे|

यह मेरे लिये सामान्य बात थी कि लोगों के खुद के गुरु थे। अकसर वे गुरु भारतीय होते थे परन्तु मैं उनसे परिचित नहीं होता था। मैं इस अवधारणा से पूर्व परिचित था ही इसलिए मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन किसका शिष्य है, बस मैं यह नहीं चाहता कि वो मुझे गुरु समझाने लग जाएँ|

हांलांकि एक बार मुझे अप्रिय भी लगा कि जिन लोगों के साथ मैं रह रहा हूं वह एक अलग दृष्टिकोण रखते हैं। मैं और भारत से मेरा संगीतकार तथा यशेन्दु, हम लोग अपने नये आयोजक के घर के लिविंग रूम में बैठे हुए थे। यह पुराना और बहुत ही बड़ा घर था और जो आयोजक थी वह एक महिला थी। वह महिला अकेले उस बड़े से घर में रहती थी। मेरा संगीतकार जो कि जर्मनी पहली बार आया था, उसने हमेशा से भारतीय लोगों की भीड़, संयुक्त परिवार वाले घर और हमेशा शोरगुल वाला माहौल ही देखा था और जब वह इस महिला के घर आया तो उसका सोचना बस यही था कि यह सच में बहुत ही वीरान जगह है जो वह पहली बार देख रहा है। वास्तव में वह डर गया था और उसे लग रहा था कि इस घर में कहीं कोई भूत तो नहीं।

हांलांकि हमारी आयोजिका भी इस विचार से हतोत्साहित नहीं थी, और उनका आत्मा, भूत-प्रेत और देवदूतों में पूरा विश्वास था। जब हम वहां थे तो मैं थोड़ा व्यस्त था और इन बातों पर ध्यान नहीं दे पाया। यद्यपि मैं भूतों की कहानियों और जिसको कभी देखा नहीं ऐसी किसी भी डरावनी चीज़ पर विश्वास नहीं करता तो मैंने इस विचार को बिल्कुल ही खारिज कर दिया और अपना काम करने लगा, नये-नये लोगों से मिलने लगा और उन्हें मित्र बनाने लगा।

उन लोगों में से बाद में एक मित्र ने मुझे बताया कि हम किस महिला के साथ रह रहे है क्योंकि मुझे जर्मन नहीं आती तो इसलिये मुझे पता भी नहीं चल पाता था कि जो लोग मेरे पास आते थे उनसे क्या बोला गया। सभी कुछ साधारण था, जब भी ध्यान (मेडीटेशन) होता था उस समय मोमबत्ती जलती थी और बहुत ही धीमे स्वर में संगीत बजता था जो कि बहुत अच्छा था। मैं भी लोगों के बजाय आयोजक से बात करता था और मैंने देखा कि वास्तव में लोगों को कार्यशाला, ध्यान (मेडीटेशन), अलग-अलग सत्रों से पहले शान्त कराना भी एक कला है।

बाद में मुझे पता चला कि यह औरत वास्तव में खुद को एक द्रष्टा (भूत, भविष्य जानने वाला) समझती है। मतलब वह महिला इस भ्रम में थी कि वह अदृश्य आत्माओं को देख सकती है जो कि अन्य लोग नहीं देख सकते और ये अदृश्य आत्माएं उस महिला को उसके परिवेश का रहस्य बताती थी। इसलिये यह महिला उन लोगों को वह सारे रहस्य बताती थी जो लोग मुझसे मिलने के लिये आते थे। इन बातों से लोगों में क्या छाप पड़ी होगी!

इसके अतिरिक्त, यह बात मैंने सिर्फ उस महिला के घर पर अनुभव नहीं की बल्कि अन्य जगहों पर भी की कि उन लोगों में इस बात को लेकर एक अहंकार था कि वह अदृश्य आत्माओं को देख सकते हैं। इसे मैं ‘आध्यात्मिक अहंकार’ कहने लगा जब मैंने ऐसे अनुभवों को महसूस किया कि लोग अपने इस झूठे ज्ञान के कारण अपने आप को सन्त समझने लगे हैं और किसी न किसी तरीके से खुद को अन्य लोगों से बेहतर समझते हैं और सोचते हैं कि लोगों को इस बात के लिये आभारी होना चाहिये कि वह अपने इस ज्ञान को लोगों में बांटते हैं। कुछ लोग उन्हें पसन्द करते है और ऐसे पाश्चात्य गुरुओं के अनुयायी होते है या फिर कुछ उन्हें त्याग देते थे।

वर्ष 2005 में मैं इन घटनाओं से व्यवहारिक रूप से सीख रहा था। मैंने इन सब तथाकथित आध्यात्मिक जगत को समझना शुरू किया कि इस भ्रम को और आत्माओं को कैसे ज़रिया बनाना है। पहली बार मैंने इस गूढ़ अहंकार का अनुभव किया और पहली बार मैंने पाश्चात्य गुरुओं के बारे में जाना। यह सब देखने के बाद मैंने यह निश्चय किया कि एक गुरु बनने का पेशा निश्चय ही मेरे लिये नहीं है।

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