धनवान और पैसे के प्रति उनका अजीबोग़रीब रवैया – 24 फरवरी 13

मेरा जीवन

मैं ज़िंदगी भर लोगों को यही समझाता रहा हूं कि पैसा आपको खुशी प्रदान नहीं कर सकता और पैसा ही जीवन में सब कुछ नहीं है। पूर्व में भी एक गुरु के रूप में मैंने यह देखा है कि अधिकांश अमीर लोग इस अवधारणा को समझने में कठिनाई अनुभव करते हैं। हो सकता है कि उनकी आदतें और सोचने का तरीका इसमें बाधक रहे हों। यह भी हो सकता है कि जिनके पास कुछ खोने के लिए है वे असुरक्षा की भावना के चलते मेरी बात को समझने में कठिनाई अनुभव करते हों। विदेशों में अपनी यात्राओं के दौरान और यहां भारत में भी यह बात मेरे देखने में आई है।

सन 2005 में एक बार एक अमीर महिला ने मेरा कार्यक्रम आयोजित किया। जहां तक मुझे याद पड़ता है उसे काफी धन-संपदा विरासत में मिली थी। उसके साथ मैं काफी व्यस्त रहता था। बहुत लोग आते थे। पूरा दिन व्यक्तिगत सत्र (सेशन) लेने में निकल जाता था और शाम को हमेशा कोई न कोई अन्य कार्यक्रम रहता था। कई बार मैं योग वर्कशॉप या लेक्चर देता था जिनके लिए एक शुल्क निर्धारित था। लेकिन अधिकांश ध्यान शिविरों के लिए दान का प्रावधान था। प्रवेशद्वार पर एक बॉक्स रख दिया जाता था और आने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छानुसार उसमें पैसा डाल सकता था। मैं बहुत खुश था कि इस प्रकार भारत में बच्चों के लिए चल रही चैरिटी योजनाओं के लिए कुछ पैसा इकठ्ठा हो जाता था।

मुझे उस वक़्त भी पता था कि उस महिला के पास पैसे की कोई कमी नही है। पैसे के प्रति उसके अजीबोग़रीब रवैये की पहली बानगी मुझे तब देखने को मिली जब वह व्यक्तिगत सत्रों, वर्कशॉप और यहां तक कि दान में आये एक एक पैसे की गिनती करती थी। इसमें छुपाने वाली कोई बात थी भी नहीं परंतु इस पैसे को लेकर जिस तरह वह खुशी और गर्व महसूस करती थी और जिस दर्प की भावना के साथ वह उस पैसे को मुझे सौंपती थी,वह मुझे अच्छा नहीं लगता था। मैं पैसे के लिए वहां नहीं आया था। मैं उसके घर आया था क्योंकि मैं उसे पसंद करता था और वह मुझे।

खैर, मैं उसके इस रवैये की तरफ ज्यादा ध्यान भी नहीं देता था। लेकिन एक दिन ऐसा वाकया हुआ कि मुझे ध्यान देना पड़ा। वहां युवाओं का एक ग्रुप मेरे प्रत्येक ध्यान शिविर में आता था। उनके पास ज्यादा पैसे नहीं होते थे लेकिन वे हर बार थोड़ी बहुत रेज़गारी दान के रूप में वहां रखे हुए बॉक्स में डालते थे। महिला को यह बात पसंद नहीं थी और कई बार उसने इस विषय में अपनी असहमति मेरे सामने व्यक्त भी की थी। मैं इस बारे में अलग विचार रखता था और इसलिए इस संबंध में हमने दोबारा बात नहीं की। अगले दिन शाम के समय एक वर्कशॉप आयोजित की गई थी और उनमें से कुछ युवाओं ने मेरी आयोजक उस महिला से इच्छा प्रकट की वे भी इसमें सम्मिलित होना चाहते हैं लेकिन प्रवेश शुल्क अदा करने के पैसे उनके पास नहीं हैं।

उस दिन ध्यान शिविर के बाद जब हम वार्तालाप कर रहे थे तो उन युवकों ने मुझे बताया कि कल वे नहीं आ पाएंगें क्योंकि आयोजक ने उनसे कहा है कि यदि उनके पास शुल्क अदा करने के पैसे नहीं हैं तो वे अपने घर में बैठें। मैंने देखा कि वे वास्तव में आने के लिए उत्सुक थे और मैं उन्हें पसंद भी करता था। मुझे यह बिल्कुल समझ नहीं आया कि मेरी आयोजक किसी के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकती है! होना तो यह चाहिए कि ऐसी स्थिति में आप स्नेहपूर्ण व्यवहार करें। मैं उन युवकों को एक तरफ ले गया और उन्हें प्रवेश शुल्क के लिए जितना पर्याप्त था उतना पैसा दिया और अगले दिन वर्कशॉप में आने के लिए कहा।

अगले दिन शाम को हमेशा की तरह मेरी आयोजक द्वार पर खड़ी होकर प्रवेश शुल्क एकत्रित कर रही थी। वह यह देखकर भौंचक्की रह गई कि वे युवा आए, प्रवेश शुल्क अदा किया और भीतर प्रविष्ट हो गए!

उस वक़्त उसका चेहरा देखने लायक था। मैंने यह निश्चय किया कि ऐसा दोबारा नहीं होना चाहिए। मैं भविष्य में शुल्क संबंधी कोई भी निर्णय आयोजकों पर नहीं छोड़ूंगा। उस दिन के बाद मैंने अपने प्रत्येक आयोजक को हिदायत दी कि वे लोगों को कार्यक्रम में सम्मिलित होने से ना रोकें, चाहे उनके पास पर्याप्त पैसे हैं या नहीं।

पैसा ही सब कुछ नहीं होता और आप हर चीज़ की कीमत यूरो, डॉलर या रुपए में नहीं आंक सकते!

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