गुरु के रूप में जीने का मोह – पश्चिम में भी लोग गुरु बनना चाहते है- 22 सितंबर 2013

मेरा जीवन

आस्ट्रेलिया में मेरे और भी कई आयोजक थे जिनसे मैं इंटरनेट के जरिये परिचित हुआ था। 2005 के अपने आस्ट्रेलिया प्रवास के दौरान उनमें से एक व्यक्ति ऐसा भी था जिसके पास संपत्ति के रूप में एक बहुत बड़ा फार्म-हाउस था। आज मैं आपको उसके साथ बिताए अपने समय के बारे में बताना चाहता हूँ।

वह अपने फार्म पर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहता था और उसके पास बहुत सारे जानवर भी थे। उसके फार्म में गाएँ और बकरियाँ थीं, घर में पालतू जानवर थे और दूसरे भी बहुत से जानवर थे, जो इतने विस्तृत इलाके में बड़े अच्छे लगते थे। घर लकड़ी का बना था और उन्हें बल्लियों का आधार देकर बनाया गया था जिसके कारण वह ज़मीन से थोड़ा ऊपर था। उसने बताया कि यह घर उसने अपने हाथों से बनाया है!

लेकिन, यह मित्र और उसकी गर्लफ्रेंड किसान नहीं थे! सच तो यह है कि मित्र एक नाइट-क्लब में सफाई कर्मचारी था। उसके काम का समय भी अजीबोगरीब था, और यह स्वाभाविक ही था, क्योंकि नाइट क्लब बंद होने के बाद, तड़के सबेरे ही उसका काम शुरू होता था। लेकिन कुछ घंटे बाद ही वह वापस आ जाता था और बड़े सुनियोजित ढंग से मेरे कार्यक्रमों की व्यवस्था करता था। इससे उसे अपने काम से छुट्टी भी लेनी नहीं पड़ती थी।

इतनी सारी गायों, बकरियों सहित, इतना बड़ा फार्म वह कैसे खरीद पाया? इस प्रश्न का उत्तर हमारे बीच शुरू हुए लंबे वार्तालाप की शुरुआत था।

जब वह युवा था तब एक भारतीय गुरु से आस्ट्रेलिया में ही उसकी मुलाक़ात हुई थी। वह उसका शिष्य बन गया। न जाने कैसे अपने गुरु से उसका संपर्क समाप्त हो गया था मगर वह आज, दस साल बाद भी उस गुरु की जीवन-चर्या से इतना प्रभावित था कि उसने स्वयं भी गुरु बनने के प्रयास शुरू कर दिये थे। उसका यह फार्म अपने इस उद्देश्य की पूर्ति की तरफ बढ़ते एक कदम की तरह था। दूसरा कदम था, खुद अपने व्याख्यान देना, प्रवचन करना। और, स्पष्ट ही, मुझे निमंत्रित करने का उद्देश्य भी इसी से संबन्धित था।

मैं गुरुवाद के प्रति अपनी अरुचि के बारे में लोगों को अक्सर बताता रहता हूँ और हमने भी मेरे पिछले जीवन के बारे में बातें कीं। मैंने उससे यह भी नहीं छिपाया कि मैं गुरु बनने से इतना ऊब गया था कि मैं वह सब पूरी तरह से छोड़ देना चाहता था। उसका जवाब ऐसा था जिसे मैंने आज तक कभी नहीं सुना था: सुनिए, आप वही सब कुछ छोड़ आए हैं जिसे मैं प्राप्त करना चाहता हूँ, करना चाहता हूँ और वैसा ही बनना चाहता हूँ!

लेकिन सिर्फ गुरु बनकर जीवन यापन कर पाना इतना आसान नहीं है-असल में उतना आगे तक बहुत कम लोग पहुँच पाते हैं। दो वक़्त की रोटी कमाने और जीवित रहने के लिए उन्हें कोई दूसरा काम भी करना पड़ता है और इसीलिए वह नाइट क्लब में काम करता था। "लेकिन इसमें भी फायदा है", उसने बताया, "हम अपनी कार्यशालाओं और ध्यान-सत्रों के लिए उसी नाइट क्लब को दिन में किराए पर ले लेंगे!"

जी हाँ, तो इस तरह मेरी कार्यशाला उस नाइट क्लब में आयोजित की गई। दिन के समय, ऐसी जगहें कुछ अजीब सी लगती हैं: दीवालों पर काला कपड़ा चढ़ाया हुआ होता है, हर तरफ डिस्को लाइट होते हैं और स्वाभाविक ही, साफ दिखाई देता शराबखाना भी होता है।

फिर भी हमारा कार्यक्रम बहुत बढ़िया रहा और हमने बहुत सुखद समय एक साथ बिताया। वह मेरा दोस्त बन गया और बाद में एक बार हमसे मिलने भारत भी आया।

लेकिन मुझे लगता है कि वह विश्व-प्रसिद्ध गुरु बनने के अपने मक़सद में कामयाब नहीं हो पाया!

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