शामनिज्म (ओझागिरी) और योग के बीच संघर्ष – 8 जून 2014

मैंने आपको बताया था कि मेरे एक समलैंगिक पुरुष मित्र की अपने गुरु के साथ अनबन हो गई थी क्योंकि उसका गुरु उसकी यौन प्रवृत्तियों को स्वीकार नहीं करता था। यह उसका एकमात्र आतंरिक संघर्ष नहीं था- एक और कारण से उसके भीतर उथल-पुथल मची हुई थी, जिसे उसने मेरे अलावा मेरे और भी कई मित्रों के साथ साझा किया था: जिस तरह वह योग की तरफ आकृष्ट था उसी तरह वह शामनवाद की तरफ भी आकृष्ट था। लेकिन योगी शाकाहारी होते हैं जबकि शामन मांसाहारी होते हैं! यह एक रोचक द्वंद्व है, जिस पर 2006 में मैंने बहुत विचार किया था।

इस द्वंद्व में पड़े मेरे एक दोस्त ने मुझे सारी स्थिति से अवगत कराया क्योंकि मैं नहीं जानता था कि आखिर इस शामनवाद में क्या-क्या सन्निहित होता है। हाँ, इतना सुना था कि वे लोग मांस बहुत खाते हैं। मैंने यह अफवाह भी सुनी थी कि वे पशुओं की बलि चढ़ाते हैं-और मेरी नज़र में यह एक बहुत क्रूर और अमानवीय प्रथा है, विशेषकर उनके संदर्भ में जो अपने आपको आध्यात्मिक कहते हैं!

मेरे एक मित्र ने बताया कि यह सच है कि जो लोग शामनवाद में रुचि रखते हैं वे साधारणतया बल्कि अक्सर ही शाकाहारी नहीं होते, भले ही वे ईश्वर की पूजा-अर्चना के लिए अपने खरगोश या अपने गिनी पिग की हत्या न करते हों। इस तरह वे उस क्रूर हत्या से अवश्य दूर रहते हैं मगर मांसाहारी होने के कारण इन हत्याओं में परोक्ष रूप से थोड़े से शामिल तो होते ही हैं!

मेरे दोस्त ने कहा कि ठीक यही उसकी समस्या थी! वह इस विचार के प्रति आकृष्ट था, जिसमें बहुत से कर्मकांड होते हैं, हर जीव में, हर चीज़ में, यहाँ तक कि पत्थरों में, पेड़-पौधों में और आंधी-तूफान में भी आत्मा होने का दर्शन होता है। लेकिन इसके बावजूद वह न सिर्फ योगिक दर्शन का अनुसरण करता था बल्कि योगिक खान-पान में भी विश्वास रखता था! वह पक्का शाकाहारी था और हाल ही में उसने पूरी तरह शाक-सब्जियों पर गुज़ारा करना शुरू कर दिया था- और यह शाकाहार का फैशन शुरू होने से बहुत पहले की बात है!

एक तरफ तो आप कहें कि हर जीव में आत्मा होती है और फिर उन जीवों का मांस खाएं? मृत पशुओं का? उसने मुझसे उस उत्तर का ज़िक्र किया जो उसका हर शामनवादी मित्र दिया करता था: खाने से पहले हम उस पशु का धन्यवाद करते हैं कि उसने हमारा भोजन बनने के लिए अपने जीवन की कुर्बानी दी।

जी नहीं! सिर्फ इतने से ही उसका मांस खाना उचित नहीं हो गया। वह नहीं समझता कि सिर्फ ‘धन्यवाद’ कह देने भर से उस पशु की तकलीफ कम हो जाती है और न ही उसकी कुर्बानी की कीमत अदा होती है।

मैंने उसके द्वंद्व को समझा और उससे कहा कि उसे शाकाहारी ही बने रहना चाहिए और अपने शाकाहार के व्रत पर ही चलना चाहिए। ऐसे रास्तों पर जाना ही क्यों, जो आपको ठीक नहीं लगते? यह ठीक है कि आप अपने लिए कुछ कर्मकांड तय कर लें और अपने जीवन में उनका पालन करें। आप हवाओं और बारिश, सूरज और चाँद के साथ बात करना चाहते हैं तो अवश्य कीजिए। अपने तरीके से कीजिए, अपने शब्दों में कीजिए।

अपना स्वत्व न छोड़ें मतलब आप जो हैं, वही बने रहें। अपनी संवेदनाओं को स्वीकार करें, उनका आदर करें और वही सुनें जो आपका शरीर और मन-मस्तिष्क कहता है। तब किसी तरह का द्वंद्व नहीं रह जाएगा!

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