इन्सान के दिमाग, भावनाओं और व्यवहार का अद्भुत लचीलापन- 15 सितंबर 2013

मेरा जीवन

2005 में, सिडनी के आसपास कुछ समय रहने के बाद आस्ट्रेलिया के विभिन्न इलाकों में मुझे दो हफ्ते और रहना था। अब मुझे याद नहीं है कि मैं कितनी जगहों पर इस दौरान घूमा और कितना समय, कहाँ-कहाँ गुज़ारा! लेकिन एक व्यक्ति के साथ अपनी मुलाक़ात मुझे आज भी याद है, जिसके साथ मिलने का मौका मुझे अगले साल फिर मिलने वाला था। मुझे यह भी अच्छी तरह याद है कि दूसरे साल उससे मिलकर और उसमें आए अभूतपूर्व परिवर्तन को देखकर मैं कितना अचंभित रह गया था।

इस व्यक्ति से मेरी मुलाक़ात मेरे आयोजक के घर पर हुई और तुरन्त ही हम एक दूसरे को पसंद करने लगे। वह वाकई बहुत सज्जन व्यक्ति था और उससे बात करना बड़ा दिलचस्प अनुभव था। स्वाभाविक ही, सबसे पहले वह मेरे पास व्यक्तिगत सत्र हेतु आया था। उसकी पत्नी उसे छोड़कर जा चुकी थी और वह मुझसे सलाह मांगने और भावनात्मक सहारे के लिए आया था। हम बातें करते रहे, करते रहे और हमारे बीच बहुत अच्छा वार्तालाप हुआ। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं किसी ऐसे दिन उससे मिल सकता हूँ, जब मैं उस दिन जैसा व्यस्त न होऊँ। उसने मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि वह मुझे घर से आकर ले जाएगा और आसपास की जगहें दिखाएगा। मैंने मान लिया और हमने इसके लिए तारीख और समय तय कर लिया।

वह आया और मुझे गाड़ी में बिठाकर आसपास की दर्शनीय जगहों की सैर कराने ले गया। हमने बातें की, हंसी मज़ाक किया। मैंने उसे भारत के बारे में और अपने चैरिटी कार्यों के बारे में बताया और उसने आस्ट्रेलिया के इतिहास, अपने व्यक्तिगत जीवन आदि के बारे में बताया। फिर हम खाना खाने एक रेस्टारेंट में गए। हमने वास्तव में एक अविस्मरणीय दिन गुज़ारा और एक सज्जन, दयालु और कहने को एक ‘सामान्य’ व्यक्ति की तरह वह मेरे जेहन में बना रहा।

अगले साल, स्वाभाविक ही, मेरे आने की खबर उसे मिल गई थी और उसी जगह पर फिर मेरी मुलाक़ात उससे हुई। वह भीतर आया तो उसे देखकर मैं पहचान नहीं पाया कि यह वही व्यक्ति है जिसके साथ साल भर पहले मैंने एक पूरा दिन घूमते-फिरते बिताया था! उसके कान और चेहरे पर जगह-जगह छिदा (piercing) हुआ था! पिछली बार वह जींस और टीशर्ट पहने हुए था, मगर इस बार उसने आंशिक रूप से चमड़े के बने, अजीब तरह के काले कपड़े पहने हुए थे, जिनमें उसका सफ़ेद चेहरा हल्का पीलापन लिए हुए दिखाई पड़ता था। इसके अलावा टैटू थे-बहुत सारे, जिनसे उसकी ऊपरी बाँहों पर ‘सजावट’ की गई थी।

यह पिछले साल की तुलना में इतना अधिक अलग पहनावा था कि उसे देखकर मैं बहुत आश्चर्य में पड़ गया। खैर, वह पहला आदमी नहीं था जिसके शरीर पर टैटू (गोदना) बने हुए थे या जिसके नाक-कान छिदे हुए थे इसलिए मैंने शालीनता के साथ उसका स्वागत किया। अपने पुराने दोस्त से पुनः मिलकर मुझे बड़ी खुशी हुई थी। उसके बाद हमारी बातचीत शुरू हुई और उसने बताया कि उसके जीवन में भारी परिवर्तन आ गया है; मेरे चेहरे पर लिखे आश्चर्य को पढ़ते हुए उसने जोड़ा "मैं अब एक समलैंगिक हूँ!"

मैं जीवन में पहले समलैंगिक से मिल रहा था, ऐसा भी नहीं था और वह भी जीवन के उत्तरार्ध में समलैंगिता अपनाने वाला पहला व्यक्ति नहीं था, इसलिए मैंने सहजता से इस जानकारी को जज़्ब कर लिया। फिर उसने मुझे पिछले साल की तरह अपने साथ घूमने का निमंत्रण दिया और यही हमने किया।

और हाँ, बातचीत की शुरुआत में ही मैंने एक और परिवर्तन नोटिस किया। उसकी भाषा और बोलने का ढंग भी बिलकुल बदल गया था, बल्कि मुझे कहना चाहिए कि वह पिछले साल के मुकाबले बहुत खराब हो गया था! हर दूसरे वाक्य में गाली होती थी और ‘फक’ शब्द तो, विभिन्न रूपों में, एक ही वाक्य में कई बार आ जाता था। इस बात से मुझे एक तरह का सदमा पहुंचा था क्योंकि मेरी नज़र में हमारी सहज, शालीन बातचीत के विपरीत यह सम्पूर्ण पतन की तरह था!

इसमें कोई शक नहीं और मैं जानता हूँ कि यह ‘समलैंगिकता’ के चलते नहीं था और मेरे प्यारे समलैंगिक मित्रों, इस अनुभव से मैं यह नहीं समझ रहा हूँ कि हर समलैंगिक अपने चेहरे छिदवा लेता होगा, सारे शरीर में स्याही पोत लेता होगा या फूहड़ बातें शुरू कर देता होगा! मैं तो सिर्फ यह बता रहा हूँ कि सिर्फ एक साल के भीतर व्यक्ति इतना बदल सकता है कि आप अचंभित हो जाएँ, उसे पहचान न पाएँ!

क्या यह चमत्कार नहीं है कि मनुष्य का दिमाग और उसकी भावनाएँ इतनी लचीली होती हैं!

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