जब एक राजनेता के प्रति अपने समर्पण और भक्ति को पुरानी मित्रता से अधिक महत्व दिया जाता है -15 फरवरी 2015

आज मैं एक ऐसे विषय पर लिखना चाहता हूँ, जिसे मैं बहुत समय से महसूस कर रहा हूँ। पिछले हफ्ते मैंने अपने एक भूतपूर्व मित्र के बारे में लिखा था, जिसे मेरे अधार्मिक होने से समस्या थी। एक बिल्कुल अलग मामला भी मेरे साथ पेश आया, जिसमें कुछ मित्रों ने राजनीति के कारण मुझसे मित्रता समाप्त कर दी!

पिछले साल कुछ बहुत पुराने मित्रों के साथ मुझे दो बार यह अनुभव हुआ। उनमें से एक तो मेरे पिताजी के 50 साल पुराने मित्र थे और जब भी वृन्दावन आते, हमसे मिलने आश्रम अवश्य आते थे। दूसरा मेरा एक मित्र था, जिसे मैं 20 साल से जानता था। मैं कभी-कभी उससे और उसके परिवार से फोन पर बात कर लिया करता था और हम एक-दूसरे के घर भी हो आए थे। दोनों मामलों में ये मित्र राजनीति पर मेरी लिखी बातों से आहत हो गए, विशेष रूप से सोशल मीडिया में, भारत के वर्त्तमान प्रधान मंत्री, मोदी के बारे में मेरे विचार पढ़कर।

जी हाँ, अलग विचार रखने के कारण मुझे अपने मित्रों से, बहुत पुराने मित्रों से हाथ धोना पड़ा है।

मैं हतप्रभ रह गया था। वास्तव में मैं सोच भी नहीं सकता था कि जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से अच्छी तरह जानता था, जिनके साथ मेरा निकट का प्रेम सम्बन्ध था- एक ऐसा सम्बन्ध, जो वर्षों, बल्कि दशकों के परिचय के कारण बहुत पुख्ता हो चुका था- ऐसे व्यक्तियों के साथ भी ऐसा हो सकता है! वह भी सिर्फ राजनैतिक मतभेद के कारण! क्योंकि वे एक राजनैतिक पार्टी के, विशेष रूप से उस पार्टी के एक नेता के समर्थक थे और मैं कतई नहीं था।

मैं राजनैतिक व्यक्ति नहीं हूँ। शुरू से मेरी दृढ मान्यता रही है कि राजनीति सिवा नाटक-नौटंकी के कुछ नहीं है, महज फार्स (प्रहसन)। राजनैतिक नेता, जब उनके कैरीयर या उनकी प्रगति, सफलता या लाभ का सवाल आता है, पार्टी बदल लेते हैं। वे ऐसे वादे करते हैं, जो उन्हें चुनाव जितवा सकें और चुनाव जीतने के बाद उन्हें भूलकर कोई दूसरी बात शुरू कर देते हैं। वे असंवेदनशील होते हैं और करते कुछ हैं और उनके दिल में कुछ और होता है।

इसका यह मतलब नहीं है कि देश में जो कुछ भी हो रहा है उसमें मेरी कोई रुचि नहीं है! मैं भारतीय राजनीति में दिलचस्पी लेता हूँ, उसकी पूरी जानकारी रखता हूँ और उस पर अपना नज़रिया भी कायम करता हूँ। लेकिन मैं किसी एक पार्टी का समर्थक नहीं हूँ-और इसलिए मैं सभी पार्टियों और उनके नेताओं के मूर्खतापूर्ण कामों और बयानों पर सोशल मीडिया में लिखता हूँ क्योंकि मेरा ब्लॉग बहुत से गैर भारतीय पढ़ते हैं, जो भारत की राजनीति के बारे में न तो अधिक कुछ जानते हैं और न ही उससे उन्हें ख़ास मतलब होता है। ऑनलाइन यह सुविधा तो होती ही है कि आप अपनी पसंद की या अपने मतलब की विषयवस्तु ऑनलाइन छाँटकर पढ़ सकते हैं और जिन्हें नहीं पढ़ना चाहते, उनकी उपेक्षा कर सकते हैं।

संभवतः आप अपने मित्र के विचार पहले से जानते हैं और इसके बावजूद उसकी टिप्पणी पर इतना परेशान होते हैं। क्यों? क्योंकि वह उस व्यक्ति की आलोचना करता है, जो आपका आदर्श है, एक ऐसा राजनैतिक नेता, जिसका आप समर्थन ही नहीं करते बल्कि जिसके प्रति आप समर्पित और निष्ठावान हैं। आपके और उसके बीच भक्त और आराध्य का रिश्ता बन चुका है-दुर्भाग्य से यही बात है, जिसकी मैं अकसर आलोचना किया करता हूँ। कि आप किसी की आराधना न करें, चाहे वह धर्मगुरु हो या राजनैतिक नेता! आप किसी के अंध-समर्थक न हों, इतने अनुगामी या अंध-भक्त न हो जाएँ कि अपने गुरु की हर गलती, हर अपराध पर आँखें मूँद लें। मैं जानता हूँ कि आपको अपने लिए 'भक्त' शब्द के प्रयोग पर एतराज़ हो सकता है। शायद आप उनके ‘प्रशंसक’ कहलाना पसंद करते लेकिन उनकी आलोचना पर इतना उद्वेलित होना, यहाँ तक कि अपनी इतनी पुरानी मित्रता तोड़ लेना आपको यही प्रमाणित करता है: निश्चय ही, एक भक्त!

मैं चाहता हूँ कि आप आँखें खोलें और इस तथ्य को देखें और समझें कि गुरुवाद ने मुझसे मेरे मित्र छीन लिए- पहले धर्म के कारण और अब राजनीति के कारण भी! लेकिन ऐसे लोगों का आपसे दूर चले जाना ही ठीक है, उन्हें खोकर बेकार परेशान होना व्यर्थ है। मित्रता और प्रेम से भक्ति कहीं ज़्यादा मजबूत होती है!

मेरे मन में इस विषय पर और भी बहुत से विचार हैं और इसलिए कल भी मैं इस बारे में लिखना जारी रखूँगा।

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