जब सेक्स में जीवनसाथी की रुचि ख़त्म हो जाये – 7 अप्रैल 2013

मेरा जीवन

मेरे द्वारा दिये जाने वाले व्यक्तिगत सत्र के दौरान अकसर लोग अपनी अंतरंग समस्या की चर्चा करते है जिनका जिक्र उन्होंने कभी किसी अन्य के सामने नहीं किया होता है । यह उनके लिये एक सुअवसर होता है कि एक ऐसे वातावरण में स्वयं को खोलने का, जहां वे विश्वास करते है कि उनका एक भी शब्द उनके किसी अन्य परिचित को नहीं पता चलेगा। हमारी चर्चा गोपनीय होती है। उन मामलों में भी जिनमें मैं यहां आने वाले व्यक्ति के साथ मित्रवत हो जाता हूं, बिना उनकी अनुमति के व्यक्तिगत सत्र के दौरान बातचीत के विषय की चर्चा मैं कभी नहीं करता। यह कारण रहा कि वर्ष 2005 में जब एक मित्र ने अपनी बहुत ही निजी समस्या का खुलासा मेरे समक्ष किया तो मुझे बहुत आश्चर्य नहीं हुआ।

वस्तुतः वह अपनी पत्नी के माध्यम से मेरे संपर्क में आये थे। वह क्षेत्र में होनेवाले विभिन्न अध्यात्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने के लिये आ रही थी, मेरे बारे में सुना था और अपने पति को विश्वास दिलाया कि उनका साथ में चलना, उनके लिये भी अच्छा होगा। ध्यान के एक सत्र के दौरान मुझे समझने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत सत्र के लिये निर्णय लिया वह भी एक दूसरे से अलग – अलग सत्र के लिये। दुबारा मिलने के पहले, हमारे बीच छोटी सी मित्रता स्थापित हो गई थी पति मुझपर पूर्णतः विश्वास करते हुये, पत्नी के साथ अपने संबंध के विषय में मुझसे बातचीत करने लगे थे। संक्षेप में कहा जाये तो वे सेक्सुअली असंतुष्ट थे।

उन्होंने मुझे बताया कि वह अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते है और दोनों ने जीवन का एक लंबा सफ़र एक साथ तय किया है, और जिंदगी के उतार चढ़ाव में साथ रहे हैं, अपनी तरफ़ से वे पत्नी को खोना नहीं चाहते हैं। सिवाय एक बात के कि उनकी पत्नी को सेक्स में एक दम रुची नहीं थी, बाकी सब कुछ सही चल रहा था। पत्नी के नजदीक आने के लिये और सेक्स में रुची पैदा करने के लिये उन्होंने विभिन्न तरीका अपनाया, रोमांटिक या आक्रामक सेक्स और पुराने समय को याद दिलाने या पूर्णतः कुछ नये पद्धति, परन्तु पत्नी ने वैसा कुछ भी महसूस नहीं किया। गुजरते समय के साथ सेक्स के प्रति उनकी क्रियाशीलता कम होती चली गई, वैसे अवसर जब पति की पहल का पत्नी ने जवाब दिया हो, कम होते चले गये और अब वे सन्यासी की तरह जी रहे थे, वे ऐसी मानसिक अवस्था में पहुंच चुके थे जहां पति को यह विश्वास हो गया था कि वे जीवन में अब दुबारा सेक्स नहीं कर सकते हैं|

उनकी व्यथा मुझे गहरे तक छू गई विशेषकर उन्होंने जो प्यार अपनी पत्नी के लिये अभिव्यक्त किया था। उन्होंने बताया, मैं उससे बहुत प्यार करता हूं यही कारण है कि अपनी शारीरिक इच्छा की पूर्ति के लिये किसी अन्य औरत के पास नहीं जाना चाहता। मुझे ऐसी औरत मिल सकती है जो मुझे पाकर प्रसन्न होगी या जिन्हें मैं धन से प्राप्त कर सकता हूँ परन्तु अपनी प्यारी पत्नी के साथ मैं यह नहीं कर सकता। सेक्स की इस समस्या के दौरान ऐसे पल भी आये जब मेरी पत्नी ने इसके लिये अनुमति दी: "मुझे बुरा नहीं लगेगा अगर आप किसी और के पास जाते है" परन्तु उन्होंने पत्नी के आफ़र को नहीं स्वीकार किया।

उन्होंने पत्नी की सेक्स से संबंधित किसी भी क्रिया के प्रति असम्मति के बारे में बताया "मैं हमेशा यह सब कुछ नहीं करना चाहता हूं परन्तु वह छोटी सी पहल से भी इंकार करती है।" मैंने उनके इस दर्द को समझा, बेडरूम (शयनकक्ष), जहां उन्हें एक दूसरे के प्रति सबसे ज्यादा अन्तरंग होना चाहिये वहां जाने के बाद वे एक दूसरे के लिये पुरी तरह अनभिज्ञ हो जाते हैं।

स्पष्टतः यह समस्या दोनों के बीच द्वंद/ विरोध का कारण बन गई थी। पति को सेक्स की आवश्यकता थी, सेक्सुअल ऊर्जा बिना प्रवाहित हुये संचित होने लगी, दबाव से छुटकारा पाने के लिये उन्होंने पोर्न फ़िल्में देखना शुरु कर दिया, पत्नी द्वारा पकड़े जाने के बाद क्रोध एवं घृणा का भाव प्रकट किया गया जिसके कारण वे खुद को दोषी महसूस करने लगें। इस विषय को लेकर दोनों के बीच तकरार भी हुई जिसने बिस्तर पर दोनों के बीच के फ़ासले को बढ़ाने का कार्य किया। पत्नी सेक्स के प्रति कठोर लगती थी, उसके भावों से यह प्रकट होता था जैसे सेक्स स्वयं में कुछ इस तरह की चीज है जिसे सिर्फ गंदे लोग करते है या चर्चा करते है।

हालांकि उन्होंने इस बात का पूरी तरह ख्याल रखा कि उनका यह अंतर्कलह दुनिया के सामने प्रकट न हो। सबकी नजरों में वे एक दूसरे से प्यार करने वाले आदर्श पति-पत्नी थे। इसके अतिरिक्त उन दोनों के बीच और कोई विवाद नहीं था। पूरा दिन वे मधुरता के साथ व्यतीत करते थे, किसी को भी उनके संबंधों में व्याप्त तनाव का आभास नहीं हो सकता था यहां तक की खुद उन्हें भी, जबतक कि शाम न घिर आये। उन्होंने दुनिया के लिये और खुद के लिये आदर्श पति-पत्नी होने का आवरण बना रखा था।

पति से सब कुछ सुनने के बात मैंने उन्हें स्पष्ट बता दिया कि मैं उनकी पत्नी से भी बात करना और अगर संभव हुआ तो दोनों को एक साथ सुनना चाहुंगा क्योंकि यह उन दोनों का बहुत ही अन्तरंग मामला था । उन्होंने बहुत ध्यान देते हुये पत्नी से बात की और वह तैयार हो गई। संक्षेप में कहा जाये तो मैंने सेक्सुअल अन्तरंगता को पाप समझने वाला सामान्य भाव उनकी पत्नी के अंदर महसूस किया जो उसके पारंपरिक एवं कैथोलिक वातावरण में पले बढ़े होने के कारण था। कुछेक निजी सत्र एवं पति-पत्नी दोनों के साथ संयुक्त सत्र के बाद हम इन सभी मुद्दों पर खुलकर बात करने में सफ़ल हुये । मैंने बताया सेक्स कितना नैसर्गिक है और उसमें पाप जैसा कुछ भी गलत नहीं है बल्कि यह अपने साथी के साथ अन्तरंग क्षणों का आनंद है।

लंबे समय के दौरान धर्म द्वारा बहुत गहरे पैठा दी गई इस पाप वाली भावना को त्यागना इतना आसान नहीं था लेकिन जब हम कुछ दिन बाद मिले तो दोनों पति-पत्नी ने मुझे बताया कि उनका बेडरूम (शयनकक्ष) अब जीवंत हो गया है और वे अब शारीरिक अन्तरंगता का फ़िर से आनंद ले रहे है। मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि मैं उनकी मदद करने का निमित्त बना।

मुझे पता है बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो इस तरह की समस्या के निदान के लिये कोई सहायता नहीं तलाश कर पाये हैं। यह बहुत ही निजी मामला होता है जिसका समाधान सामान्य सुझाव से नहीं हो सकता और मुझे आशा है कि वैसे लोग योग्य परामर्शदाता तलाश लेंगे जो उन्हें साथ लाने में मदद करेगा क्योंकि शारीरिक अन्तरंगता के बिना एक सफ़ल रिश्ता लंबे समय तक नहीं टिक सकता।

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