समलैंगिकता का विरोध नहीं, बल्कि स्वीकृति योग का काम होना चाहिए – 1 जून 2014

मेरा जीवन

मैंने आपको पिछले हफ्ते बताया था कि सन 2006 में कैसे मेरा एक पुरुष समलैंगिक मित्र हर वक्त अपने आपसे संघर्ष करता रहा था क्योंकि उसका योग गुरु, हर मामले में जिसकी सलाह वह माना करता था, समझता था कि उसकी समलैंगिकता अनुचित है। स्वाभाविक ही उसकी इस समस्या के बारे में सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ था कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि उसे ऐसा गुरु स्वीकार करना है और यह भी कि क्यों ऐसी धारणा रूढ हो गई है कि योग के अनुसार समलैंगिकता एक समस्या है।

यह बात कि समलैंगिक होना एक ऐसी बीमारी है, जिसे ठीक किया जा सकता है और ठीक किया जाना चाहिए, पूरी तरह धर्म और परम्पराओं पर आधारित है अर्थात इस विश्वास पर कि औरत और मर्द ही साथ रह सकते हैं। पुराने ज़माने में लोग सोचते थे कि वह सब जो प्रचलित मानदंडों के अनुसार नहीं हैं, गलत है और उसका इलाज किया जाना ज़रूरी है। दुर्भाग्य से कुछ कठमुल्ला, पुरातनपंथी योगी, जो समयानुसार नहीं बदलते, आज भी यह विश्वास करते हैं कि अपने समलिंगी की ओर आकर्षण का होना अप्राकृतिक भावना है। और क्योंकि वे हर बीमारी का इलाज योग द्वारा करने चाहते हैं इसलिए सोचते हैं कि किन्हीं काल्पनिक अवरोधों को दूर करके वे समलैंगिकता नामक इस "बीमारी का इलाज" भी कर लेंगे।

समलैंगिकता के बारे में यह मूर्खतापूर्ण खयाल यहीं से आया है। लेकिन अगर आप योग के मूल आशय को समझेंगे तो वह है, स्वानुभव या जो जैसे हैं, वैसे ही बने रहें। योग हमें सिखाता है, अपने भीतरी और बाहरी व्यक्तित्व का स्वीकार, जैसे भीतर हैं वैसे ही बाहर भी दिखाई दें, भीतर बाहर में कोई द्वंद्व न रहे। मैं समझता हूँ कि हर पुरुष और महिला समलैंगिक जानता है कि वह भीतर से समलैंगिक है। किसी व्यक्ति का यौन रुझान उसकी अंदरूनी दुनिया का हिस्सा होता है और इसलिए मैं यह विश्वास करता हूँ कि योग को भी मूल रूप से समलैंगिकता को स्वीकार करना चाहिए न कि उससे संघर्ष करना चाहिए। लेकिन उसे खुले आम, सब के सामने स्वीकार करना अपने आप में बहुत कठिन काम है।

एक पुरुष या महिला समलैंगिक के रूप में संभवतः आपने लोगों के मूर्खतापूर्ण तर्कों को सुना होगा, जिनमें वे आपके समलैंगिक रुझान के विरुद्ध आपको तरह-तरह की बातें समझाने की कोशिश करते हैं। आप योग के पास सिर्फ शारीरिक व्यायाम के लिए ही नहीं बल्कि ध्यान और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने भी आते हैं। तो फिर, अगर आपको किसी गुरु की ज़रुरत है ही, तो भी आप अपने लिए किसी ऐसे गुरु को कैसे चुन सकते हैं, जो आपकी समलैंगिकता को ही स्वीकार नहीं करता?

ऐसा करके क्या आप अपने लिए मुश्किलें नहीं खड़ी कर रहे हैं? न सिर्फ आप अपने लिए पहचान का संकट खड़ा कर रहे हैं बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह भी नहीं कर पा रहे हैं। आपको इस व्यक्ति का पूरी तरह अनुगमन करना होता है और आप उसकी बातों पर कभी कोई प्रतिवाद भी नहीं कर सकते। गुरु से दीक्षा लेने का अर्थ यही है। इसलिए या तो आप अपनी पहचान का परित्याग कर दें या फिर आप गुरु-शिष्य परंपरा को मानना बंद कर दें।

तो फिर गुरु बनाते ही क्यों हैं?

बहुत समय पहले मैंने महसूस किया था कि गुरुवाद एक ऐसी चीज़ है, जो सिर्फ उन्हीं लोगों के लिए मुफीद है, जो अपनी पहचान खोने के लिए तैयार हैं।

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