जब मैंने अपने गुरु को बताया कि मैंने अपना गुरु का चोला त्याग दिया है- 17 नवंबर 2013

मेरा जीवन

पिछले हफ्ते मैंने आपको बताया था कि मेरे दोस्त और पुराने शिष्य मेरे विचारों और मेरी दर्शनिक मान्यताओं में आए परिवर्तन को किस तरह जान सके। मैं अब गुरु नहीं रहा था और 2005 आते-आते मेरे आसपास के अधिकांश लोग यह बात जान चुके थे, कम से कम टुकड़ों में। स्वाभाविक ही मेरे परिवार वाले तो जानते ही थे कि मेरे भीतर क्या चल रहा है और मैं भी उनके साथ अपनी भावनाएं साझा करना चाहता था! लेकिन मैं यह नहीं जानता था कि मेरे इन विचारों को जानकर वे लोग क्या सोचेंगे, खासकर मेरे पिताजी, जिन्होंने अपना सारा जीवन एक गुरु के रूप में व्यतीत किया था।

एक अति-धार्मिक गुरु से एक अधार्मिक, सामान्य व्यक्ति में मेरी तब्दीली का संक्रमण-काल काफी लंबा रहा। यह सामान्य है-मैंने अपने जीवन के तीस साल धर्म की सेवा में, एक गुरु के रूप में गुज़ारे थे! परिवर्तन एक दिन में तो होता नहीं है लेकिन 2005 में एक समय ऐसा भी आया जब मैंने पीछे मुड़कर देखा और महसूस किया कि मैं अब तक कितना बदल चुका हूँ और परिवर्तन की यह प्रक्रिया अब भी जारी है! इतने सारे अनुभव और भावनाएँ थीं-और मैं अपने परिवार वालों को सब कुछ बताना चाहता था।

मैं बहुत बचपन में ही अपने पिताजी के साथ भ्रमण करने लगा था। जब मैं बहुत छोटा था तभी से उनके कार्यक्रमों में चला जाता और जब मैं नौ साल का हुआ, वे मुझे अपने साथ स्टेज पर भी बिठा लिया करते थे और कुछ मंत्र और श्लोक आदि सुनाकर मैं उनके कार्यक्रमों में थोड़ा-बहुत योगदान भी किया करता था। उन्होंने मुझे सारी बातें सिखाईं और मुझे अपने तरीके से बात कहने की पूरी स्वतन्त्रता प्रदान की। वे मुझे पुराने धर्मग्रंथों में निहित धारणाओं और सिद्धांतों की नए तरीके से व्याख्या करने और उसके अनुसार अपने विचार रखने के लिए प्रोत्साहित किया करते थे। न सिर्फ वे हजारों दूसरे लोगों के गुरु थे बल्कि मेरे भी गुरु थे और जो कुछ भी मैंने सीखा या जाना वह उन्हीं की देन है।

जब मैं तेरह साल का था, मैंने अपने स्वतंत्र प्रवचन देना और उस किशोरावस्था में ही स्वतंत्र रूप से भ्रमण करना भी शुरू कर दिया था। मुझे लोकप्रियता प्राप्त हो रही थी और मुझे हमेशा ख्याल रहता था कि यह सफलता मुझे अपने पिताजी द्वारा प्रदत्त ज्ञान के चलते ही मिल रही है। अगर मैं उनसे कहता कि मैं यह सब छोड़ रहा हूँ तो उन्हें कैसा लगता? अगर मैं उन्हें बताऊँ कि मैं पूरी तरह बाहर नहीं हुआ हूँ, लेकिन अब मेरे और अपने गुरु के पुराने अवतार के बीच दूरी पैदा हो गई है?

सन 2000 में अपने गुफावास से बाहर निकलने के बाद मैंने दुनिया भर का सफर किया और हालांकि उतने समय के लिए मेरे परिवार वाले मेरे दैनिक जीवन से बहुत हद तक अनभिज्ञ रहा करते थे मगर वे पहले ही मेरे अंदर धीरे-धीरे आ रहे कुछ बदलावों को देख और महसूस कर रहे थे। वे जान गए थे कि घुटने का लिगामेंट टूटने के बाद से मैं रोज़ की जाने वाली हवन-क्रिया अब नहीं कर रहा हूँ। उन्होंने यह भी नोटिस किया कि भारत में प्रवचन देने में मेरी अब रुचि नहीं रह गई है। वे यह भी देख रहे थे कि पहले अक्सर मुझसे मिलने आने वाले अपने शिष्यों से मेरा संपर्क टूटता जा रहा है। जब मैं गुफा में निवास कर रहा था तब भी ये लोग नियमित आया करते थे लेकिन अब उनका आना लगभग बंद हो गया है।

अपने परिवार में हम सभी आपस में बहुत खुले हुए हैं और किसी से कोई बात छिपी नहीं रह सकती थी, इसलिए मैं इसे लेकर परेशान नहीं था-फिर भी मैं यह अनुमान लगाने में असमर्थ था कि मेरे पिताजी इस बारे में क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे! क्या वह मुझसे निराश होंगे? क्या वह मुझे समझने की कोशिश करेंगे या समझ पाएंगे? मुझमें आए इन परिवर्तनों के विषय में वे क्या महसूस करेंगे?

हमारे बीच हुए वार्तालाप के बारे में मैं आपको अगले हफ्ते बताऊंगा।

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