जब मैं भोजन और शौच का समय निर्धारित नहीं कर पाया – 3 मार्च 13

मेरा जीवन

सन 2005 लगातार वह पांचवां साल था जब मैं जर्मनी में प्रवास कर रहा था और हर बार यहां मेरे प्रवास की अवधि थोड़ी लंबी हो जाती थी। ज़ाहिर था कि अब मैं यहां के लोगों के बारे में बहुत कुछ जानने लगा था। कहने का अभिप्राय यह कि अब मैं धीरे धीरे न केवल पाश्चात्य और भारतीय संस्कृति एवं व्यवहार के बीच अंतर को पहचानने लगा था बल्कि उन खासियतों को भी बखूबी पहचानने लगा था जो विशेष रूप से जर्मनों में पाई जाती हैं। एक बात जो मैं जर्मनों के बारे में निश्चित रूप से कह सकता था वो यह कि इनकी जीवनचर्या बहुत ही सुव्यवस्थित और सुनियोजित जीवन होती है।

एक बार मैं अपनी एक कार्यक्रम आयोजक के साथ ठहरा हुआ था और उसके यहां प्रवास के दौरान जर्मनों की खासियत से जो मेरा परिचय हुआ वह काफी सख्त किंतु रोचक था। हुआ यों कि मैं उसके घर में ठहरा हुआ था और जिस शाम मैं उसके यहां पहुंचा, उसने मुझसे पूछा कि मैं कल सुबह नाश्ता किस वक़्त करना पसंद करूगा। मैंने उसकी तरफ देखा, मैं थोड़ा चकित था। उसने ‘किस समय’ शब्दों पर इतना जोर दिया था कि मुझे यकायक समझ नहीं आया कि क्या जवाब दूं। शाम के समय मुझे यह भी मालूम नहीं था कि मैं सुबह किस वक़्त उठ पाऊंगा और इसी वजह से कोई निश्चित समय बता पाना मेरे लिए मुश्किल था। मुझे यह पता था कि मेरे सत्र (सेशन) दस बजे शुरु होंगें, तो मैंने उसे कहा कि मैं उससे पहले नाश्ता कर लुंगा ताकि समय पर आयोजन स्थल पहुंचा जा सके।

अगले दिन मैं क़रीब नौ बजे नीचे आया तो मेरी आयोजक तैयार थी और हम दोनों ने साथ नाश्ता किया। दिनभर काम करने के बाद हमने डिनर भी साथ किया। जब मैं सोने के लिए ऊपर जाने वाला था तो उसने पूछा, "तो आप कल भी नौ बजे नाश्ता करेंगें?" मैंने हां कहा और सोने चला गया।

अगले दिन सुबह जब मैं नीचे आया तो वह पहले से ही खाने की मेज़ पर बैठी हुई थी और कल की तरह ही नाश्ता मेज पर लगा हुआ था। इससे पहले कि वह मुझे देख पाती मैंने उसे देख लिया और जो मैंने देखा उससे मैं एक तरह की अपराधभावना से ग्रस्त हो गयाः वह बड़ी बेसब्री से अपनी अंगुलियों से मेज पर तबला सा बजा रही थी और बार बार घड़ी की तरफ देखे जा रही थी। मैंने भी घड़ी की तरफ देखा, नौ बजकर पांच मिनट हो चुके थे। ज़ाहिर था कि वह इस बात से बेचैन थी कि मै अभी तक नाश्ते की मेज पर नहीं पहुंचा हूं। जो समय मैंने दिया था उससे पांच मिनट देरी से मैं पहुंचा था। जब मैं कमरे में प्रविष्ट हो गया तो उसने मुड़कर मेरी तरफ देखा और मुस्कराई। मैंने राहत की सांस ली और हमने आनंदपूर्वक नाश्ता किया।

मैं छोटी छोटी बातों को लेकर घड़ी की तरफ नहीं देखता था और कभी भी इस वजह से कार्यक्रम के लिए देरी नहीं हुई लेकिन किसी एक नियत समय पर भोजन करना मैं कभी निश्चित नहीं कर पाया। यही कारण था कि मैं अगली सुबह ठीक नौ बजे नाश्ते की मेज़ पर नहीं पहुंच पाया था और मैंने तुरंत इस बात पर अफसोस भी महसूस किया। उसने फिर पूछा कि मुझे देरी क्यों हो गई थी। तो मुझे लगा कि बहुत हो चुका, अब मुझे इस बारे में बात करनी ही पड़ेगी। मैंने उसे बताया कि मैं पहले से यह नहीं बता सकता हूं कि मुझे कब भूख लगेगी। मेरी बात उसके गले नहीं उतरी। मुझे लगा कि कहीं यह मुझसे यह न पूछ बैठे कि मैं शौच किस वक़्त जाऊंगा और अग़र निर्धारित वक़्त पर नहीं गया तो यह सवाल करेगी, "लेकिन आपने तो कहा था कि इस वक़्त जाएंगें"!

मुझे ग़लत न समझें, मैं यह जानता था कि वह महिला मुझसे स्नेह करती थी। वह यह ध्यान से देखती थी कि मैं क्या खाता हूं और ब्रेड पर क्या लगाकर खाता हूं और इस तरह वह मेरी पसंद व नापसंद की पूरी जानकारी रखती थी। अगले दिन वही सब चीज़ें नाश्ते में होती थी जो मुझे कल पसंद आई थीं। मेरी छोटी छोटी पसंद का ध्यान रखना यह दर्शाता था कि वह मुझसे कितना स्नेह करती थी।

उसी शहर में कुछ और लोग मिले जो अपने घर पर मेरा कार्यक्रम आयोजित करना चाहते थे। जब 2005 में मैं उनके यहां पहुंचा तो मुझे पता चला कि मेरी वह आयोजक अपना स्नेह प्रकट करने के चक्कर में कुछ ज्यादा ही आगे चली गई थी, उसने मेरे नए मेज़बानों को एक पूरी लिस्ट थमा दी थी जिसमें लिखा हुआ था कि मैं खाने में क्या पसंद और क्या नापसंद करता हूं।

यह बात और है कि वह लिस्ट ग़लत थी। मुझे उसका यह तरीका कतई पसंद नहीं आया। मैं कोई गुरु नहीं हूं। लिहाजा आपको ऐसा प्रदर्शित नहीं करना चाहिए कि आप मेरे निकटतम शिष्य हैं और आप लोगों को यह समझाते फिरें कि वे मेरे साथ किस तरह पेश आएं! मैं भी आप सब की तरह एक इंसान हूं। कुछ जानना चाहते हैं तो मेरे पास आइए और मुझसे पूछ लीजिए!

तो यह था मेरा अनुभव अति व्यवस्थित और अति नियोजित जर्मन जीवनशैली के साथ जो यह देखकर उलझन में पड़ जाते हैं कि आज आप निर्धारित समय से भिन्न समय पर पेशाब करने क्यों गए थे! अब मैं तो किसी एक निर्धारित समय पर पेशाब करने नहीं जाता हूं तो ऐसी अति नियोजित दिनचर्या का पालन करना मेरे बस की बात नहीं है!

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