2006 में होली पर घर-वापसी – 9 मार्च 2014

जब 2006 में मेरे आस्ट्रेलिया-दौरे के समापन का वक़्त आया, मैं भारत लौटकर होली का रंगारंग त्योहार मनाने के लिए बेताब हो रहा था!

पिछली बार मैं जब आस्ट्रेलिया में था तो भारतीय समुदाय के साथ ही रहा करता था लेकिन इस बार मैं अधिकतर आस्ट्रेलियन्स के साथ रह रहा था। वे सब योग शिक्षक, विश्रांति शिविर चलाने वाले, वैकल्पिक साधना करने वाले, योग-प्रेमी और अलग तरह का जीवन जीने वाले, अध्यात्म या भारत में रुचि रखने वाले लोग थे।

भारतीय समुदाय के साथ अब भी मेरे कुछ संबंध मौजूद थे और वे लोग भी मेरे साथ संपर्क रखे हुए थे और चाहते थे कि एक बार मुझे आमंत्रित कर सकें। मुझे भी इसका अंदेशा था मगर आखिर मुझे लगा कि मैं वहाँ और अधिक रुकना नहीं चाहता और न ही उनके साथ कोई कार्यक्रम करना चाहता हूँ। हालांकि वे अब भारत में नहीं रहते थे फिर भी अभी तक गुरुवादी धारणाओं से प्रभावित और परिचालित थे, जिन्हें मैं पीछे छोड़ चुका था। एक दृष्टिकोण से वे सब, पश्चिमी सभ्यता के बीच इतना समय गुजारने के कारण और कई तो वहीं पैदा होने के कारण कुछ अधिक खुला दिमाग रखते थे लेकिन दूसरे दृष्टिकोण से देखने पर वे भारतीयों से भी ज़्यादा दक़ियानूसी नज़र आते थे। वे अपनी पुरानी परम्पराओं को जीवित रखना चाहते थे और इन परम्पराओं में कई ऐसी थीं, जिनका मैं तब तक बहिष्कार कर चुका था। बहुत ज़्यादा धार्मिक, इस पर बहुत ज़्यादा विश्वास कि कुछ लोग दूसरों से उच्च या बड़ी हैसियत वाले हो सकते हैं।

नहीं, मैं पश्चिमी लोगों के साथ ज़्यादा प्रसन्न रहता था क्योंकि उनसे मेरी मुलाक़ात समान स्तर पर हुआ करती थी। मैं उन्हें मित्र बना सकता था और उनके साथ कुछ साझा कर सकता था, अपना कुछ ज्ञान या अनुभव, जिनसे उन्हें लाभ पहुंचता था। तो मुझे आमंत्रित करने वाला अगला कोई भी फोन आता मैं हर हाल में इंकार ही करने वाला था-और फिर यह सलाह सामने आई: आप अपना दौरा कुछ दिन के लिए बढ़ा लीजिए और होली हमारे साथ यहीं मना लीजिए!

जब मैंने यह सुना तो तुरंत उनसे साफ शब्दों में ‘नहीं’ कह दिया: होली पर मैं हमेशा घर पर रहता हूँ! आगे-पीछे सोचने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी!

होली हमारा पारिवारिक पर्व है। क्या आप साल का कोई ऐसा समय बता सकते हैं जब आप विशेष रूप से सारे परिवार के साथ इकट्ठा होते हैं, उनके साथ शानदार वक़्त गुज़ारते हैं, हँसते-गाते, धूम मचाते और आनंद मनाते! मेरे लिए होली ऐसा ही उत्सव है और उसके लिए मैं परदेस में रहूँ, यह मुझे मंजूर नहीं!

मैंने वह प्रस्ताव आसानी के साथ ठुकरा दिया। और मैंने अपने परिवार को फोन किया। मैं अपनी यात्राओं में उनके साथ फोन पर अधिक बात नहीं करता था। मैं ईमेल के जरिये उनके संपर्क में बना रहता था और अक्सर हमें पता होता था कि हम सभी अपनी-अपनी जगह कुशल-पूर्वक हैं। लेकिन बहुत दिनों बाद, वह भी होलिकोत्सव पर, घर में, परिवार के साथ होने की उत्कंठा के चलते मैंने उन्हें फोन किया।

कुछ समय बाद ही मैं भारत जाने वाले विमान पर सवार था और होली पर पागल कर देने वाली रंगीनियों की कल्पनाओं में डूब गया। होली की मौज-मस्ती मेरा इंतज़ार कर रही थी और मुझे उनके बीच होना ही था!