अगर आप किसी भी क्षण मरने के लिए तैयार हैं तो फिर डरने की ज़रुरत नहीं! 31 अगस्त 2014

मेरा जीवन

मैंने स्वीडन में 2006 में हुए आध्यात्मिक उत्सव के बारे में, जहाँ मेरी कई कार्यशालायें आयोजित की गईं थी, पहले आपको बताया था। उस दौरान एक प्राइवेट हवाई जहाज़ पर दिए गए साक्षात्कार के बारे में आज मैं आपको बताना चाहता हूँ!

वहाँ इंग्लैण्ड का एक फिल्म-क्रू भी आया हुआ था, जो उस उत्सव के बारे में एक लघु-चित्र फिल्माने की तैयारी कर रहा था। आयोजन स्थल की विभिन्न जगहों पर जाकर वह विभिन्न कार्यक्रमों की शूटिंग करता और वहाँ मौजूद सहभागियों, कार्यक्रम संचालकों के साक्षात्कार लेता, कुछ कार्यशालाओं को फिल्माता और कुल मिलाकर सारे उत्सव के माहौल को कैमरे में कैद करने की कोशिश कर रहा था।

सारा उत्सव स्वीडन के शानदार प्राकृतिक वातावरण में, जंगल के बीचोंबीच और साल के सबसे सुखद मौसम में आयोजित किया गया था, जब रात का अँधेरा भी वहाँ सिर्फ मध्य-रात्रि में कुछ देर के लिए होता है। इस अंग्रेज़ फिल्म क्रू ने फिल्म को और अधिक रोमांचक और दिलचस्प बनाने के उद्देश्य से उत्सव को ऊपर से अर्थात परिंदों की नज़र से एक छोटे से हवाई जहाज़ में बैठकर शूट करने का निर्णय किया- और चार लोगों के बैठने लायक एक हवाई जहाज़ किराए पर लेकर वहाँ, ऊपर मेरा साक्षात्कार लेने की पेशकश की!

जब मैं हवाई जहाज़ के छोटे से रनवे पर, जहाँ से उसे उड़ान भरना था, पहुँचा, कैमेरामैन और संवाददाता जहाज़ के करीब खड़े दिखाई दिए। मेरे पीछे पायलट आया और जब हम सब एक दूसरे का अभिवादन कर चुके, रिपोर्टर जहाज़ की तरफ देखते हुए बोला: 'पता नहीं, मुझे थोड़ा डर लग रहा है-जहाज़ कुछ ज़्यादा ही छोटा है!' पायलट ने उसे आश्वस्त करने के उद्देश्य से कि कुछ नहीं होगा, हमसे थोड़ा अलग हटने के लिए कहा और जहाज़ में अकेले ही एक छोटी सी उड़ान भरी। जब वह वापस नीचे आया तो रिपोर्टर की तरफ सवालिया निगाहों से देखा-जी हाँ, अब रिपोर्टर कुछ आश्वस्त लग रहा था।

माइक्रोफोन लगे हुए बड़े बड़े इयरफोन लेकर हम सब जहाज़ पर चढ़ गए और जहाज़ उड़ चला! वास्तव में ऊँचाई से उत्सव स्थल का दृश्य बहुत भव्य लग रहा था! आगंतुकों के रहने-सोने के छोटे-छोटे टेंटों के साथ कार्यशालाओं के बड़े टेंट और चारों ओर फैली अद्भुत प्राकृतिक दृश्यावलियाँ!

जहाज़ में बड़ा शोर था मगर इयरफोन लगाकर हम आसानी के साथ बातचीत कर सके। थोड़ी सी बातें हुईं: उसने मेरे पूर्व-जीवन के बारे में पूछा, उत्सव के बारे में कुछ बातें हुईं और उस पर मेरी प्रतिक्रिया ली गई, फिर थोड़ी सी बात मेरी कार्यशाला के बारे में, बस इतना ही। अंत में उसने पूछा 'मुझे तो अब भी थोड़ी घबराहट हो रही है, थोड़ा डर लग रहा है- आपको नहीं लग रहा? इस छोटे से जहाज़ में, लगता है जैसे कभी भी कुछ भी हो सकता है!'

मैंने जवाब दिया कि मुझे वैसा कोई डर नहीं है। स्वभाव से ही मैं डरपोक नहीं हूँ। पहली बात तो यह कि मैं इस तरह, इस दिशा में सोचता ही नहीं हूँ। दूसरे, अगर जहाज़ गिर ही जाता है तो हम सब मारे जाएँगे- लेकिन उसके लिए डरने की क्या ज़रुरत है?

मैं तो यह मानता हूँ कि किसी भी क्षण जीवन का अंत हो सकता है। हर पल हमें उसके लिए तैयार रहना चाहिए, सिर्फ उस समय नहीं जब हम कोई खतरनाक काम कर रहे होते हैं। तो अगर आप हर वक़्त मरने के लिए तैयार हैं तो आपको इस तरह का डर बिल्कुल नहीं लग सकता!

लगभग आधे घंटे बाद हम सुरक्षित नीचे उतर आए- और मैंने बिना किसी भय के उस शानदार नज़ारे को देखने और उसका आनंद उठाने के मौके का पूरा लाभ उठाया!

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