पिता पुत्र का वो रिश्ता, जो जीते-जी मर गया
मेरे पिता का देहांत हो गया। मुझे यह समाचार भारत में मेरे पड़ोसियों से मिला। वह मेरे पिता थे… पर उस पल मेरी स्थिति अजीब हो गई थी।
मेरी छाती भारी हो रही थी। आँखें जल रही थीं। भीतर एक अजीब सी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे अंदर से छटपटाहट उठ रही हो… पर आँसू नहीं निकल रहे थे। बाप ने जीते जी मुझे इतना रुला दिया था कि उनके मरने पर अब मुझे रोना नहीं आ रहा था।
मैंने पवन और जय से कहा—“मेरा बाप मर गया है।”
उसे खाने-पीने का बहुत शौक था। माँ के जाने के बाद भी वह हमेशा मेरे खाने-पीने का ध्यान रखते थे। उन्हें खुद भी अच्छा खाना पसंद था और दूसरों को खिलाने का भी उतना ही शौक था।
मैंने कहा—“चलो, आज मैं अच्छे से खाना बनाता हूँ।”
उस दिन मैंने दिल से, बहुत मन लगाकर खाना बनाया। खुद भी खाया और सबको खिलाया।
शायद यही मेरी श्रद्धांजलि थी उनके लिए……… मैंने इसी तरह अपना शोक मनाया।
फिर उसी दिन मैंने अपने पिता का नाम एक कागज में लिखकर अपनी बात और प्यार लिखा। मुझे पता था कि वहाँ मेरे घर में उनका शरीर रखा हुआ है। मैंने वह पत्र अपने पास रात भर रखा।
अगले दिन, जिस समय भारत में उनका अंतिम संस्कार हो रहा था, मैंने भी उस पत्र को आग में जलाकर अपनी ओर से उनका अंतिम संस्कार कर अपने बब्बा जी को विदा किया।
और इस तरह, वह पिता—जो मुझसे पहले ही कह चुके थे कि “मैं तो तेरे लिए मर गया हूँ”—
मैंने उनके स्थूल रूप से मर जाने को भी स्वीकार कर लिया।
मैंने वहाँ न जा करके एक तरह से अपने पिता की इच्छा को ही पूरा किया क्योंकि वो मेरी शक्ल ही नहीं देखना चाहते थे, मुझसे बात नहीं करना चाहते थे।
करीब 3 साल पहले, जब मुझे यह खबर मिली थी कि मेरे पिता की तबियत बहुत खराब है और वे दिल्ली के अस्पताल में भर्ती हैं, तब मैं रोने लगा था। अगली ही फ्लाइट लेकर मैं दिल्ली पहुँचा। तीन दिन अस्पताल में उनके पास खड़ा रहा, रोता रहा। गले लगाना तो दूर, मेरे पिता ने मुझसे बात तक नहीं की। वे दूसरों से बात करते थे, पर मुझसे नहीं।
उसी समय मैंने सोच लिया था—अब अगर ये मर भी जाएँ, तब भी मेरे आने का कोई मतलब नहीं है। जब जीते-जी ही मुझे नहीं देखना चाहते, मुझसे बात नहीं करना चाहते, तो मरने के बाद मैं क्यों जाऊँ? मैं वो बेटा हूँ, जो पिता के होते हुए अनाथ हो गया था।
जब मैं दिल्ली से वापस आया, तब वे ठीक होकर घर लौट गए। बाद में मुझे सुनने में आया कि वे लोगों से कह रहे थे—“वो तो ये देखने आया था कि मैं मर गया कि नहीं।”
अरे भाई, अगर ऐसा होता तो मुझे सूचना मिल ही जाती… उसके लिए मुझे दिल्ली तक उड़कर जाने की क्या ज़रूरत थी?
अब जब वो मर ही गए थे तो मेरे जाने का क्या औचित्य बनता था जबकि मेरे भाई लोग मेरे पिता से झूठे बयान ही पुलिस में नहीं दिलवा रहे थे बल्कि अपने राजनीतिक संबंधों का प्रयोग कर के मेरे द्वारा अपना हक पाने के लिए पुलिस में कराई गई रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डलवाने के साथ ही उल्टा मुझे गिरफ्तार कराने का षड्यन्त्र रच रहे थे।
मेरे और मेरे पिता के बीच संबंध अच्छे नहीं थे। लगभग 6–7 साल से हम लोगों में कोई बातचीत नहीं थी। उनकी तबियत खराब होने से कुछ हफ्ते पहले मैंने उन्हें एक संदेश भेजा था—कि मैं एक बार आपको जीते-जी गले लगाना चाहता हूँ, मिलना चाहता हूँ… बताइए, मैं कब आ जाऊँ?
पर उन्होंने कभी जवाब नहीं दिया।
इससे पहले भी मैंने कई बार कोशिश की—मैसेज, फोन—पर उन्होंने बहुत पहले ही मुझसे संबंध तोड़ लिए थे और कह दिया था, “मैं मर गया तेरे लिए।”
सच कहूँ तो मेरे पिता मेरे लिए सालों पहले ही मर चुके थे। और जब उनका असली देहांत हुआ, तो मेरे जीवन में कोई खास फर्क नहीं पड़ा। न कोई बातचीत, न कोई संबंध, न कोई भावनात्मक जुड़ाव—कुछ भी तो नहीं था।
हालाँकि, ऐसा नहीं था कि हमारे संबंध हमेशा खराब थे। एक समय था जब उन्होंने मुझे बेटे का प्यार दिया और मैंने भी उन्हें पिता का सम्मान। लेकिन समय के साथ सब बदल गया।
मैंने जीवन भर जो भी कमाया, सब कुछ अपने पिता और भाइयों के हाथ में रखता रहा। ज़मीन-जायदाद, प्रॉपर्टी—सब उन्हीं के नाम से ली। आज मैं खुद खाली हाथ बैठा हूँ।
मुझे पता है, मेरे भाइयों ने मेरे पिता को किस तरह से दबाव में रखा था। उनकी कमजोरियों का फायदा उठाकर उन्हें अपने अनुसार चलाया। आश्रम के लोग, कर्मचारी—सब जानते थे कि असलियत क्या थी।
मेरे पिता अक्सर मुझसे फोन पर रोते थे—कहते थे कि छोटा भाई शराब पीता है, जुआ खेलता है, औरतबाजी में पैसे उड़ा देता है। एक बार तो उन्होंने खुद मुझे छुपाई हुई शराब की बोतलें और नशे की चीज़ें दिखाईं।
वो चाहते थे कि आश्रम की कुछ ज़मीन मेरे नाम करें। इसके लिए उन्होंने वकील को भी बुलाया। पर मेरे भाइयों ने इसका विरोध किया और उन्हें ऐसा करने नहीं दिया।
धीरे-धीरे इतना दबाव बनाया गया कि मेरे पिता मुझ पर झूठे आरोप लगाने लगे और पुलिस में यहाँ तक मेरे खिलाफ झूठे बयान दिए कि मैं अपनी माँ को प्रताड़ित करता था।
क्या कोई कल्पना कर सकता है? वही पिता, जो पहले मेरे लिए लड़ते थे, अब मेरे खिलाफ खड़े हो गए।
एक घटना आज भी दिल तोड़ देती है।
एक बार उन्होंने फोन किया—“कब आ रहे हो?”
उस समय मैं अपना व्यापार जमाने की कोशिश कर रहा था। मैंने कहा—“पैसे की थोड़ी दिक्कत है, टिकट में ही बहुत खर्च हो जाएगा, पर आप चिंता ना करे कुछ इंतजाम करता हूँ, बचत करता हूँ और फिर आने का प्रोग्राम बनाता हूँ।”
कुछ देर बाद बोले—“तो ऐसा करो, टिकट के पैसे ही हमें भेज दो, यहाँ ज़रूरत है।”
उस पल मेरे दिल पर क्या गुज़री होगी…
एक पिता को अपने बेटे या पोती से मिलने में रुचि नहीं थी—उसे सिर्फ़ पैसे चाहिए थे। सारा जीवन में यही देखता रहा कि पैसे की वजह से मेरे पिता ने अपने चेला, सेवकों, मित्रों, मिलने जुलने वालों, रिश्तेदारों आदि, बहुत सारे लोगों से संबंध बिगाड़ लिए अंत में अपनी औलाद से भी।
मैं विदेशों से अच्छा पैसा कमा रहा था। सब कुछ ठीक चल रहा था। पिता यह सब देख भी रहे थे। परन्तु फिर भी उनकी जो आदत थी—मांगने की, जैसे भीख माँगने की—वह नहीं छूट रही थी।
वे सेवकों से कहते—“आटा, दाल, चावल, चीनी दे दो।” कई बार मुझसे छुपकर भी ऐसा करते थे, क्योंकि उनकी यह आदत जा ही नहीं रही थी।
मैं कई बार उनसे इस बात पर लड़ता भी था। कहता था—“आप ऐसा क्यों करते हैं? मैं नहीं चाहता कि हम इस तरह माँगकर जिएँ। हम लोग मेहनत से कमा रहे हैं, हमारे पास सब कुछ है। आपको किसी चीज़ की कमी नहीं है।”
परन्तु वे अपनी आदत से मजबूर थे।
मैं चाहता था कि यह भिक्षावृत्ति वाली स्थिति खत्म हो, और हम लोग मेहनत से कमाकर खाएँ। लेकिन वे वही करते रहे—कभी बच्चों के नाम पर आटा-दाल-चावल मँगवाना, फिर उससे खाना बनाकर रेस्टोरेंट में बेच देना, या चावल को सीधे मंडी में बेच देना।
मुझे यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।
अब वही परंपरा मेरे भाई भी आगे बढ़ा रहे हैं।
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उन्होंने मेरी बेटी से भी दूरी बना ली। जब तक मैं पैसे भेजता रहा, सब ठीक था। जैसे ही मैंने बच्चों के नाम पर आने वाला दान का पैसा भेजना बंद किया, वो भी इसलिए क्योंकि मुझे पता था वो पैसा मेरे भाई लोग अय्याशियों में उड़ा रहे थे। उन्होंने मुझसे बात करना भी बंद कर दिया।
मेरी बेटी के जन्मदिन पर साल में एक बार फोन आता था। एक बार वह बाथरूम में जाकर रोने लगी। उसने कहा—
“बब्बा जी सिर्फ़ मेरे जन्मदिन पर ही फोन क्यों करते हैं? बाकी दिन क्यों नहीं?”
मैंने यह बात पिता से कही… तो उन्होंने जन्मदिन पर भी फोन करना बंद कर दिया।
मैं कभी लिखूंगा भी कि किस तरह से मेरे भाइयो ने षड्यंत्र करके मेरे पिता को मेरे खिलाफ़ किया। निश्चित रूप से पिता अगर चाहते तो दोनों छोटे भाइयों को भी ठीक कर सकते थे, परंतु उनमें उतनी ताकत ही नहीं बची थी। उनकी कमजोर नस जो भाइयों ने दबा रखी थी, उसने उनको मजबूर कर दिया था।
मेरे यही भाई जो आज पिता की मौत के बाद पितृ भक्त बने घूम रहे हैं, पिता के जीते जी गाली देते थे उन्हें बंद कमरे में और कहते थे कि तेरी धोती खोलकर समाज के सामने बेइज्जत करूंगा तुझे। और मेरे पिता चुपचाप सिर झुका कर सुन लेते थे और वही करते थे जो मेरे भाई चाहते थे।
जिन गलतियों के लिए मैंने मेरे पिता को माफ़ कर दिया था उन्हीं को हथियार बनाकर मेरे भाइयों ने मेरे पिता को ब्लैकमेल कर रखा था। तरस आता था मुझे अपने बाप की स्थिति को देखकर परन्तु जो इंसान अहंकार, क्रोध और कुंठा में डूब जाता है, वह सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाता।
आज जब मैं यह सब सोचता हूँ, तो लगता है—अगर मेरे भाइयों ने मुझे फोन किया होता, “बब्बा जी चले गए, दादा आ जाओ हमारे लिए,” तो मैं जरूर जाता।
पर मैं जानता हूँ, वे ऐसा कभी नहीं कहते, कुछ रिश्ते मौत से पहले ही खत्म हो जाते हैं। 3 साल पहले भी जब पिताजी की तबियत खराब होने पर मैं भारत गया था, उस की सूचना भी मुझे मेरे भाइयों ने नहीं बल्कि और लोगों ने ही दी थी। क्योंकि मैं उनके लिए भी बहुत पहले मर चुका हूँ।
मेरे भाइयों ने लालच में आकर सब कुछ अपने पास रख लिया—मेरा हक, मेरी पत्नी का हक, मेरी बेटी का हक।
मैं आज भी उनसे कहना चाहता हूँ—
पिता चले गए… एक दिन हम भी चले जाएंगे।
आज हम लड़ रहे हैं, कल हमारे बच्चे वही लड़ेंगे।
बेईमानी मत करो। आ जाओ।
तुम ज़्यादा ले लो, मुझे थोड़ा दे दो।
कुछ तो मेरा हक बनता है।
और सुन लो— मेरी 40 साल की कमाई जो एक झटके में तुम लोगों ने हड़प ली, क्योंकि मैंने तुम पर विश्वास किया था। ये मत सोचना मैं उसे भूल जाऊंगा। कभी नहीं भूलूंगा लड़ता रहूंगा मरते दम तक, अपने हक के लिए। जरा सोचो कि जिसकी जीवन भर की कमाई तुमने छीन ली, वो कैसे भूल जाएगा? मेरे बचे हुए जीवन का उद्देश्य ही अब केवल यही है। तुम यही कहते थे न कि “जा कर के जो करना हो”। वचन देता हूँ तुम्हें कि जरूर करूंगा जो भी कर सकता हूँ, सब कुछ करूंगा, पर छोड़ूँगा नहीं तुम्हें। तुमने मुझे मेरे बाप से ही दूर नहीं किया बल्कि धन संपत्ति के अलावा मेरे बचपन की सुखद यादें भी मुझसे छीन लीं।
मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं है…
पर तुम्हारे पास खोने के लिए बहुत कुछ है।
समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता।
आ जाओ… मिल लो…
तुम मेरे भाई हो… मेरा खून हो…
मेरे साथ ऐसा धोखा मत करो।
पता नहीं मेरे भाइयों के हितैषी सलाहकार भी कौन लोग हैं जो कि उन्हें उनके भले की सलाह भी नहीं दे सकते।
हालाँकि पिता के मर जाने से मेरे वर्तमान जीवन में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा है, फिर भी दिल में एक खालीपन आ गया है। एक अहसास—कि अब अगला नंबर हमारा है।
मैं मरने से नहीं डरता। उसकी कोई खास चिंता भी नहीं है। मैंने एक भरपूर और सुखद जीवन जिया है, और जी रहा हूँ।
पर एक कामना जरूर है—कि मरने से पहले मैं अपने भाइयों को यह एहसास करा सकूँ कि उन्होंने मेरे साथ गलत किया है। और ऐसी स्थिति कभी किसी की न बने, जैसी मेरे पिता की थी।
किसी भी पिता को अपने जीवन के आखिरी साल उस तरह न बिताने पड़ें, जैसे मेरे पिता ने बिताए।
मैं बस यही चाहता हूँ—कि कोई भी पिता उस पीड़ा से न गुज़रे, जिससे मेरे पिता गुज़रे। जो भी उन्होंने मेरे साथ या किसी के भी साथ किया अथवा वो जैसे भी परन्तु मेरे पिता थे, मेरा उन्हें अंतिम प्रणाम।
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