मेरे जीवन का सबसे बुरा वक़्त: जब मैंने अपनी बहन को खो दिया – 28 सितम्बर 2014

सितम्बर 2006 में, वृन्दावन में परिवार के साथ उल्लासपूर्ण समय बिताने के बाद मैंने दक्षिण अफ्रीका के लिए उड़ान भरी। वहाँ मुझे बहुत थोड़े समय के लिए रुकना था और उसके बाद मेरे जीवन में आज तक का सबसे दुखद समय आने वाला था।

जिस तरह मैं हर जगह पहुँचते ही अपने काम में व्यस्त हो जाता था, यहाँ भी अपने व्यक्तिगत सत्रों, कार्यशालाओं और व्याख्यानों में व्यस्त हो गया। कुछ दिन बाद, 18 सितम्बर 2006 के दिन सबेरे-सबेरे मेरे पास फोन आया। जर्मनी से यशेंदु का फोन था। भरे गले से आँसुओं में भरकर उसने मुझे वह भयंकर खबर दी और एक भाई द्वारा दूसरे भाई को दी जा सकने वाली सबसे दर्दनाक खबर मैंने सुनी: एक कार हादसे में हमारी बहन का देहांत हो गया है।

उस रात पूर्णेंदु और परा विमान तल की ओर निकले हुए थे। परा को जर्मनी के लिए उड़ान भरनी थी, जहाँ वह यशेंदु से मिलने वाली थी और बाद में मैं भी उनके साथ शामिल होने वाला था। वह जर्मनी की उसकी दूसरी यात्रा थी।

लेकिन अब वह अपनी अंतिम यात्रा पर निकल चुकी थी। कार हादसा हुआ था। पूर्णेंदु अस्पताल में भर्ती था। यशेंदु ने कहा, वह तुरंत वापसी का टिकिट कटा रहा है।

मेरे हाथ-पाँव काँप रहे थे। मैं पसीने से लथपथ हो रहा था और कुछ मिनट तक मेरे लिए कुछ भी सोच पाना नामुमकिन हो रहा था। फिर मैंने अपने पिताजी को फोन किया और कहा कि मैं तुरंत पहुँच रहा हूँ।

दिल्ली के लिए अगली उड़ान दुबई से होते हुए जाती थी। मैंने टिकिट खरीदा और तुरंत विमान तल की ओर रवाना हो गया। मैं अपनी भावनाएँ व्यक्त करने में असमर्थ हूँ। उससे पहले और उसके बाद आज तक मैंने वैसा आघात, वह दर्द नहीं झेला। और पहले अविश्वास और फिर यथार्थ का एहसास होते ही पुनः भयंकर टीस। मेरी आँखों से एक आँसू नहीं निकला। किसी तरह मैंने कुछ घंटों का वह बेहद लम्बा सफ़र तय किया, जीवन की सबसे कठिन, सबसे तकलीफदेह उड़ान।

दूसरे दिन सबेरे मैं दिल्ली पहुँचा। अस्पताल में मेरे माता-पिता और यशेंदु मेरा इंतजार कर रहे थे। पूर्णेंदु अस्पताल के अपने कमरे में था। उसके एक पैर की हड्डी टूट गई थी और उस पर प्लास्टर चढ़ा था। इसके अतिरिक्त उसे कोई खतरनाक चोट नहीं थी। कहीं-कहीं खुरच गया था, मामूली चोटें थीं और यहाँ-वहाँ सफ़ेद पट्टियाँ बंधी हुई थीं। इतने बड़े हादसे को देखते हुए कुल मिलाकर वह ठीक-ठाक ही था। हादसे से ठीक पहले वह नींद में था और उसके बाद बेहोश। उसे बहुत देर बाद अस्पताल में ही होश आया। परा के देहांत की दर्दनाक खबर उस तक पहुँचाने का कठिन काम मुझे ही करना पड़ा।

जैसे ही पूर्णेंदु को अस्पताल से छुट्टी मिली, हम अस्पताल से परा के मृत शरीर को लेकर वृन्दावन की ओर निकल पड़े। रास्ते में फोन करके हमने वहाँ लोगों को अंतिम संस्कार की सब तैयारियाँ करने की सब हिदायतें दे दीं। आवश्यकता से अधिक एक पल भी हम ज़ाया नहीं करना चाहते थे। सभी आँसुओं में डूबे हुए थे, अम्माजी अपनी इकलौती बेटी की मृत्यु की खबर सुनकर टूट चुकी थीं और अभी यह जानलेवा खबर नानी को देना बाकी था, जो हमारा इंतज़ार कर रही थीं, इस त्रासदी की भयावहता से पूरी तरह अनजान।

आश्रम में लोग अंतिम संस्कार की तैयारियाँ शुरू कर चुके थे और इसलिए नानीजी को अंदाजा हो चुका था कि कुछ न कुछ बहुत बुरा घटित हो चुका है। हमारे परिवार के लिए वे कुछ घंटे किसी अँधेरी खोह की मानिंद थे, जिसमें से होकर अब हमें गुज़रना था।

हर कोई रो रहा था लेकिन मुझे रोने के लिए न तो समय मिल रहा था और न कोई ऐसी जगह, जहाँ जी भरकर आँसू बहा सकूँ। ऐसा लगता था जैसे मेरा मन अभी भी मानने को तैयार नहीं है कि वास्तव में इतना बड़ा हादसा हो चुका है। यहाँ तक कि एक बार मैंने बहन के शव पर पड़ा सफ़ेद कपड़ा उठाकर उसके चेहरे को गौर से देखा जैसे विश्वस्त होना चाहता होऊँ कि वास्तव में वह जा चुकी है। वही थी। मृत।

उसके मृत शरीर को हम दाह संस्कार की जगह लेकर आए। पैर टूटा होने के कारण पूर्णेंदु नहीं आ पाया। मृत्यु को मैंने पहले और बाद में भी कई बार देखा है मगर वह पल मेरे जीवन का आज भी सबसे दर्दनाक समय बना हुआ है: जब हमने अपनी बहन की देह के नीचे रखी लकड़ियों में आग लगाई। वह चली गई।

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