सन 2005 में अपने पिछले पांच सालों की समीक्षा: वह 2013 के अंत में कैसी लग रही है! 29 दिसंबर 2013

मेरा जीवन

जिस तरह यह साल समाप्ति की ओर है और हम सब अपने पिछले अतीत पर दृष्टिपात कर रहे हैं उसी तरह 2005 के अंत में मैं अपने अतीत पर नज़र दौड़ा रहा था। साल बीतने के साथ मुझे अवसर मिला था कि मैं अपने गुफा-त्याग के बाद के पाँच सालों पर दृष्टिपात करूँ। इस बीच कितना कुछ हुआ, कितना कुछ बदल गया और खुद मैंने कितना और किस रूप में विकास किया!

जब मैं गुफा से बाहर निकला तब मैं काफी लंबा समय अकेलेपन में, अपने आपसे बातें करते हुए, चिंतन-मनन करते हुए गुज़ार चुका था और जानता था कि इन सालों में मुझमें आए परिवर्तनों का भविष्य में मेरे जीवन पर भी असर होगा। लेकिन कैसा असर होगा? मैं जानता था कि मैं अपना आगे का जीवन उस तरह व्यतीत नहीं करूंगा जैसा कि पहले करता रहा था लेकिन मुझे बिल्कुल पता नहीं था, कोई कल्पना नहीं थी कि आखिर उसकी दिशा क्या होगी, भविष्य में मैं क्या करने वाला हूँ। और परिवार के भरण-पोषण के लिए मेरी आमदनी का जरिया क्या होगा!

मैं बदल गया था। भारत छोड़कर बाहर चला गया, विदेश घूमा। नई परियोजनाएं, नए काम शुरू किए। मैं योग की कार्यशालाएँ लेता, व्यक्तिगत सत्रों में असंख्य लोगों से मिलता और उनकी समस्याओं पर अपनी राय रखता, सलाह देता। लोगों से मेरा कई स्तरों पर गहरा जुड़ाव स्थापित होता गया और इस काम में मुझे बहुत आनंद मिलता था। मैंने अपनी गुरु की भूमिका त्याग दी और लोगों से मित्रता स्थापित की।

शुरू में मैं पश्चिमी देशों में बसे भारतीय समाज के बीच काम करता था, जो स्वाभाविक ही धर्म से गहरे रूप में जुड़ा हुआ होता था और इसलिए पहले मैं जो काम करता था, उसमें भी बड़ा परिवर्तन आया। जहां भी मैं जाता, वहाँ भारतीय समाज से बाहर भी, यानी स्थानीय लोगों के साथ भी अपने संपर्क का विस्तार करना शुरू किया। ये विदेशी लोग हिन्दू धर्म से या हिन्दू धर्मग्रंथों से कोई संबंध नहीं रखते थे। मुझे भी अपने आपको उन धार्मिक विषयों से मुक्त होकर अच्छा ही लगता था क्योंकि अब मैं समझ चुका था कि ये धार्मिक सिद्धान्त उन नए विचारों और नई, जीवंत संवेदनाओं को प्रतिबिम्बित नहीं करते, जिन्हें मैं अपने भीतर महसूस करने लगा था। धर्म से मेरी दूरी बढ़ती जा रही थी और मैंने भी नहीं सोचा था कि मैं उससे इतना दूर निकल जाऊंगा।

लेकिन मैं बच निकला। मेरे परिवार का कुछ नहीं बिगड़ा। बल्कि, हमारा विकास हुआ, हम फले-फूले! आश्रम की इमारत लगातार बढ़ती जा रही है और हम लोग ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की मदद कर पा रहे हैं: हमारे कर्मचारी और उनके परिवार, जो आश्रम और चैरिटी स्कूल द्वारा प्राप्त वेतन पर पल रहे हैं, संस्कृत भाषा के युवा विद्यार्थी, जो अपने अध्ययन के दौरान हमारे साथ रहा करते थे और वे बहुत से बच्चे, जो प्राथमिक विद्यालयों में मुफ्त शिक्षा पाते हैं।

इस बात का पता चलने पर मैंने क्या किया? अपने दिल की गहराइयों से मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। हालांकि अब मैं धार्मिक प्रवचन नहीं करता था फिर भी अब भी मैं यही विश्वास करता था कि यह सब मुझे ईश्वर प्रदत्त है। इन पाँच सालों में इतने आमूल-चूल परिवर्तनों के बाद भी मैं यही मानता था कि मुझ पर और मेरे परिवार पर ईश्वर का आशीर्वाद बरकरार है।

उस वक़्त मैं सोच भी नहीं सकता था कि अगले पाँच साल के बाद मैं उसी ईश्वर को एक हवाई, मिथकीय कथा-नायक से ज़्यादा कुछ नहीं मानूंगा तथा अपने और अपने परिवार के परिश्रम और अथक प्रयासों से प्राप्त फल को मानव-मस्तिष्क की उस रचना का आशीर्वाद या प्रसाद नहीं मानूँगा और न ही उसे धन्यवाद ज्ञापित करने का विचार ही मेरे मन में आएगा।

समय गुजरने के साथ लोग बदलते हैं, उनके विचार बदलते हैं और उनकी आस्थाओं में परिवर्तन होता है।

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