जब मित्र आपके ज़ख़्मों पर मरहम लगाते हैं – 16 नवंबर 2014

यूरोप में पूरा नवंबर और दिसंबर 2006 का आधा माह बिताने के बाद मैं मध्य दिसंबर में भारत वापस आया।

उस दुखद हादसे के बाद लगातार यात्रा करना और अपने दिमाग को काम और स्थान-परिवर्तन की व्यस्तताओं में उलझा लेना एक अच्छा कदम था। हालांकि घर वापस आने पर मेरे आँसू थमते नहीं थे मगर वापस आकर अभिभावकों और परिवार वालों के साथ पुनः मिलना बहुत अच्छा रहा। हम सब घर में एक साथ रहते और हालांकि तीन माह बीत जाने के बाद भी उस वक़्त तक हमारे दुख में कोई कमी नहीं आई थी मगर वह एक और स्तर पर पहुँच चुका था।

उस वर्ष दिसंबर में, यूरोप के विभिन्न हिस्सों से बहुत से मित्र यहाँ आए थे। यह क्रिसमस से ठीक पहले की बात है जब उनकी छुट्टियाँ होती हैं। लेकिन मेरे खयाल से इस बार उनके यहाँ आने का कारण सिर्फ यह नहीं था। वे आए थे क्योंकि वे उस दुखद घड़ी में हमारे साथ रहना चाहते थे, जिससे हमारा दुख कुछ हल्का हो सके। वे इसलिए आए थे कि हमारी भावनाओं के साझीदार बन सकें।

यह सच है कि उनके देशों की भीषण ठंड के मुक़ाबले यहाँ के गरम मौसम का उन्होंने भरपूर लुफ्त उठाया। उन्होंने बताया कि वास्तव में बहुत से लोग क्रिसमस मनाने गोवा के बीचों और दूसरी ऊष्म और आकर्षक जगहों पर चले गए हैं। क्रिसमस के बारे में हम अधिक नहीं जानते थे लेकिन स्वाभाविक ही, भले ही वे घर पर नहीं थे मगर क्रिसमस मनाना चाहते थे।

पहली बार हमारे यहाँ एक ऐसा त्योहार मनाया गया जो धर्म के कारण शुरू तो हुआ था मगर अब जिसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं रह गया था। हमने बहुत अच्छा समय बिताया: आश्रम को अच्छी तरह सजाया गया, अच्छे नए कपड़े पहने गए, नाच-गाना हुआ और बढ़िया भोजन किया गया! एक बार फिर मुझे एहसास हुआ कि उत्सव मनाना अच्छी बात है-कारण कोई भी हो, हमें खुश रहने का मौका नहीं छोड़ना चाहिए और जीवन का पूरा आनंद लेना चाहिए!

उन लोगों के साथ बीता वह बेहतरीन समय था और हालांकि दुख इतनी आसानी से दूर नहीं होता, हमें महसूस हुआ कि मित्रों के बीच उनका साथ पाकर धीरे-धीरे हम उससे उबर रहे हैं!

जब जनवरी में वे सब वापस लौट गए तो मैं भी, एक बार फिर, आस्ट्रेलिया चला गया।

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