पश्चिमी देशों में एकाकी वृद्धों की समस्या – 14 अप्रैल 2013

मेरा जीवन

2005 में जिन लोगों से मैं मिला उनमें एक अवकाश प्राप्त अधेड़ भी था जिससे मेरे दोस्ती हो गई थी और जिसने अपनी कथा मुझसे साझा की थी। मैं पहले भी उससे मिलते-जुलते बहुत से प्रकरण देख चुका था मगर क्योंकि इससे मेरे घनिष्ठता हो गई थी इसलिए इस प्रकरण को मैंने अधिक विस्तार से जाना और उसने मेरे सामने यह स्पष्ट किया कि अपने परिवार से अलग जीने की पश्चिमी पद्धति मानसिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से उचित नहीं है, खासकर बुढ़ापे में। वह उन्हें एकाकी बना देती है।

अपने नए मित्र की कहानी सुनते हुए बार-बार मुझे मुख्य रूप से यही महसूस हुआ। अपनी पत्नी के साथ रहने के बावजूद वह एकाकी था। उसके ज़्यादा नजदीकी मित्र नहीं थे और उनके पारिवारिक संबंध भी मजबूत नहीं थे। इसके विपरीत अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ उसका वाद-विवाद और झगड़ा भी होता रहता था।

मुझे वह भावनात्मक रूप से बहुत विक्षुब्ध प्रतीत हुआ, अपने गुस्सैल पिता द्वारा शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित और सारी दुनिया से खफा और निराश। मेरा यह अनुमान तब पक्का हो गया जब उसने बताया कि वह दो बार आत्महत्या की कोशिश भी कर चुका था, ज़ाहिर है असफल रहा।

मेरी इच्छा थी कि उसकी कुछ सहायता करूँ और हम दोस्त बन गए। मैंने सोचा कि जब कोई अकेलापन महसूस करता है तो उनकी सहायता करने के लिए कुछ खास नहीं करना पड़ता, सिर्फ उनके साथ बने रहिए।

तो मैं उसके साथ रहा। उसने अपने घर कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए मुझे आमंत्रित किया और मैं चला गया। कार्यक्रम हमेशा की तरह बड़ा सफल रहा। वह नई जगह थी और कार्यक्रम के दौरान बहुत से लोगों से मिलकर उसे अच्छा लगा। वह सोच रहा था कि कम से कम कुछ लोगों से तो वह दोस्ती कर ही सकता है और यह जानकर मुझे भी बड़ी खुशी हुई। मैंने भी उसे आमंत्रित किया और कुछ समय बाद वह अपनी पत्नी के साथ भारत आया।

जब हम और नजदीक आए, उसने मुझे भाई कहना शुरू कर दिया क्योंकि पहले उसने किसी के साथ ऐसा भ्रातृवत संबंध महसूस ही नहीं किया था, यहाँ तक कि अपने सगे भाई से भी नहीं। मेरे लिए यह ठीक ही था-भारत में तो जिसे आप चाहें संबंधी बना लेने का चलन आम है, किसी को भी आप भाई, बहन, चाची या चाचा कह सकते हैं, यह दर्शाने के लिए कि उन्हें आप इन रिश्तों जितना ही करीबी और अपना समझते हैं।

लेकिन उसके लिए यह बड़ा ज़बरदस्त अनुभव था और पुनः मुझे दोनों संस्कृतियों के बीच के अंतर का एहसास हुआ। भारत में आम तौर पर परिवारों में कोई न कोई रिश्तेदार आपके आसपास होता है जो उसी घर में निवास करता है, आप उसके साथ दिन-रात बातचीत करते हो, जिसके साथ आप समय गुजारते हो और जिस पर आपका किसी भी दूसरे व्यक्ति से अधिक भरोसा होता है। परिवारों में बंधन आम तौर पर बड़े मजबूत होते हैं।

पश्चिम में, जैसा कि मैं इस व्यक्ति को और कई दूसरे व्यक्तियों को देखकर भी कह सकता हूँ कि वहाँ लोग इस बात को बड़ा महत्व देते हैं कि आप पूर्णतः स्वतंत्र रहें। वे परिवार के साथ नहीं रहना चाहते। अगर आप वैसा करते हैं तो आपको कमजोर समझा जाता है, अर्थात आप इतने मजबूत नहीं हैं कि अकेले रह सकें, अपना बोझ खुद उठा सकें। बचपन से ही सिखाया जाता है कि उन्हें खुद अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। अगर आपने अपना जीवन साथी खोज लिया है तो ठीक है। अगर आपके बच्चे हैं तो आप उनकी युवावस्था तक उनके साथ रह सकते हैं लेकिन उसके बाद, जब आप खुद बूढ़े हो जाएंगे, आपको अकेले रहना होगा।

लोगों को इससे तकलीफ है मगर यही वहाँ का यथार्थ है और उन्हें यह स्वीकार करना पड़ता है। वे अपने परिवार से निराश होते हैं, पूरी व्यवस्था से ही दुखी हैं मगर सच्चाई यही है कि यह एक सामान्य बात है। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता और एक के बाद एक पीढ़ियाँ गुज़रती रहती हैं, अपनी वृद्धावस्था अकेलेपन में व्यतीत करते हुए, अपने प्रियजनों के विरह में, अपने परिवार के प्रेम की कमी महसूस करते हुए।

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