काम सिर्फ कल्पना कर लेने भर से हो नहीं जाते! 15 जून 2014

मेरा जीवन

हर साल की तरह सन 2006 में मैंने और यशेंदु ने कुछ नई जगहों का दौरा किया था। जो लोग वहाँ हमारे कार्यक्रमों का आयोजन करते थे उनमें से सिर्फ बहुत थोड़े से लोगों को ही हम अपने पिछली यात्राओं के समय से ही जानते थे। कई दूसरे मेरी वेबसाइट देखने और ईमेल द्वारा मुझसे संपर्क करने के बाद या फिर हमारे विदेशी परिचितों से हमारे बारे में सुनकर ही मुझे या मेरे भाई यशेंदु को जानते थे। दरअसल, जब आप ऐसे किसी अपरिचित के पास जाते हैं तो कभी नहीं जान सकते कि आगे कौन सा आश्चर्य आपका इंतज़ार कर रहा है -और हालाँकि हम ईमेल द्वारा हमेशा सब कुछ पहले से जानने की कोशिश करते हैं, 2006 में हमें अपने आयोजकों के साथ एक से एक बढ़कर आश्चर्यजनक अनुभव प्राप्त हुए। उदहारणस्वरुप ऐसा ही एक अनुभव आज मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूँ।

एक दिन मुझे अपने इनबॉक्स में एक महिला का ईमेल प्राप्त हुआ। उसने अपने एक मित्र के मित्र से हमारे बारे में सुना था। यह मित्र जर्मनी में आयोजित हमारे पिछले कुछ कार्यक्रमों में शामिल हो चुका था। तो इस सुने-सुनाए परिचय के बाद उसने हमारी वेबसाइट पर थोड़ा-बहुत हमारे बारे में पढ़ा और मुझे और यशेंदु को अपने यहाँ आमंत्रित करते हुए ईमेल किया। हम तो ऐसे न्योतों का स्वागत करने के लिए सदा तैयार ही रहते हैं, लिहाज़ा उसके सामने हमने अपनी कार्यशालाओं, ध्यान और योग सत्रों आदि का पूरा ब्यौरा रख दिया। उसके बाद हमारे बीच ईमेलों का काफी जीवंत आदान-प्रदान होता रहा।

तब तक मैं और यशेंदु अभी भारत में ही थे और उसके साथ अपने कार्यक्रमों के लिए एक नियत दिन पर सहमत हो गए। जल्द ही उसने अपने आयोजन में होने वाले कार्यक्रमों का पूरा ब्यौरा हमें भेज दिया और हमें वह बहुत पसंद आया। वह आयोजन हमारे द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली सभी चीजों के मिश्रण जैसा था और जो उसने लिखा था वह भी बड़ा उत्साहवर्धक था-उसके अनुसार इस तरह के कार्यक्रमों और कार्यशालाओं की उसके इलाके में बहुत ज़रुरत महसूस की जा रही थी और इसलिए उनकी मांग बहुत ज़्यादा है। बाद के उसके ईमेलों में उसने बड़े उत्साह के साथ इन कार्यक्रमों को प्रमोट करने की रूपरेखा समझाई और इन सब बातों से हम बड़े खुश थे।

इसका उसने पहले भी संकेत किया था और अब उसने विस्तार से बताना भी शुरू कर दिया था कि कैसे वह बहुत से पत्रकारों के संपर्क में है, जिनमें से कई तो प्रतिष्ठित टीवी चैनलों, रेडिओ-स्टेशनों और अख़बारों के लिए काम करते हैं। उसने कहा कि उसे भरोसा है कि हमारे इन कार्यक्रमों के विषय में जर्मनी के मुख्य टीवी चैनलों पर एक संक्षिप्त सी क्लिप, एक छोटा सा विज्ञापन वह लगवा देगी। मैं कई बार और कई देशों में पहले भी टीवी पर आ चुका था और जानता था कि इसका हमारे कार्यक्रमों पर कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए मैं बड़ा खुश था कि वह हमारे कार्यक्रमों की सफलता के लिए चिंतित है और उसके लिए इतना प्रयास कर रही है और इसलिए हम उसे और प्रेरित कर रहे थे कि जब तक हम वहाँ रहें वह उनसे हमारे कार्यक्रमों की फिल्म बनाने के लिए भी कहें।

तो इस तरह अपने कार्यक्रमों के लिए दिल में आशा और उत्साह लिए हम इस महिला के यहाँ पहुँचे। वहाँ के कार्यक्रमों से पहले मैं और यशेंदु हफ़्तों से उनकी तैयारियों में व्यस्त रहे थे इसलिए आयोजन की तैयारियों के बारे में हमें कोई जानकारी भी नहीं हो पाती थी। फिर भी हमने अपने पहुँचने की सूचना दे दी थी और वह हमें लेने भी आ गई थी। रेलवे स्टेशन से घर जाते समय कार में हमने आपस में बातें कीं और मुझे और यशेंदु को थोड़ा आश्चर्य हुआ और हँसी भी आई: वह कह रही थी कि हालाँकि लोगों को आध्यात्मिकता की ज़रुरत है मगर अभी वे उसके लिए तैयार नहीं हैं!

आगे उसने कहा कि उसने उन सभी टीवी चैनलों और रेडिओ स्टेशनों को, जहाँ उसके अनुसार उसकी जान-पहचान के लोग थे, सन्देश भेज दिए थे लेकिन एक का भी उसे प्रत्युत्तर प्राप्त नहीं हुआ! मैंने जर्मनी के एक प्रमुख टीवी चैनल में मौजूद उसके परिचित के विषय में उससे पूछा तो उसने बताया कि वह उस व्यक्ति को बहुत अच्छी तरह से जानती है और उसके घर का नंबर पता भी उसके पास है मगर उस व्यक्ति ने उसके मिलने के प्रयासों का कोई जवाब ही नहीं दिया!

संक्षेप में कहें तो तथ्य यह था कि उसने कहीं कोई विज्ञापन दिया ही नहीं था। यह सब उसके दिमाग की उपज था, न तो कहीं कोई पत्रकार था और न ही कोई प्रशिक्षार्थी या सहभागी- आखिर कहाँ से आते, जब किसी को आयोजन के बारे में कुछ पता ही नहीं था?

शुरुआत में यह आघात जैसा था। स्वाभाविक ही हम उस पूरे हफ्ते जमकर काम करने का विचार मन में लिए हुए थे। लेकिन बाद में हमें एहसास हुआ कि अब जो हो गया है उसे उसी तरह स्वीकार करने के सिवा हमारे पास कोई चारा भी नहीं है- इस विषय में हम कुछ भी करने की स्थिति में नहीं थे! आखिर हमने उसके घर में एक सप्ताह आराम से और सुखपूर्वक गुज़ारा और घर में ही एक ध्यान सत्र का आयोजन भी कर लिया, जिसमें भाग लेने के लिए उसने अपने सभी मित्रों को आमंत्रित कर लिया था।

कभी-कभी हम सोचते कुछ हैं और होता कुछ और है।

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