एकाकी व्यक्ति की मदद करने के बदले में मिली हावी होने की तीव्र इच्छा – 17 फरवरी 13

अपनी यात्राओं के दौरान मैं किस्म किस्म के लोगों से मिलता रहता हूं। पिछले कुछ हफ्तों में मैंने आपको बताया भी था कि सन 2005 में एसोटेरिक्स (आधुनिक अध्यात्मवादी) से कई बड़ी दिलचस्प मुलाकातें हुईं। मैं हीलिंग, योग और ध्यान के सत्र कर रहा था तो ज़ाहिर है कि मैं हमेशा ‘ऊर्जा’ में रुचि रखने वाले लोगों से घिरा रहता था। कई बार मुझे ऐसा महसूस होता था कि इस बारे में उनकी आस्था मेरी तुलना में अधिक गहन थी। इन लोगों में एक बात मैं नोट किया करता था कि इनमें से अधिकतर घोर एकाकीपन की समस्या से ग्रस्त थे।

पश्चिमी देशों में सालोंसाल सैंकड़ों व्यक्तिगत सत्रों के दौरान मैंने अकसर यह सुना कि लोग खुद को अकेला महसूस करते थे और इस बात से नाखुश थे कि उनके जीवन में ऐसे लोग नहीं हैं जो उन्हें प्यार दे सकें या वे लोगों को प्यार दे सकें। जीवन में आदान और प्रदान दोनों का बराबर महत्व है। इन लोगों को इस बात की कमी सालती थी ज़िंदग़ी में कभी भी उन्हें स्नेहभरा स्पर्श नहीं मिला। यह बात भी उन्हें उतना ही दुख पहुंचाती थी उनके जीवन में कोई ऐसा नहीं है जिसको उनकी जरूरत हो, जिसकी जरूरतों के बारे में वे सोच सकें या बस यूंही किसी के काम आ सकें।

सन 2005 में एक ऐसे ही व्यक्तिगत हीलिंग सत्र के दौरान एक महिला से मेरी मुलाकात हुई। उसने बताया कि बचपन में उसके पिता उसका यौन शोषण करते रहे। इस अनुभव ने उसके दिल पर गहरे ज़ख्म छोड़े और यही कारण है कि उसके जीवन में कभी कोई पुरुष नहीं रहा। उसे इस बात का कोई अफसोस नहीं था उसका कोई प्रेमी नहीं था। हां, ज़िंदग़ी में बच्चों की कमी उसे ज़रूर सालती थी। मैंने उसे कहा,” आप मुझे अपना बेटा मान सकती हैं।“

मैं उसे इस अहसास से मुक्ति दिलाना चाहता था कि वह इस दुनिया में नितांत अकेली है और इसीलिए मैंने घनिष्ठ मैत्री का सुझाव दिया था। मैं कई बार उसके घर गया और उसे भारत में मेरे घर आने का निमंत्रण भी दिया। वह भारत आई भी और उसे बहुत अच्छा लगा। मैं स्वभावतः अपनी भावनाओं को साझा करने में गुरेज़ नहीं करता था और साथ ही उसकी भावनाओं को भी सुनता था। मुझे यकीन था की हमारी इस दोस्ती ने उसके एकाकीपन के अहसास को कम करने में मदद की थी।

कुछ समय तक तो सब कुछ ठीक चलता रहा। मेरे ख्याल से वह वास्तव में मुझसे प्यार करती थी परंतु कुछ समय बाद मुझे लगने लगा कि इस प्यार में उम्मीदें बहुत थीं। वह मुझ पर अधिकार जताने लगी थी। शायद वह चाहती थी कि मैं बिल्कुल उस जैसा बन जाऊं। उसकी उम्मीदें पूरी करना मेरे लिए नामुमकिन था और न ही मैं यह करना चाहता था। मेरे विचार से गहरी दोस्ती वह होती है जहां दो अलग अलग व्यक्तित्व एक दूसरे को प्यार देते हैं किंतु फिर भी जीवन के प्रति अपना अलग अलग नज़रिया रखते हैं, धारणाएं रखते हैं। उसकी धारणाएं, उसका ज़िंदगी जीने का तरीक़ा और खासकर उसकी एसोटेरिक अवधारणाएं मैं अपने जीवन में कदापि स्वीकार नहीं कर सकता था और न ही करना चाहता था।

मुझे लगने लगा था कि वह मुझ पर अपना नियंत्रण चाहती थी, वह चाहती थी कि मैं भी उसकी तरह सोचने लगूं। बातों ही बातों में कई बार उसने मुझे इशारा भी दिया कि वह सोचती है कि उसकी मृत्यु के बाद उसके मकान का क्या होगा। उसने मुझे साफ शब्दों में कहा भी कि यदि हम दोनों साथ रहें और जैसा वह चाहती है वैसा मैं करूं तो मैं उसके मकान का वारिस बन सकता हूं। इस सारे प्रकरण में मेरी ऊर्जा नष्ट होने लगी थी। मैं मानसिक तौर पर कमजोरी महसूस करने लगा था और मेरे शरीर पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ने लगा था।

मैं अपनी तरफ से भरसक कोशिश की मगर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया। इस महिला के जीवन के खालीपन को भरने के बजाए, उसके एकाकीपन को कम करने के बजाए, मैं एक अजीब सी भावना से ग्रस्त हुआ जा रहा था। मैं यह भी जानता था कि यह सब बहुत लंबा नहीं चल सकता था। जो भी हो रहा था वह न मेरे लिए श्रेयस्कर था और न ही उसके लिए। अंततः मैंने अपने मन की बात उसके सामने रख दी और और हमारे संबंध का अंत हो गया। इस सारे प्रकरण से एक बात जो उभरकर सामने आई वह यह कि कुछ अवधारणाएं, कुछ विश्वास मेरी जीवनशैली से मेल नहीं खाते थे।

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