अपनी बहन के साथ अंतिम रक्षाबंधन – 21 सितंबर 2014

मेरा जीवन

2006 की गर्मियों में कुछ समय स्वीडन में अपने मित्रों के साथ गुज़ारने के पश्चात् मैं अपने संगीतकार के साथ पुनः जर्मनी आ गया और फिर वहाँ से अगस्त माह में वापस भारत लौट आया-हमेशा से कुछ जल्दी।

उसके पहले मैं सालों से पूरी गर्मियाँ यूरोप में ही बिताता रहा था, अगस्त माह तक लगातार काम करते हुए और कभी-कभी सितम्बर तक भी। कभी-कभी मैं जन्माष्टमी लन्दन में बिताता था, आश्रम में नहीं, जहाँ इस त्यौहार पर हम बड़ा उत्सव मनाया करते हैं। लेकिन इस बार कार्यक्रम कुछ दूसरा था: यशेंदु और मैं मध्य अगस्त में भारत वापस आकर लगभग एक माह यहाँ बिताने वाले थे और बाद में यशेंदु तो अंतर्राष्ट्रीय योग प्रशिक्षण कार्यक्रम हेतु पुनः जर्मनी जाने वाला था और मैं दक्षिण अफ्रीका, जहाँ मुझे कुछ कार्यक्रमों के लिए आमंत्रित किया गया था।

इस कार्यक्रम के मुताबिक हम दोनों ही रक्षाबंधन पर घर पर रह सकते थे। रक्षाबंधन एक पारिवारिक समारोह होता है, जिसमें भाई और बहनें सामान्यतः, जहाँ तक हो सके, एक साथ रहने का प्रयास करते हैं। बहनें भाइयों की कलाइयों पर राखी बांधती हैं और भाई बहनों को कुछ पैसे उपहारस्वरूप देते हैं और बहनें उन्हें मिठाई खिलाती हैं। इस तरह सहोदर भाई-बहनों के बीच संबंधों का यह उत्सव होता है। आप मेरी बहन, परा की ख़ुशी का अनुमान लगा सकते हैं जब उसे पता चला कि कई वर्षों के अन्तराल के बाद इस वर्ष हम दोनों समय पर वापस आकर रक्षाबंधन के दिन उसके साथ होंगे!

स्वाभाविक ही वह अद्भुत दिवस था। मेरा परिवार आपस में बेहद करीब था और आज भी है, हम सब आपस में भावनात्मक, संवेदनात्मक और मन-वचन और कर्मों से जुड़े हुए हैं और यह अनुभव करने के लिए हमें शारीरिक रूप से साथ होना आवश्यक भी नहीं है। लेकिन जब ऐसा संभव हो ही गया तो उन अनुभूतियों को इतनी शिद्दत के साथ महसूस करना अद्भुत अनुभव था!

15 दिन बाद हमने राधाष्टमी एक साथ मनाई। क्योंकि संयोग से उस दिन मेरे स्वर्गीय दादाजी, श्रद्धेय श्री बिंदु जी का जन्मदिन भी होता है, हम लोग इस दिन को कुछ अतिरिक्त उत्साह के साथ मनाते हैं। जिन स्कूलों में हम बच्चों की शिक्षा प्रायोजित कर रहे थे हमने उन सभी बच्चों को आमंत्रित किया था और उनके तथा उस वक़्त विदेश से आए आश्रम के अनेकानेक मेहमानों के सान्निध्य में शानदार पार्टी का लुत्फ़ उठाया। हमने संगीत-कार्यक्रम रखा था और लोगों को बहुत से उपहार प्रदान किए और एक विशाल भंडारा का भी आयोजन किया था, जिसमें सभी को सुस्वादु भोजन कराने के साथ उनके बीच मिठाइयाँ भी बांटी गईं।

एक साथ दो समारोह! पीछे मुड़कर देखने पर लगता है, वह हमारे जीवन का सबसे सुखद समय था। जब समारोह संपन्न हुए, यशेंदु जर्मनी निकल गया और मैंने साऊथ अफ्रीका की ओर प्रस्थान किया। इरादा यह था कि एक हफ्ते बाद दोबारा जर्मनी में मिला जाए, न सिर्फ मैं और यशेंदु बल्कि परा भी, जिसके लिए यह जर्मनी की दूसरी यात्रा होती!

मुझे उस वक़्त नहीं पता था कि वह हमारी अंतिम बिदाई थी, हम आखिरी बार गले मिल रहे थे, एक दूसरे को अंतिम बार छू रहे थे।

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