जब मुझे अछूत के पास बैठने पर आगाह किया गया – 4 अक्टूबर 2015

आज मैं अपने साथ हाल ही में हुए एक वाकए के बारे में लिखना चाहता हूँ, जो दर्शाता है कि भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था की जड़ें कितनी मजबूत हैं। दुर्भाग्य से आज भी यह व्यवस्था हर जगह व्याप्त है और अभी भी बहुत से लोगों के मन से यह खयाल बाहर नहीं निकला है कि कुछ लोग ‘अछूत’ हो सकते हैं।

अभी कुछ सप्ताह पहले की बात है, जब मैं बाहर, हाल में सोफ़े पर बैठा हमारे सफाई कर्मचारी से बात कर रहा था, जो रोज़ सबेरे स्कूल के संडास-बाथरूम साफ करने आता है। उसने हाल ही में अपनी भतीजी को हमारे स्कूल में भर्ती करवाया था और मैं उस लड़की के बारे में उससे बातचीत कर रहा था।

अभी हम बात ही कर रहे थे कि एक और व्यक्ति ने आश्रम के मुख्य हाल में प्रवेश किया। वह हमारे शहर का ही व्यापारी था और कोई सामान पहुँचाने आया था। मेरे साथ बात कर रहा व्यक्ति उठकर खड़ा हो गया और तुरंत बाहर निकल गया और मैं नए आगंतुक से बात करने लगा। मैंने उससे बैठने के लिए कहा और उठकर यशेंदु को बुलाने जाने लगा, जो काम के बारे में आगंतुक से बात करता। मैं निकल ही रहा था कि वह मेरे पास आकर फुसफुसाते हुए कुछ कहने लगा, जैसे कोई बहुत ज़रूरी और दूसरों से छिपाने वाली रहस्यपूर्ण बात हो: ‘शायद आप नहीं जानते, ‘वह’ नीच जाति का आदमी है!’ उसने अभी-अभी बाहर गए व्यक्ति के बारे में कहा।

मैं जानता था कि यह व्यक्ति अपेक्षा कर रहा होगा कि मैं चौंक उठूँगा। बल्कि शायद अरुचि और ग्लानि से मुँह बनाऊँगा क्योंकि अभी-अभी ‘वह’ व्यक्ति मेरे साथ उसी तरह सोफ़े पर बैठा था, जिस तरह मैं इस नए आगंतुक के साथ बैठता। निश्चय ही, मेरी प्रतिक्रिया उसकी अपेक्षानुरूप नहीं रही! मैं अच्छी तरह जानता था कि मैं किससे साथ बात कर रहा था और उसकी जाति से निश्चित ही मेरा कोई सरोकार नहीं था!

‘अरे वह?’ मैंने जवाब दिया। ‘वह यहाँ कई सालों से काम कर रहा है और बहुत अच्छा आदमी है!’ और इतना कहकर मैं वहाँ से यशेंदु को बुलाने निकल गया।

अब चौंकने की बारी उस आगंतुक की थी! मैं देख पा रहा था कि यह जानकारी उसके गले से नीचे नहीं उतर रही थी कि मैं ‘उसके’ बारे में अच्छी तरह जानते-बूझते भी कि वह एक ‘अछूत’ है, मज़े में उसकी बगल में बैठा हुआ था।

दुर्भाग्य से, भारतीय समाज में यह प्रतिक्रिया असामान्य नहीं है। अफ़सोस कि आज भी यह जानने के बाद कि यह व्यक्ति किस परिवार का है और क्या काम करता है, अधिकांश लोग उसके पास नहीं बैठते, वह भी एक ही सोफ़े पर! दुर्भाग्य से, यह व्यक्ति भी किसी दूसरे परिवार में होता और संडास-बाथरूम साफ करने का काम कर रहा होता तो उनके साथ या उनके सोफ़े पर बैठने की हिम्मत भी नहीं करता। अर्थात, बैठने के लिए उससे कहा भी नहीं जाता और उसका ऐसा करना वहाँ कोई पसंद भी नहीं करता।

रमोना अक्सर स्कूल देखने आने वालों और आश्रम आने वाले मेहमानों से इस विषय में बताती रहती है। हर कोई यह जानकार स्तब्ध रह जाता है कि यहाँ, भारत में आज भी एक इंसान दूसरे को ‘अस्पृश्य’ समझता है। लेकिन यह घटना एक बार फिर इस बात को उजागर करती है कि हमारे स्कूल और हमारे आश्रम जैसे और भी कई स्थान होने चाहिए जहाँ हर कोई, चाहे जिस जाति का हो, एक साथ बैठ सकें, एक साथ भोजन कर सकें, पढ़-लिख सकें और जहाँ यही सिखाया जाता हो कि हर इंसान दूसरे के बराबर है!

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