जब मुझे अहसास हुआ कि मेजबान की अनुमति लिए बगैर अपने मित्रों को आमंत्रित करना ठीक नहीं -19 जनवरी 2014

2006 की शुरुआत में मैं आस्ट्रेलिया में एक महिला और उसके परिवार के साथ रह रहा था। उसने मुझे आमंत्रित किया था और उस इलाके में वही मेरे कार्यक्रम आयोजित किया करती थी। मैं उस शहर के आसपास के इलाकों में प्रवचन किया करता था और कार्यशालाएँ चलाता था। इसके अलावा व्यक्तिगत सलाह-सत्र उसके घर पर ही हुआ करते थे। उसके यहाँ रहते हुए मुझे एक महत्वपूर्ण सीख मिली: अगर अपने किसी मित्र को घर बुलाना हो तो पहले अपने मेजबान से अवश्य पूछ लें!

हमेशा की तरह यहाँ भी मैं शाम का खाना खुद पकाता था और मेजबान का सारा परिवार मेरे साथ वही भोजन करता था। उन्हें मेरे द्वारा पकाया भारतीय खाना बहुत भाता था, जो कि हमेशा रात का खाना ही होता था, क्योंकि दिन भर में मैं लगातार कई व्यक्तिगत सत्र लेता रहता था और अपने काम में व्यस्त ही रहा करता था।

ऐसे ही एक सत्र के दौरान एक महिला मेरे, मेरे परिवार के, मेरे काम के और मेरे चैरिटी कार्यों के विषय में विस्तार से जानने की इच्छुक हो गई। क्योंकि एक सत्र में हर एक के लिए एक नियत समय निर्धारित होता है इसलिए उस समय मैं उससे लंबी बात करने में असमर्थ था लेकिन उसकी रुचि को देखकर मैंने उससे कहा, "आज शाम का भोजन मेरे साथ घर पर कीजिए, वहीं बातें होंगी।" मेरे इस प्रस्ताव पर वह बड़ी खुश हुई-क्योंकि मेरे साथ वह बढ़िया भारतीय खाने का स्वाद ले सकती थी, अच्छी चर्चा कर सकती थी और शायद एक नया दिलचस्प मित्र भी उसे मिल सकता था। उसने मेरा निमंत्रण स्वीकार किया और चल दी।

जब मेरे बचे हुए सत्र समाप्त हो गए, मैं अपनी मेजबान और आयोजक के पास आया और उसे बताया कि मैंने एक महिला को खाने पर बुलाया है और यह भी कि उसने आने की सम्मति भी दे दी है। उसकी प्रतिक्रिया ने मुझे विचलित कर दिया।

"आपने किसी को खाने पर बुला लिया, मेरे घर में, बिना मुझसे पूछे? और अगर मैं आज किसी से मिलना न चाहूँ तो? या मेरा कोई और प्लान हो तो?"

उसकी बात सुनकर मुझे तुरंत अपनी गलती का एहसास हुआ। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह कोई समस्या भी खड़ी कर सकता है। जर्मनी में भी मैं ऐसा कर चुका था लेकिन अक्सर मैं वहाँ स्वतंत्र रूप से रहा करता था और शायद वहाँ मैंने किसी दूसरे के घर पर अपने किस मित्र को निमंत्रित नहीं किया था। वहाँ भी मैं अपना खाना खुद बनाता था मगर यहाँ खाने के अतिरिक्त, घर भी उसका था, टेबल उसकी थी और परिवार भी उसका था। यहाँ शायद मैं कुछ ज़्यादा ही अबोध साबित हो रहा था।

अगले ही पल अफसोस प्रकट करते हुए मैंने उससे माफी मांगी और कहा कि मैं अभी फोन करके उस महिला से, किसी दूसरे प्लान का बहाना बनाकर, न आने के लिए कह देता हूँ। तब उसे लगा कि उसका मेरे प्रति व्यवहार कुछ ज़्यादा ही कटु हो गया था मगर इसके बावजूद हमने उस महिला के साथ रात्रि-भोज को स्थगित ही कर दिया।

कुछ समय बाद जब हम इस प्रकरण पर अलग-अलग विचार कर चुके तब हमारी पुनः बात हुई और उसने मुझसे पूछा, "क्या आपकी नज़र में यह उचित है कि आप किसी दूसरे के यहाँ मेहमान के रूप में रह रहे हों और वहाँ आप अपने किसी ऐसे मित्र को आमंत्रित कर लें, जिसे आपका मेजबान जानता तक न हो?"

मैंने उसे समझाया कि मैं उसकी बात अच्छी तरह समझ रहा हूँ लेकिन मैं ईमानदारी के साथ कह रहा हूँ कि उसे बुलाते वक़्त मेरे मन में इस बात का खयाल ही नहीं आया था! भारत में मेहमान-नवाज़ी का तरीका कुछ दूसरा है। अगर मेरे घर में कोई मेहमान रह रहा है और अगर मुझे कहीं से न्योता मिलता है तो मैं वहाँ अपने मेहमान को निस्संकोच ले जा सकता हूँ। उसी तरह अगर आप मेरे यहाँ रह रहे हों तो आप भी अपने किसी मित्र को बिना किसी परेशानी के हमारे यहाँ खाना खाने के लिए बुला सकते हैं, पहले से आप मुझे इसकी जानकारी दें या न दें, कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अब मैं इस सांस्कृतिक भिन्नता को अच्छी तरह समझ चुका हूँ।

बस इतना ही। सांस्कृतिक भिन्नता। और भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण सीख!

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