जब दूसरे लोग आपको एहसास दिलाते हैं कि आप गरीब हैं! 13 जुलाई 2014

मेरा जीवन

मैं पहले ही बता चुका हूँ कि 2006 के यूरोप दौरे में एक बहुत अमीर मगर बेहद कंजूस आयोजक के साथ मेरा पाला पड़ा था। उस वक़्त मैंने इस व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक पड़ताल करने की कोशिश की थी लेकिन मुझे यह कहते हुए ज़रा भी संकोच नहीं है कि मेरे लिए किसी ऐसे व्यक्ति के साथ रहना आसान नहीं होता जो हर चीज़ को रुपए के तराजू पर तौलता है। यह कतई मेरा स्वभाव नहीं है!

हर चीज और बात को मैं पैसे से नहीं तोल सकता! मैं बहुत से ऐसे लोगों से मिल चुका हूँ जो पैसे के बारे में ही हर वक़्त सोचते रहते हैं और उनके लिए पैसा ही सब कुछ होता है। हर बात में कीमतों की तुलना की जाती है, आप अच्छा खाना नहीं खा सकते अगर वह कुछ महंगा है भले ही आप वैसा ही खाना खाने के आदी हों और इसके अलावा आपको हमेशा लगता रहता है कि आप हर चीज़ की ज़्यादा कीमत अदा कर रहे हैं!

मुझे लगता है कि इस कारण ऐसे लोगों के साथ आप हर वक़्त अपने आपको गरीब महसूस करते हैं। आप लगातार अनुभव करते हैं कि आपके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं कि जो चीज़ चाहें, खरीद सकें। हर मौके पर यह प्रश्न उपस्थित हो जाता है कि क्या आपके पास पर्याप्त पैसे हैं या जो वस्तु आप खरीदना चाहते हैं, उसकी कीमत वास्तव में अदा करने लायक है या नहीं, आदि आदि।

वास्तव में मैंने कभी भी इस तरह विचार नहीं किया था, चाहे मेरे और मेरे परिवार के पास भरण-पोषण के लिए और दूसरे खर्चों के लिए पर्याप्त पैसे हों या न हों। उस वक़्त भी जब हमारे पास ज़्यादा पैसे नहीं हुआ करते थे, मैं अपने आपको गरीब नहीं महसूस करता था। इसके विपरीत, मैं हमेशा अमीर ही रहा हूँ, चाहे मेरी गाँठ में कुछ हो या न हो!

ऐसे लोगों के साथ रहते हुए मुझे अजीब अरुचिकर अनुभूति होती थी कि मैं गरीब हूँ। ख़रीदारी करते वक़्त भले ही मैं पैसा चुकाने वाला होऊँ, चाहे मुझे स्वयं अपने लिए कुछ खरीदना हो, मेरे साथ आए व्यक्ति के मुँह से यह अवश्य निकलता कि आप यह चीज़ बहुत महंगी खरीद रहे हैं, इससे सस्ती मिल सकती है! जब मैं अपनी इच्छानुसार उसे मक्खन, ब्रेड आदि जैसी मामूली चीजों को खरीदने के बारे में कहता तब भी वह यही कहता: यह महंगा है।

मुझे लगा कि कह दूँ कि भाई मेरा पैसा है, मैं जानता हूँ कि यह महंगा है लेकिन मैं उसे खरीदने की क्षमता रखता हूँ, मुझे खरीदने दो! लेकिन मुझे पता था कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, वह आगे भी यही करता रहेगा क्योंकि यह उसकी आदत में शुमार है। इसलिए मैंने सिर्फ यह कहा कि भाई, मैं कुछ चीजों को, विशेषकर खाने-पीने की चीजों को खरीदते वक़्त सिर्फ उनकी गुणवत्ता देखता हूँ और कीमत पर ज़्यादा माथापच्ची नहीं करता।

इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं अंधाधुंध खर्च करता हूँ! लेकिन यह बात भी है कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो सही कीमत पर ख़रीदारी करने पर आपको अमीरी का एहसास कराते हैं!

तब मैंने यही निर्णय किया कि कभी-कभी लोगों की टिप्पणियों को अनदेखा करना ही श्रेयस्कर होता है। मैं तो सोच भी नहीं पाता कि ऐसी मानसिकता लेकर यानी गरीबी के एहसास के साथ लोग रहते कैसे हैं! मैं तो अमीर होने के एहसास का जी भरकर आनंद लेता हूँ!

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