मेरी जर्मन पत्नी और हमारा अन्तरसांस्कृतिक संबंध – 5 जुलाई 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

पिछले दो हफ़्तों से मैं भारतीय पुरुषों और पश्चिमी महिलाओं से बने जोड़ों के बारे में लिखता रहा हूँ। मैंने भारतीय पुरुष और पश्चिमी महिला के मध्य होने वाली ऑनलाइन चैटिंग से अपनी बात शुरू की थी– क्योंकि उन महिलाओं में से अधिकांश उस वक़्त निराश हो जाती हैं, जब उन्हें पता चलता है कि भारतीय पुरुष उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। उसके बाद मैंने उन दंपतियों के सामने, जो वास्तव में अपने संबंधों के प्रति गंभीरतापूर्वक सोच रहे हैं, अपने कुछ विचार रखे थे, जिनमें उन समस्याओं के बारे में बताया गया था, जिनका सामना उन नवदंपतियों को करना पड़ सकता है। स्वाभाविक ही, मुझे ये ब्लॉग लिखने की प्रेरणा न सिर्फ उन दंपतियों से प्राप्त हुई थी, जिन्होंने अपने अनुभव मुझे सुनाए बल्कि खुद अपने दांपत्य जीवन से भी प्राप्त हुई थी। कुल मिलाकर मुझे यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि दूसरे बहुत से अंतरराष्ट्रीय दंपतियों की तुलना में मेरी जर्मन पत्नी, रमोना और मेरे लिए निश्चित ही बहुत आसान रहा!

इसकी शुरुआती सच्चाई यह है कि हमारी मुलाक़ात वास्तव में ऑनलाइन हुई ही नहीं। निश्चय ही हमारे बीच सबसे पहला संपर्क उसके द्वारा भेजा गया एक ईमेल था मगर उसके तुरंत बाद हम रूबरू मिले थे- और फिर एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानने-समझने का पर्याप्त मौका भी हमें मिलता रहा था। हालांकि हमारे बीच भी एकाध बार ऑनलाइन चैटिंग और टेलीफोन पर बातचीत हुई, परन्तु हमें कभी भी इस बात पर शक करने की जरूरत महसूस नहीं हुई कि सामने वाला अपने बारे में सही बता रहा है झूठ, क्योंकि हम जानते थे कि हम जल्द ही मिलने वाले हैं और हमें एक दूसरे के बारे में सच्चाई तथा और भी दूसरी जानकारियाँ प्राप्त हो ही जाएँगी। इसका अर्थ यह था कि हम कभी भी उस तरह असुरक्षित महसूस नहीं किया, जैसा कि ऑनलाइन संबंध बनाने वाले लोग अक्सर महसूस करते हैं- क्योंकि हमारे संबंध की शुरुआत वास्तविक जीवन के ठोस धरातल पर हुई थी।

उस समय हम दोनों ही सशरीर जर्मनी में उपस्थित थे। वास्तव में, उससे मिलने से पहले ही मैं अपने जीवन के सात साल पश्चिमी देशों में गुज़ार चुका था और मुझे वहाँ के लोगों के साथ काम करने, उन्हें जानने-समझने और उनकी मानसिकता के बारे में परिचय प्राप्त करने का पर्याप्त मौका मिलता रहा था। मेरे कई जर्मन मित्र थे और इसलिए मुझे हमारे बीच मौजूद सांस्कृतिक और परंपरागत अंतर का पहले ही काफी अनुभव था। और अक्सर उनकी प्रशंसा करता था, इसलिए मैंने भी मेरी पत्नी के देशवासियों की कुछ चारित्रिक विशेषताओं को अपने जीवन में उतार लिया था। अतः, जब मेरी पत्नी एक भारतीय से पहली बार मिली तो उससे बात करते समय मैं उसके मन को पढ़ सकता था और जान सकता था कि वह किस दिशा में सोच रही होगी।

हम दोनों अपने आपसी प्रेम और संबंध पर फोकस कर सकते थे- और हमें ‘भारत में बसने’ के बारे में सोचने की ज़रूरत ही नहीं थी। हमने अपना पहला साल दुनिया की सैर करते हुए बिताया और हम किसी एक देश में तीन या चार माह से अधिक कभी नहीं रहते थे। हम जर्मनी से भारत आए और फिर कई दूसरे देशों की यात्राएँ कीं। हम बिना इसकी चिंता किए कि हमें किन परिस्थितियों में जीवन गुज़ारना होगा, एक दूसरे के करीब आते चले गए, प्रेम में गहरे आबद्ध होते चले गए। वास्तव में रमोना को उत्प्रवास की वैसी छलांग लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ी क्योंकि सब कुछ क्रमशः, धीरे-धीरे होता चला गया, एक साथ, अकस्मात नहीं।

लेकिन आश्रम में कुछ माह रहने के बाद और हमारे इस निर्णय के बाद भी कि अब सफर कम से कम किया जाए और ज़्यादातर समय घर में रहा जाए, हम असाधारण रूप से बहुत अच्छी परिस्थिति में ही रहे आए। क्यों? क्योंकि हमारा परिवार एक असाधारण परिवार है! जी हाँ, मैं इसे बार-बार दोहरा सकता हूँ और इसीलिए मुझे अपने भाइयों पर, अपने माता-पिता पर अपनी नानी पर गर्व है और मैं उन सबसे इतना प्यार करता हूँ। वे मेरी पत्नी के प्रति इससे ज़्यादा प्रेम और आदर प्रदर्शित नहीं कर सकते थे!

मैं भाग्यशाली हूँ कि मैं एक खुले विचारों वाले परिवार में पलकर बड़ा हुआ। सामने आने वाली किसी भी नई बात को सहजता से ग्रहण करने और उसे जानने-समझने के उनके उत्साह ने यह संभव किया कि मेरी पत्नी उन सभी के दिल में जगह बना सकी और तुरंत सबका प्यार पा सकी। किसी ने कोई प्रश्न नहीं पूछा, किसी नियम के पालन की बाध्यता नहीं थी, कोई शर्त सामने नहीं रखी गईं। इस महिला से मैं प्रेम करता था इसलिए वे भी उससे प्रेम करने लगे।

मुझे लगता है कि मेरी पत्नी और माँ के मध्य संबंध कैसा था, इस विषय में मुझे एक भी अतिरिक्त शब्द लिखने की ज़रूरत नहीं है। वह बहुत प्यार भरा, स्नेहिल संबंध था, जिसके विषय में आप माँ की मृत्यु के बाद लिखे गए मेरी पत्नी के ब्लॉग में पढ़ सकते हैं

मैं यह सब आपको यह बताने के लिए लिख रहा हूँ कि जहाँ लोगों के अपने व्यक्तिगत अनुभवों के चलते मैंने ये ब्लॉग लिखे, वहीं मुझे इस बात की खुशी है कि अपनी पत्नी के साथ मुझे इन बातों का सामना नहीं करना पड़ा। न ही मेरी पत्नी को मेरे परिवार के साथ उन्हें भुगतना पड़ा। दूसरी तरफ, ये ब्लॉग लिखते हुए मैंने एक बार फिर नोटिस किया कि हम कितने भाग्यवान हैं- और रविवार के दिन, जब मैं अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में लिखता हूँ, निश्चय ही आज का रविवार यह सब लिखने के लिए बहुत उपयुक्त सिद्ध हो रहा है!

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं कि आप किसी भी तरह के संबंध में हों, चाहे अंतरसांस्कृतिक हो, अंतर्राष्ट्रीय हो या सिर्फ दो इन्सानों के बीच का संबंध हो, आप भी वैसे ही भाग्यशाली सिद्ध हों जैसे कि हम हमेशा से रहे हैं और आज भी हैं!