जब मेरे भारतीय वादक को पश्चिमी शौचालय इस्तेमाल करने का तरीक़ा सीखना पड़ा – 6 जनवरी 13

मेरा जीवन

जब 2005 की गर्मियों और वसंत में मैं जर्मनी और यूरोप की यात्रा पर था, तब वहां के विभिन्न शहरों में लगने वाली कार्यशालाओं, आख्यानों और आध्यात्म के लिए मैंने योजनाएं पहले ही बना ली थी। जब मैं भारत में था तभी मोटे तौर पर मैंने इसका लेखा-जोखा तैयार कर लिया था और कार्यक्रमों को उसी अनुरूप होता देखकर मैं खुश था। जब यह स्पष्ट हो गया था कि उस दौरान मैं बहुत व्यस्त रहने वाला हूं, तो मैंने अपने कार्यक्रमों को संगीत से जोड़ने का निर्णय भी लिया. यानी अपने साथ मैंने एक वादक (स्थानीय भाषा में – गवैया) को ले जाने की योजना भी बनाई।

मैंने हमेशा वादकों के साथ कार्यक्रम किए थे क्यूंकि संगीत एक अद्‍भुत माहौल तैयार करता है। संगीत अच्छा महसूस कराता है, तनाव दूर करता है, और इससे आध्यात्म में पहुंचने में सहायता मिलती है। उस दौरान मैं अक्सर स्थानीय वादकों से मिलकर उनकी प्रतिभा के बारे में और इस बारे में कि क्या वे मेरे कार्यक्रम का हिस्सा बनना चाहेंगे, पूछता था। इस बार मैंने निर्णय लिया कि भारत से अपने कार्यक्रम के लिए एक वादक भी ले जाऊंगा, जैसा कि मैंने लंदन में अपने एक कार्यक्रम में या भारत में होने वाले अपने सभी कार्यक्रमों में किया था। मैंने अपने आयोजकों से बातचीत की, उनसे एक औपचारिक आमंत्रण लिखने को कहा ताकि उसके लिए वीज़ा की व्यवस्था हो सके।

उस वादक ने कभी भारत से बाहर एक क़दम भी नहीं रखा था और ज़ाहिर है वह इस बात से खुश था कि मैंने अपने कार्यक्रमों में उसे बाँसुरी बजाने के लिए आमंत्रित किया था। कुछ औपचारिकताएं रह गई थीं, लेकिन उन्हें पूरा करने में कोई समस्या नहीं आई, और उसे आसानी से वीज़ा मिल गया। तब मैं पहले से ही जर्मनी में था। मैं एक दूसरे शहर में काम में व्यस्त था इसलिए मैंने माइन्ज़ के अपने कुछ मित्रों से पूछा कि क्या वे मेरे वादक को फ़्रैंकफ़र्ट हवाईअड्डे से ले आएंगे। मेरे वे सभी मित्र भी संगीत से ही जुड़े थे, ऐसे में एक भारतीय सहकर्मी का अपने घर में स्वागत करना उनके लिए खुशी का विषय था! उन्होंने उसे हवाईअड्डे से लिया और वहां उस देश में पहुंचने तक उसे एक-दो दिन तक अपने साथ ही रखा – ताकि वे आपस में एक-दूसरे से संगीत बांट सकें।

समय बीत गया, उन्होंने उसके साथ थोड़ा समय गुज़ारा और अंत में उसे कोलोन के लिए जाने वाली एक ट्रेन में बैठा दिया जहां उस दौरान मैं रहता था। अगर आप मैंज़ के मेरे मित्रों से मिलेंगे और उस समय के बारे में पूछेंगे जो उन्होंने मेरे भारतीय वादक के साथ बिताया था, तो वे हँसते हुए अपने घर में आए अनुभवहीन भारतीय मेहमान का किस्सा बड़े चाव से सुनाएंगे।

वे बताते हैं कि मेरे बाँसुरी वादक ने अपने आगमन के पहले दिन उनसे एक बाल्टी मांगी थी। मेरी मित्र को लगा कि संभवतः वो उसमें कुछ धोना चाहता है या शायद बाल्टी से नहाने का अभ्यस्त होगा, उन्होंने उसे एक बाल्टी दे दी जिसे उसने बाथरूम में रख दिया। मेरी मित्र ने इस बारे में तब कुछ अधिक सोचा नहीं, लेकिन जब अगली बार उन्हें शौचालय जाना था, वे गईं, उन्होंने अंदर से दरवाज़ा लगाया, अपनी पतलून नीचे की, सीट पर बैठीं – और अचानक आश्चर्य से चीखती हुई उछलकर खड़ी हो गईं: शौचालय की सीट बिल्कुल गीली थी! उसे (मेरे वादक को) समझ ही नहीं आया था कि टॉइलेट का फ़्लश कैसे काम करता है और उसने शौच में कई बाल्टी पानी उड़ेला था ताकि गंदगी चली जाए, इससे न केवल सीट बुरी तरह भीग गई थी बल्कि बाथरूम का पूरा फ़र्श भीग गया था! मेरी मित्र जब भी यह क़िस्सा अपने जीवंत अंदाज़ में सुनाती हैं तो सुन रहे सारे लोगों के मुंह से हँसी फूट पड़ती है!

और हाँ, उन्होंने मेरे भारतीय वादक फ़्लश का इस्तेमाल करना सिखाकर यह भी सुनिश्चित किया कि वह आगे अपने साथ-साथ किसी को भी ऐसी असहज स्थिति में न डाले। दिखने में यह बेहद छोटी चीज़ लगती है लेकिन यह आपके बाद शौचालय का इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए और उनकी सुविधा के लिए बहुत ज़रूरी है!

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