एक बार 2005 में, जब मैं आश्रम में था और कुछ विदेशी मित्र आश्रम आए तो उन्होंने, स्वाभाविक ही, प्रश्न किया कि मेरे आसपास का वातावरण कैसा है, विशेषकर यह कि मेरे पुराने शिष्यों ने, यह जानकार कि अब मैं उनका ही नहीं किसी का भी गुरु नहीं हूँ, क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की। क्या वे अभी भी मिलते-जुलते हैं? क्या वे मुझे और मुझमें आए परिवर्तन को समझ पाए? और यह कि वे अब मेरे साथ कैसा व्यवहार करते हैं?
कुछ साल पहले ही मैं गुरु का चोला उतारकर फेंक चुका था। मैं 1997 से 2000 तक मैं गुफा में एकांतवास कर चुका था और उसके बाद विश्व-भ्रमण पर निकल चुका था। मैं इतना ज़्यादा घूमता-फिरता था कि कई बार, जब कोई व्यक्ति मुझसे मिलने आता, मैं आश्रम में होता ही नहीं था। मेरे परिवार वाले उन्हें बताते थे कि मैं आजकल ज़्यादातर विदेश में ही रहता हूँ और साल का अधिकांश समय घूमते हुए व्यतीत करता हूँ और बहुत थोड़े समय के लिए भारत आता हूँ। वे बाद में फिर से मुझसे मिलने आते और मुझे न पाकर निराश लौट जाते। धीरे-धीरे उनका आना कम होता गया। कुछ दूसरे भी थे, जो मुझसे फोन पर बात करते और समय तय करके आश्रम आने की कोशिश करते कि मैं वहाँ मिल जाऊँ।
जब कोई पुराना शिष्य मुझसे मिलने आता था और, चाहे वह मेरे वहाँ होने के बारे में पता करके आए या वैसे ही, अगर मैं आश्रम में उनसे बात करने के लिए उपलब्ध हुआ तो मैं उनके साथ बात करता था। मगर अब बात गुरु-शिष्य के रूप में नहीं होती थी। मैं उनके साथ समान स्तर बैठता और बातचीत करता था। मैं उन्हें बताता कि अब मैं पूरी तरह बदल चुका हूँ। अगर मैं देखता कि उनमें मेरी बात समझने का माद्दा है तो उन्हें अपने भीतर आए बदलाव का कारण विस्तार से बताता। कुछ लोग थे जो मेरी बात का थोड़ा-बहुत अर्थ समझ लेते थे लेकिन अधिकांश ऐसे थे जो बिलकुल समझ नहीं पाते थे। अधिकतर उस एक मुलाक़ात के बाद फिर वापस नहीं आए। दरअसल अब मैं वह व्यक्ति नहीं था, जो उन्हें बताता कि किसी परिस्थिति में वे क्या करें। उनके निर्णयों की पुष्टि करने वाला गुरु मैं नहीं रह गया था और न ही मैं उन्हें कोई दीक्षा-आशीर्वाद वगैरह दे सकता था। तो, इस तरह जैसे-जैसे साल गुजरते गए पुराने अनुयायियों के साथ मेरे संबंध कम होते गए।
सबसे अनोखा अहसास मुझे तब होता था, जब कोई ऐसा व्यक्ति मिलने आता, जिसके साथ कई साल से कोई संपर्क नहीं रहा होता, उसने मुझे इतने सालों में एक फोन तक नहीं किया होता और जब वह मुझसे मिलता तो ऐसे, जैसे वह मेरा सबसे करीबी शिष्य रहा हो, जैसे उसके लिए मैं दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हूँ। आज तक उन्होंने मेरी कोई खोज-खबर नहीं ली थी और ऐसा व्यवहार करते, जैसे वे मुझसे इतना प्रेम करते हैं कि मेरे लिए कुछ भी कर सकते हैं!
इस बात ने मुझे बताया कि वह दुनिया कितनी बनावटी थी जिसे मैं छोड़ आया हूँ! वह महज एक झूठा प्रेम था, अपने गुरु के लिए। मेरा संबंध तो विशाल जनसमूह के साथ हुआ करता था मगर उनमें से किसी को भी मुझसे कोई मतलब नहीं था। वे मेरी उतनी ही परवाह करते थे, जितने से उनका कोई मतलब सिद्ध होता था लेकिन ज़रूरत से तनिक भी अतिरिक्त चिंता उन्हें नहीं होती थी।
लेकिन कुछ ऐसे पुराने अनुयायी भी थे, जो उस भीड़ के मुक़ाबले वास्तव में मेरे बहुत करीब भी थे और मैं उन्हें मैं अपने परिवार का सदस्य ही मानता था। मैं उनके साथ संबंध बनाए रखने की पूरी कोशिश करता था। जब विदेश में भी होता था तो फोन पर उनसे संपर्क बनाए रखता था और जब भारत में होता तब भी उनसे अक्सर मुलाक़ात होती रहती थी। मगर कुछ समय बाद मैंने महसूस किया कि मेरे अंदर आए परिवर्तन के चलते उनके साथ भी अब पुराने संबंध बरकरार नहीं रह सकते: मैं अब उनका गुरु नहीं था और वे अभी भी अपने शिष्यत्व से उबर नहीं पा रहे थे! मेरे अंदर आए विचारों और रवैयों में परिवर्तन ने हमारे आपसी संबंधों में दरार पैदा कर दी थी।
इन बातों से जो सबसे मुख्य निष्कर्ष मैं निकाल सका हूँ वह यह है कि मैंने जो कुछ भी किया है, ठीक ही किया है। मैं लोगों के करीब रहना चाहता था, झूठी संवेदनाओं और भावनाओं की दिखावटी और आभासी दुनिया में नहीं बल्कि वास्तविक संसार में रहना चाहता था। मैं वास्तविक मित्र चाहता था, झूठे अनुयायी नहीं।
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