दुनिया भर के राजाओं की एक सी रुचियाँ: पैसा, युद्ध और औरतें – 17 जनवरी 2016

Apra

हमने पुनः एक परिपूर्ण सप्ताह गुज़ारा और आज मैं इस दौरान हुए अपने रोमांचक अनुभव के बारे में आपको थोड़ा-बहुत बताना चाहता हूँ!

शायद आप पहले ही अपरा के नाना के आश्रम आगमन के बारे में जानते होंगे। वे वर्ष की शुरुआत में भारत आए थे और पिछले गुरुवार की शाम तक यहाँ रहे। इस तरह वे हमारी प्यारी बेटी, अपरा के जन्मदिन पर भी यहाँ रहे। उस पार्टी के बारे में मैं आपको पिछले रविवार के ब्लॉग में पहले ही बता चुका हूँ।

पार्टी के पश्चात् और उपहारों को खोलकर देखने और अपरा द्वारा उनमें से एक, राजकुमारी वाली शानदार ड्रेस पहनकर देखने के बाद हम लोग वापस सामान्य दिनचर्या में वापस आ ही रहे थे कि कुछ दिन बाद ही एक और अवसर हमारे सामने उपस्थित था: हम परिवार सहित मेरे ससुर के साथ जयपुर घूमने जाने वाले थे! हालांकि वे कई बार यहाँ आ चुके हैं लेकिन अभी तक सिर्फ दिल्ली के कुछ ऐतिहासिक स्थान, ताजमहल और आगरा का लाल किला और स्वाभाविक ही वृंदावन के मुख्य-मुख्य स्थान भर देखे थे! इस बार हम उन्हें कुछ और आगे ले जाना चाहते थे!

हमें लगा, यह सबसे आसान और सही निर्णय होगा कि हम वहाँ कार से जाएँ। वृंदावन से जयपुर की यह सिर्फ चार या पाँच घंटे की कार यात्रा थी और वहाँ से दिल्ली की यात्रा भी लगभग उतना समय ही लेती है, जहाँ से हम उन्हें समय रहते वापस जर्मनी के लिए बिदा करना चाहते थे।

इसलिए हम बुधवार को सबेरे वृंदावन से रवाना होकर दोपहर को जयपुर पहुँच गए। नाश्ता-वाश्ता करके हम तुरंत ही शहर के प्रसिद्ध और दर्शनीय स्थानों की ओर रवाना हो गए और सबसे पहले ऊँची चढ़ाई चढ़कर आमेर का किला देखा। मेरे लिए दोबारा वहाँ आना बड़ा सुखद रहा। सन 2008 में मैं और रमोना कुछ दिनों के लिए जयपुर आ चुके हैं लेकिन उस समय यहाँ बड़ी गर्मी थी। इस बार मौसम बड़ा सुहावना था और हम सबने किले के लंबे गलियारों में घूम-घूमकर बहुत खूब आनंद लिया और उसके विशाल, सुंदर और मेहराबदार दरवाजों और ऊँचाई से नीचे दिखाई देने वाले सुंदर नज़ारों को जी भरकर देखा। इसके अलावा राजा की बारह रानियों के लिए निर्मित अलग-अलग महलों को भी! हम लोग मज़ाक-मज़ाक में चर्चा करते रहे कि दुनिया भर में राजाओं के एक जैसे शौक रहे हैं: पैसा, युद्ध और औरतें!

अपरा के लिए जैसे यह राजा-महाराजों, रानियों और राजकुमारियों की उस दुनिया में पहुँच जाने जैसा था, जिनकी कहानियाँ उसने सुन रखी थीं। वह जानना चाहती थी कि राजा कहाँ बैठकर खाना खाते थे, कहाँ सोते थे, क्या पहनते थे। आमेर के किले में और उसके बाद जयपुर के सिटी पैलेस में उसे उन सब चीजों को देखने का मौका भी मिला।

रमोना के पिताजी के लिए, जो अपने इलाके के विशाल बवेरियन किलों के बारे में अच्छी तरह जानते हैं, यह जानना बड़ा रुचिकर था कि भारतीय उच्चवर्गीय परिवार किस तरह राज करते थे और कैसा जीवन गुज़ारते थे-और मेरे ख़याल से उन्हें जयपुर में जंतर-मंतर सबसे अच्छा लगा। वह एक खगोलशास्त्रीय स्मारक है, जिसमें विभिन्न पत्थरों पर सूरज की किरणों से बनने वाली छाया का उपयोग ठीक-ठीक समय बताने में किया जाता है और साथ ही किसी समय में कोई बच्चा किस राशि में पैदा हुआ है, यह और यहाँ तककि उसका लग्न भी उस खगोलीय यंत्र से पता किया जा सकता है। वह वाक़ई बहुत रोचक है और यह जानना कि उसे सैकड़ों साल पहले बनवाया गया था, अपने आप में अत्यंत प्रभावशाली और आश्चर्यचकित करने वाला है!

हम गुरूवार को दिल्ली आए और रात को बढ़िया खाना खाने के बाद अपने ससुर को दिल्ली विमानतल पर भावभीनी बिदाई दी। यह सोचते हुए हमने उन्हें गुडबाय कहा कि यह जुदाई ज़्यादा दिनों की नहीं है-और वैसे भी आधुनिक तकनीकी उपकरणों की मदद से अपने लोगों को अपने नजदीक महसूस करना बहुत सुलभ हो गया है!

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