जब मैंने एक ब्रह्मचारी महिला को अपने प्रथम यौन संबंध के बारे में बताया- 6 अक्तूबर 2013

जब मैं 2005 में आस्ट्रेलिया के सफर पर था, एक और ऐसी जगह भी मैं गया, जिसका नाम मुझे याद नहीं है लेकिन लोग याद हैं। खासकर, उनके साथ हुई बातचीत आज भी दिमाग में बनी हुई है।

मेरा एक आयोजक 65 या 70 साल का एक व्यक्ति था। वह योग गुरु था और अपने शहर में और दूसरों के स्टूडिओज में लोगों को योग सिखाता था। उसने अपने कार्यक्रमों और व्याख्यानों में आने वाले शिष्यों से और कुछ मित्रों से, जिनसे बाद में भी मैं उसके घर पर मिला, मुझे मिलवाया।

एक दिन हम तीन लोग बैठे बातें कर रहे थे: मेरा आयोजक, एक महिला, जो मेरे खयाल से उसकी मित्र थी और मैं। उन्होंने मुझे बताया कि वे दोनों एक भारतीय गुरु के शिष्य हैं, जिन्हें संयोग से, मैं जानता था। जिज्ञासावश महिला ने मुझसे पूछा कि क्या मैंने कभी यौन संबंध स्थापित किया है या कि मैं भी आजन्म ब्रह्मचारी ही हूँ।

इस यात्रा में मेरे साथ यौन विषयों को लेकर कई अजीबोगरीब वाकए पेश आए थे लेकिन मैं बहुत खुले विचारों वाला व्यक्ति हूँ-और हमेशा से रहा हूँ-और इस तरह के हादसे इसे बदल नहीं सकते थे। इसलिए मैंने उस महिला से कहा कि मैं ब्रह्मचारी नहीं हूँ और मैंने जीवन में कई बार यौनानुभव प्राप्त किया है। फिर मैंने उसे अपने उस अनुभव के बारे में बताया, जब मैं तीस साल की उम्र में, जर्मनी में एक महिला के साथ पहली बार हमबिस्तर हुआ था।

वह बड़ी दिलचस्पी के साथ सुनती रही-जैसा कि ऐसे किस्सों के साथ अक्सर होता है-लेकिन उसकी प्रतिक्रिया, शायद आपकी अपेक्षित प्रतिक्रिया से बहुत भिन्न थी। महिला ने मेरी तरफ इस तरह देखा जैसे उसे मुझ पर तरस आ रहा हो और दूसरे ही पल उसने अपनी बात कह भी दी: "अरे! कितना अच्छा होता अगर आपने उस महिला के साथ यौन संबंध नहीं बनाए होते!" उसकी आँखों में मेरे इस व्यवहार को लेकर इतनी खिन्नता थी, मानो किसी ने उस रात मेरी कोई अनमोल वस्तु चुरा ली हो! कोई बहुमूल्य आभूषण, जिसे मैंने तीस साल तक लोगों की नज़रों से बचाए रखा था, उस दिन, सिर्फ पापी शरीर के वशीभूत, खो दिया! मेरा खजाना लुट गया था, जिसे वापस पाने की अब कोई उम्मीद नहीं थी! वह समझ नहीं पा रही थी कि मुझे इस बात का पश्चात्ताप क्यों नहीं है, मैं अपने इस कुकर्म को लेकर दुखी क्यों नहीं हूँ! मैं शुरू से जान रहा था कि वह ऐसा क्यों समझ रही है।

ऐसा वह सोच रही थी क्योंकि वह एक भारतीय सन्यासी की शिष्या थी, जो ब्रह्मचर्य का उपदेश देते है, उसे बहुत बड़ा नैतिक गुण मानते हैं और जिसे हासिल करने के लिए आपको जी-जान से कोशिश करनी चाहिए। मैंने जानबूझकर उसे यह नहीं बताया कि उसके गुरु भी, निश्चय ही जैसा वह उनके बारे में सोच रही है वैसे, यानी ब्रह्मचारी, नहीं हैं। सच बात तो यह है कि मैं जानता हूँ कि उसकी कई महिला शिष्याएँ हैं, जो समझती हैं कि उन्होंने पृथ्वी पर उपलब्ध जीवन का सबसे बड़ा प्रसाद प्राप्त किया है-गुरु के साथ शारीरिक अंतरंग संबंध बनाकर। उन शिष्याओं में से एक तो हमारे आश्रम के पास ही रहती है।

मेरी कभी भी ब्रह्मचर्य में दिलचस्पी नहीं रही और मैं शुरू से विश्वास करता हूँ कि यह एक मूर्खतापूर्ण, अप्राकृतिक विचार है लेकिन अपने सामने बैठी हुई इस महिला से इस विषय में कुछ कहना मुझे न ही उचित जान पड़ा, न ही आवश्यक! वह चली गई, चलते हुए भी शायद उसे मुझ पर तरस आ रहा था। और मुझे वहीं बैठे रहना था, इस बात से अनभिज्ञ कि अब मुझे अपने मेजबान से भी, जो खुद भी उसी गुरु का शिष्य है, पूरे समय इसी विषय पर चर्चा करनी है और इस बात से भी कि उसकी पत्नी के सामने इस विषय में चर्चा करते हुए मुझे कितनी असुविधा होगी! लेकिन वह एक अलग कहानी है और एक अलग ब्लॉग की मांग करती है, जिसे मैं अगले सप्ताह, इतवार के दिन लिखूंगा।

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