एक कदम आगे बढ़ाकर सम्बन्धों में निकटता पैदा करें: सामने वाले को ‘दोस्त’ कहकर पुकारें -16 जून 2013

यूरोप में विभिन्न जगहों पर कुछ और कार्यक्रम प्रस्तुत करने के बाद 2005 में, बारिश के मौसम की समाप्ति पर मैं वृन्दावन वापस लौटा। यही वह समय था जब जर्मनी से मेरे एक नए मित्र ने यहाँ आकर मुझसे और मेरे परिवार से मिलने की योजना बनाई। जब वह यहाँ थी, आपसी सम्बन्धों के बारे में उसके नज़रिये ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया। मुझे समझ में आया कि भारत में और जर्मनी में सम्बन्धों की निकटता की दृष्टि से ज़मीन आसमान का अंतर है।

मैं सारी बात आपको समझाकर बताता हूँ। यह महिला 2005 में मेरी आयोजक थी और मेरी उस यात्रा के दौरान मैं उसके शहर दो बार गया था। उस वक़्त उसने भारत आकर ताजमहल देखने की इच्छा ज़ाहिर की थी। लंबे समय से यह उसकी इच्छा थी कि भारत भ्रमण करे लेकिन कभी हिम्मत ही नहीं हुई। क्योंकि अब उसकी एक भारतीय से मित्रता हो गई थी, उसने अपने इतने पुराने सपने को साकार करने का निर्णय किया। वैसे भी मैं अपने विदेशी मिलने वालों को भारत आने का न्योता दे ही आता था और खुश भी था कि वह मेरे निवेदन पर भारत आने का कार्यक्रम बना रही है।

जब उसने कहा कि वह भारत आना चाहती है तो यह भी बताया कि वह अकेले नहीं घूमना चाहती इसलिए अपनी एक मित्र को भी लेकर आ रही है। इससे हमें कोई एतराज़ नहीं था, हम उन्हें एयरपोर्ट लेने गए और आश्रम ले आए। हमने उन्हें शहर घुमाया और ताजमहल दिखाने आगरा भी ले गए। हमें बहुत अच्छा लगा और उसे तो कब समय निकल गया, पता ही नहीं चला।

एक दिन बातों-बातों में मैंने पूछा, "आपका और आपके मित्र का समय कैसा रहा?" या ऐसा ही कुछ, सीदा-सादा, सामान्य सा सवाल। प्रतिक्रिया में उनका जवाब बड़ा सख्त सा था। महिला ने कहा, "ओह नहीं, वह मेरी मित्र नहीं है! वह महज एक सहयात्री है!"

मैंने उसकी तरफ बड़े आश्चर्य से देखा और पूछा, "क्या वाकई वह आपकी मित्र नहीं है?" "नहीं, यहाँ आने से पहले मैं उसे सिर्फ दो-तीन माह पहले से जानती थी!" उसने कहा। मैं चकित रह गया कि आप कई महीनों से एक-दूसरे को जानते हैं और फिर आपने पूरा भारत उसके साथ घूमा-फिरा और आप लोग अभी मित्र भी नहीं बन पाए?

इससे मुझे पता चला कि हर एक का संबंध स्थापित करने का तरीका भिन्न-भिन्न होता है। मैं आपको मित्र कह सकता हूँ मगर हो सकता है कि आप मुझे महज एक साधारण परिचित मानते हों! भारत में तो किसी को भी तुरत-फुरत अपना रिश्तेदार बना लेना आम बात है। कोई भी अपरिचित, मिलते ही आपका भाई हो जाता है या चाचा-चाची!

मैंने मन में सोचा: क्या भारतीय कुछ ज़्यादा ही सतही और दिखावटी होते हैं और क्या वे नजदीकी सम्बन्धों का ढोंग भर करते हैं? क्या हमारी मेहमान ठीक ही कहती है कि जब वह अपने सहयात्री को पर्याप्त नजदीक से नहीं जानती तो फिर वह उसकी मित्र कैसे हो सकती है? आखिर वह उसकी आंतरिक भवानाएँ तो अभी ठीक तरह से नहीं जानती, उसके अतीत के बारे में भी उसे पूरी जानकारी नहीं है और उसने अपने दिल के कोने-अंतरे भी उस पर ज़ाहिर नहीं किए हैं!

लेकिन मैंने तय किया है कि मैं तो लोगों के साथ नजदीकी रिश्ता बनाना पसंद करूंगा। अगर किसी को मित्र बनाने में आप सालों निकाल देंगे तो आपके बहुत कम मित्र बन पाएंगे। मैं बहुत से लोगों को अपना मित्र बताता हूँ और भले ही वे निकटता के विभिन्न स्तरों पर हों, मुझे लगता है कि सिर्फ मित्र कहने भर से ही वे दिल के करीब महसूस होने लगते हैं। मेरा विश्वास है कि लोगों को आप अपने मित्र या रिश्तेदार की तरह देखते हैं तो सम्बन्ध तुरंत ही भावनात्मक हो उठते हैं; आप सामने वाले के बारे में बेहतर महसूस करने लग जाते हैं और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को जानने-समझने का आपको अवसर प्राप्त होता है।

तो इस तरह, जब वह जाने लगी, मैंने अपनी मित्र को बिदा किया सिर्फ अपने मेहमान को नहीं।

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