दर्द, नुकसान और राहत – 25 जनवरी 2015

मेरा जीवन

मेरे शरीर का एक हिस्सा उखाड़कर निकाला जा रहा है। यह बड़ा हिंसक और रक्तरंजित है।

मुझे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा है।

प्रतिरोध असंभव है- मेरी ज़बान सुन्न है जैसे लकवा मार गया हो, अस्पष्ट फुसफुसाहटों के अतिरिक्त कुछ भी पैदा करने में असमर्थ।

मैं यह होने दे रही हूँ। मैंने नियति के सम्मुख समर्पण कर दिया है।

मशीनों की खरौंचों, अपने मांस पर चलती आरियों के बीच मैं स्थिरचित्त बैठी हुई हूँ। एक बार आँख झपकाई है, एक बार आह भरी है, बस।

ऊपर तेज़ प्रकाश है। चमकदार, इतना चमकदार कि कमरे का बाकी हिस्सा धुंधले साए में समा गया है। यह रुचिकर नहीं है। लेकिन यह अंत नहीं है।

अचानक मैं कमर सीधी करके नीचे, उधर देखती हूँ जहाँ वह दिखाई दे रहा है जो कुछ समय पहले तक मेरे शरीर का हिस्सा था।

दो टुकड़े, हड्डियों जैसे, चार छोटे-छोटे पैर, मुड़े-तुड़े, टूटे-फूटे।

मैं उनकी अनुपस्थिति महसूस कर रही हूँ, जैसे अपने मांस में कोई सूराख। उनके निशान वहाँ मौजूद हैं।

अलविदा, अक्कल-दाढ़, मेरी अक्कल-दाढ़, अलविदा!

🙂

इस गद्यांश की लेखक: मेरी पत्नी रमोना। परसों दो खराब निचली अक्कल-दाढ़ों को शल्यक्रिया द्वारा निकलवाने के तुरंत बाद लिखा गया। वैसे चिंता न करें, वह स्वस्थ हैं और निश्चय ही नुकसान के एहसास से उबर चुकी हैं।

Leave a Comment