आप क्या करेंगे अगर आपका ड्राईवर 80 की रफ्तार से चलती कार का दरवाजा खोल दे? – 23 जून 2013

मेरा जीवन

जैसा कि मैंने पहले भी बताया है 2005 में जब मैं विदेश दौरे पर था, अपने बहुत से मिलने वाले विदेशियों को भारत आने का न्योता दिया था। हमारा आश्रम हर उस व्यक्ति के स्वागत में तत्पर रहता है जो भारत को नजदीक से देखना चाहता है और हमारे साथ कुछ समय बिताते हुए भारत की संस्कृति और रहन-सहन को गहराई के साथ समझना चाहता है। 2005 में मेरे एक कई साल पुराने दोस्त ने भारत आने का कार्यक्रम बनाया। हमारी मुलाक़ात माइंज में हुई थी जहां मेरे एक मित्र के होटल में मैं ठहरा था। यह दंपति उस होटल का नियमित ग्राहक था और वह हमारा दोस्त बन गया। बाद में मैं कई बार उनके घर भी गया था और अब वह भारत आ रहा था। भारत आए हुए अभी उसे कुछ घंटे ही हुए थे और उनकी याद आने पर वह हर मिलने-जुलने वाले को उसके बारे में बताता रहता है। मैं बताता हूँ कि वह ऐसा क्यों करता है।

मेरा यह दोस्त अंग्रेज़ (ब्रिटिश) है मगर जर्मनी में रहता है। वह अंग्रेजों की गंभीरता और जर्मन्स के अनुशासित व्यवहार, दोनों से परिचित था। जैसे ही वह भारत पहुंचा उसे तुरंत भारतीयों की जबर्दस्त भावनात्मकता और भारतीय यातायात की कभी न खत्म होने वाली अफरा-तफरी का अनुभव हुआ।

दरअसल, सबसे पहले मेरे भाई पूर्णेन्दु द्वारा, जो उसे लेने विमान-तल पर गया था, उसका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया। वह इस बात से बहुत खुश हुआ क्योंकि निकास-द्वार पर ही टॅक्सी ड्राईवरों की भीड़ ने उसे घेर लिया था और सभी एक स्वर में उसे अपनी तरफ बुला रहे थे। पूर्णेंदु उसके साथ टॅक्सी तक गया और टॅक्सी-ड्राईवर ने उसका सूटकेस टॅक्सी में रख दिया। दोनों टॅक्सी में बैठे और कार चल दी। जैसे ही टॅक्सी विमान-तल के बाहर निकली हमारा अंग्रेज़ मित्र कार की सीट कसकर पकड़कर बैठ गया जैसे उसकी जान निकली जा रही हो। क्यों? क्योंकि दिल्ली का सामान्य यातायात शुरू हो चुका था! ड्राईवर को न सिर्फ साइकल रिक्शा, दूसरी कारों, बसों और ट्रकों के बीच में से अपनी कार निकालकर ले जानी थी बल्कि पैदल चलने वालों, कुत्तों, गधों और बैलों के बीच से भी।

जब वे हाइवे पर पहुंचे, उसे लगा कि अब सब कुछ ठीक हो जाएगा और उसने राहत की सांस ली। यहाँ यातायात कुछ कम था, पैदल चलने वाले भी कम थे, सड़क कुछ चौड़ी थी। हालांकि यहाँ भी कई खतरनाक मोड़ों पर कार बुरी तरह हिचकोले खाती, लहराती थी मगर यहाँ हालत कुछ ठीक थी। अब कार ने रफ्तार पकड़ी। 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पर हमारे अंग्रेज़ दोस्त को लगा कि इस रफ्तार की आवश्यकता नहीं है और न ही यातायात इतना कम है कि इस रफ्तार पर गाड़ी दौड़ाई जाए। फिर भी वह अब थोड़ा संयत हो चुका था क्योंकि कहीं भिड़ जाने का डर, जो इतनी देर से हर पल उसे सता रहा था अब नहीं हो रहा था। लेकिन फिर अचानक कुछ हुआ: ड्राईवर ने दरवाजे के हैंडल की तरफ हाथ बढ़ाकर उसे खोल दिया।! यह देखना था कि हमारे मित्र के मुंह से चीख निकाल गई: नो! वह चिल्लाया! ड्राईवर कार के बाहर कूदना चाहता था! वह क्या करे? कार बिना ड्राईवर के किसी पेड़ से टकरा जाएगी, या किसी दूसरी कार से या किसी भी चीज़ से! हेल्प! वह चीखा।

तो लगभग ऐसी उसकी हालत थी जब 80 किलोमीटर की रफ्तार से गाड़ी दौड़ाते हुए ड्राईवर ने अपना दरवाजा खोला। पूर्णेन्दु ने उसकी चीखें सुनकर उसकी तरफ देखा कि क्या हुआ। पीक थूकने के लिए ड्राईवर ने दरवाजा खोला था और थूकने के बाद वह भीतर आ गया था। चीख उसने भी सुनी थी इसलिए उसने दरवाजा बंद किया और रियर- व्यू मिरर में देखा कि मामला क्या है? क्या हो गया इस अंग्रेज़ को?

मेरे दोस्त का दिल तेज़ी से धडक रहा था। उसके मन में कई तरह के संभव हादसों के दृश्य एक के बाद एक आकर गुज़र चुके थे। वह सोच रहा था कि क्या वह ड्राईवर की सीट पर जाकर स्टीयरिंग संभाल ले! जब पूर्णेन्दु ने पूछा कि क्या हुआ, उसके मुंह से कुछ क्षण तक जवाब ही नहीं निकला और फिर यथार्थ उसके सामने खुला: ड्राईवर ख़ुदकुशी करना नहीं चाहता था! उसने थूकने के लिए दरवाजा खोला था और कुछ नहीं! अभी उसे तंबाखू और सुपारी के बारे में कुछ पता नहीं था।

इस यात्रा ने मेरे मित्र के मन में विश्वास पैदा कर दिया कि भारत में कुछ भी हो सकता है!

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