मेरे जर्मन मित्र का हमारे आश्रम में विवाह – 14 जुलाई 2013

आज मैं आपको 2005 में हुए एक समारोह की जानकारी देना चाहता हूँ जिसे मैंने स्वयं तो नहीं देखा मगर जिसके बारे में मुझे कई बार बताया गया और जिसके वीडियो मैंने देखे हैं: मेरे दो जर्मन मित्रों का हमारे आश्रम में सम्पन्न विवाह समारोह! चलिये आपको इसके बारे में शुरू से बताता हूँ।

इन मित्रों ने हमसे कहा कि वे भारत आना चाहते हैं। पुरुष मित्र तो कई बार भारत आया था मगर महिला (पत्नी) पहली बार भारत आ रही थी। विवाह के समय होने वाले बहुत से समारोहों और कर्मकांडों के बारे में उन्होंने लोगों से सुन रखा था और उनके वीडियो भी देख रखे थे। वे इन विवाहों की गहमा-गहमी और चमक-दमक से बहुत प्रभावित थे और चाहते थे कि वे आश्रम में ही पूर्णतः भारतीय पद्धति से अपना विवाह रचाएँ। मैंने उनसे कहा कि ऐसा हो सकता है और इस तरह उन्होंने आश्रम आने का और वहाँ विवाह रचाने का कार्यक्रम बनाया। कुछ गलतफहमियाँ भी पैदा हुईं मगर सौभाग्य से कटुता कभी नहीं आ पाई।

वे अक्तूबर में दिल्ली आए और मेरे भाई यशेंदु ने, जो पहले से उन्हें जानता था, एयरपोर्ट जाकर उनका स्वागत किया और उन्हें आश्रम लेकर आया। वे मेरी उपस्थिति की कल्पना से, कि मैं उन्हें दरवाजे पर पहुँचकर गले लिपट जाऊंगा, वे बड़े खुश थे मगर मैं वहाँ नहीं था। मेरे भाइयों ने उन्हें बताया कि मैं आयरलैंड गया हुआ हूँ जहां मेरा कोई कार्यक्रम पहले से तय था। उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि यशेंदु से वे जर्मनी में मिले ज़रूर थे मगर उसे अच्छी तरह से जानते नहीं थे और मेरे दूसरे भाई, पूर्णेन्दु से तो वे बिल्कुल ही अपरिचित थे। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि अब उनका विवाह समारोह कैसे संभव हो पाएगा! मैं नहीं होऊंगा तो सारे क्रिया-कर्म और समारोह कौन सम्पन्न कराएगा?

मुझे बाद में पता चला कि वे नहीं जानते थे कि मैं उन्हें आश्रम में नहीं मिलूंगा। मुझे लगा कि मैंने उन्हें बता दिया था और यह तो था ही कि अपने भाइयों को मैंने उनके आने और विवाह के उनके कार्यक्रम की जानकारी दे दी थी। मेरा कार्यक्रम पहले से ही तय था लेकिन स्वाभाविक ही, सूचना के आदान-प्रदान में गफलत हो गई थी। जैसे वे नहीं जानते थे कि मैं आश्रम में उन्हें नहीं मिलूंगा वैसे ही मैं नहीं जानता था कि वे मुझसे यह अपेक्षा कर रहे थे कि मैं उनके विवाह के कर्मकांड सम्पन्न करूंगा! यह मैं समझ रहा था कि हिन्दू धर्मग्रंथों और उसमें वर्णित हर तरह के संस्कारों में होने वाले कर्मकांडों की मुझे अच्छी जानकारी होने की वजह से वे मुझसे ऐसी अपेक्षा कर रहे थे। लेकिन वे नहीं जानते थे कि अलग-अलग रस्मों के लिए हमारे यहाँ अलग पुरोहित होते हैं। मैंने आज तक किसी का भी विवाह नहीं कराया था। मेरे भाइयों या पिताजी ने भी यह काम नहीं किया था। हम लोग धर्मोपदेशक थे और धर्मग्रंथों पर प्रवचन किया करते थे, जिसमें उनके पदों को गाना, उन्हें लोगों को समझाना और उनकी व्याख्या करना हमारा काम हुआ करता था। आम तौर पर हम कोई कर्मकांड नहीं करते थे। लेकिन हमें कई ऐसे पंडितों का पता था जो ऐसे काम किया करते थे और जब मैंने उन्हें आमंत्रित किया था, यह बात मेरे दिमाग में थी।

इसलिए वे थोड़े से परेशान थे, यहाँ तक कि अपना विवाह भी फिलहाल स्थगित कर देना चाहते थे कि कुछ दिन घूम-घामकर वापस चले जाएंगे। तब पूर्णेंदु ने सोचा कि मुझसे बात की जाए और सीधे फोन पर उनकी बात मुझसे करा दी। मज़ेदार बात यह कि तब भी उन्होंने मुझसे नहीं कहा कि वे यह अपेक्षा कर रहे थे कि मैं आश्रम में रहूँगा। खैर, मैंने उनसे कहा कि मेरा सारा परिवार उनका ख्याल रखेगा और विवाह भी सम्पन्न करवा देगा। यह भी कि वे बिल्कुल परेशान न हों और आराम से, प्रसन्नता पूर्वक अपना समय गुजारें।

सौभाग्य से वे राजी हो गए और मेरे परिवार ने 19 अक्तूबर 2005 को होने वाले उनके विवाह का इंतज़ाम करना शुरू कर दिया। मेरे भाइयों और बहन ने सारा प्रबंध किया: शादी के कपड़ों से लेकर कर्मकांड के लिए वेदी और समिधा और हवन सामग्री जुटाने तक और पुरोहित के इंतज़ाम से लेकर शादी में लगने वाली दीगर वस्तुओं के इंतज़ाम तक। यहाँ तक कि दूल्हा-दुल्हन को कपड़े पहनाना और पूरे कर्मकांड के बारे में कि किस वक़्त क्या किया जाना है, इसकी जानकारी देना, आदि सब कुछ मेरे भाईयों और बहन ने किया और इसके बहुत सारे चित्र लिए और वीडियो भी बनवाई। वह शाम सभी के लिए एक अविस्मरणीय शाम सिद्ध हुई, जिसने उन्हें हमारे परिवार से और आश्रम के साथ गहराई से जोड़ दिया।

हालांकि मैं वहाँ नहीं था, फिर भी मैं बहुत खुश था कि मेरे मित्रों ने अपना विवाह हमारे घर में सम्पन्न कराया। बाद में वे दीवाली मनाने के लिए हमारे आश्रम में कुछ दिन और ठहरे और त्योहार के खानों का कई दिन तक मज़ा लिया। आज भी वे अपने मित्रों से बताते रहते हैं कि कैसे वे आश्रम में हमारे परिवार और सारे आश्रम वासियों के निस्वार्थ स्वागत, खातिरदारी और अपनत्व से बहुत भावविभोर हो गए थे।

मैं खुश हूँ कि इन दो खास मेहमानों का अपने आश्रम में स्वागत करने का बाद में कई बार हमें मौका मिला। वे कई बार हमारे यहाँ आए और हम भी सपरिवार कई बार जर्मनी में उनके यहाँ गए जहां हमारा भी उसी तरह बड़ी आत्मीयता के साथ स्वागत किया गया। और आज मैं यह बताना चाहता हूँ कि जैसे उनका विवाह हमारे घर में हुआ उसी तरह मेरा और मेरी पत्नी का जर्मन विवाह उनके घर में सम्पन्न हुआ था।

Related posts

जब पिता ज़िंदा होकर भी मेरे नहीं थे…

जब पिता ज़िंदा होकर भी मेरे नहीं थे…

पिता पुत्र का वो रिश्ता, जो जीते-जी मर गया मेरे पिता का देहांत हो गया। मुझे यह समाचार भारत में ...
पिता के साथ मेरा सम्बन्ध

पिता के साथ मेरा सम्बन्ध

जब पिता कह दे कि मैं मर गया तेरे लिए! कल्पना करें मेरी उस मानसिक दशा की जबकि मैं बाप ...
जीवन का नया अध्याय, चुनौतियाँ और सबक

जीवन का नया अध्याय, चुनौतियाँ और सबक

मैं भी उनमें से एक हूँ. 7 साल पहले भारत छोड़ के चला गया. वहाँ व्यापार करता था और टैक्स ...
11 साल की उम्र में यौन शोषण की शिकार मेरी बहन को न बचा पाने की ग्लानि 

11 साल की उम्र में यौन शोषण की शिकार मेरी बहन को न बचा पाने की ग्लानि 

मेरी एक ही छोटी बहन थी परा, आज से 17 साल पहले जर्मनी के लिए एयरपोर्ट आते हुए कार दुर्घटना ...
भारत में मेरे परिवार ने मेरी पीठ में छुरा घोंपा है

भारत में मेरे परिवार ने मेरी पीठ में छुरा घोंपा है

बालेंदु लिख रहे हैं कि उन्होंने चैरिटी संस्था से इस्तीफा क्यों दिया और उनके परिवार ने उन्हें पैसे और संपत्ति ...
Apra

दुनिया भर के राजाओं की एक सी रुचियाँ: पैसा, युद्ध और औरतें – 17 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु अपनी पारिवारिक जयपुर यात्रा के बारे में लिख रहे हैं, जहाँ उन्होंने प्राचीन राजा-महाराजाओं के महलों, किलों और ...
अपरा का चौथा जन्मदिन समारोह - 10 जनवरी 2016

अपरा का चौथा जन्मदिन समारोह – 10 जनवरी 2016

स्वामी बालेंदु अपरा के चौथे जन्मदिन के समारोह का वर्णन कर रहे हैं, जिसे उसके जन्मदिन यानी कल, 9 जनवरी ...
कैनेडियन योग दल

हमें घनिष्ट रूप से जुड़ना पसंद है – एक कैनेडियन योग दल का आश्रम आगमन – 13 दिसंबर 2015

स्वामी बालेंदु बता रहे हैं कि कैसे सारे आश्रम ने एक कैनेडियन दल के साथ बेहद सुखद और व्यस्त समय ...
जर्मनी के खूबसूरत दौरे से भारत वापसी - 6 दिसंबर 2015

जर्मनी के खूबसूरत दौरे से भारत वापसी – 6 दिसंबर 2015

भारत लौटकर स्वामी बालेंदु पिछले हफ्ते की अपनी पारिवारिक जर्मनी यात्रा का संक्षिप्त ब्यौरा प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें उनकी ...
जर्मनी में हमारी मौज-मस्ती - 29 नवंबर 2015

जर्मनी में हमारी मौज-मस्ती – 29 नवंबर 2015

स्वामी बालेंदु अपनी पत्नी और बेटी के साथ जर्मनी में बिताए दूसरे सप्ताह का विवरण लिख रहे हैं। उनके रोमांचक ...

Leave a Reply