आज हमने दिल्ली से आए कुछ शानदार मेहमानों के एक समूह को बिदा किया। उन्होंने हमारे साथ दो दिन गुज़ारे। हमारी मित्र शर्मिला, जो दिल्ली में शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सक्रिय हैं, रमोना के साथ चर्चा करके कई दिनों से इसकी योजना बना रही थीं। दो दिन पहले आखिर वे लोग आए और हमारे शिक्षक/शिक्षिकाओं के साथ बैठकर चर्चा की। उनकी बातें सुनकर हमारे शिक्षक/शिक्षिकाएँ बहुत उत्साहित हैं कि उन्हें बहुत कुछ नया सीखने को मिला।
कार्यशाला के तीन प्रमुख संयोजक 'कथा मंच' नामक एक संस्था के सदस्य हैं और उन्हें कथा-कहानियों में विशेषज्ञता हासिल है। स्वाभाविक ही, यह कार्यशाला भरपूर कथा-वाचन और कथा-श्रवण का दो दिवसीय समारोह ही बन गया! भाग लेने वाले हर सदस्य को बचपन में सुनी अपनी कोई ऐसी पसंदीदा कहानी सुनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था, जिसके साथ वह आज भी गहराई के साथ जुड़े महसूस करते है। निश्चय ही दिल्ली से आए हमारे मित्रों ने भी कुछ कहानियाँ सुनाईं।
लेकिन उन कहानियों से ज़्यादा महत्वपूर्ण था उन्हें सुनाने का ढंग और कमरे में बैठे हर एक सुनने वाले पर पड़ने वाला उन कहानियों का असर। कहानी किस तरह सुनाई जानी चाहिए और किस तरह सुननी चाहिए कि सुनने वाला उसके साथ जुड़ सके, उसमें खो जाए और उसे आत्मसात कर सके, इस बात को उन्होंने उदाहरण सहित शिक्षकों के सामने क्रियान्वित करके दिखाया और उससे हमारे शिक्षक बहुत लाभान्वित हुए। उन्होंने सीखा कि किस तरह बच्चों का ध्यान कहानी और उसके चरित्रों और उनकी गतिविधियों की ओर खींचना चाहिए, जिससे वे कहानी की विषयवस्तु और उसके कथ्य पर अपने मस्तिष्क को एकाग्र कर सकें।
गहन सामूहिक विचार-विमर्श के ज़रिए स्वयं शिक्षकों के दिमाग में कई ऐसी गतिविधियों का खयाल आया, जिन्हें कक्षा में आजमाकर वे कहानियों को अपने वास्तविक पाठ्यक्रम के साथ जोड़ सकते हैं। नाटक, पेंटिंग्ज़ और चित्रकारी, छोटे-मोटे खेल, वैज्ञानिक प्रयोग और निश्चय ही, बच्चों को अपनी कल्पनाओं को पर लगाने की आज़ादी देकर वे हर तरह के विषयों को रोचक बना सकते हैं, चाहे वह गणित हो, भाषा हो या विज्ञान!
एक बिंदु, जिसे रमोना ने विशेष रूप से महत्वपूर्ण समझा, यह था कि इन कहानियों का उपयोग बच्चों के मन से विभिन्न पूर्वग्रहों को निकाल बाहर करने में भी किया जा सकता है: जैसे एक कथा में एक महिला एक वज़नी पत्थर को उठाकर अलग कर रही है और एक और कहानी में पिता घर में खुद चाय बना रहा है। कहानियों से यह भी प्रदर्शित किया जा सकता है कि एक ‘बुरा' व्यक्ति भी इंसान ही होता है और गलतियाँ कर सकता है और इस बात को रेखांकित किया जाना चाहिए कि कहानी में कोई नैतिक शिक्षा हो ही, यह आवश्यक नहीं है-किसी घटना या समाचार पर भी चर्चा की जा सकती है। हमारे विचार अलग-अलग हो सकते हैं-और बच्चे अपने-अपने विचारों को अभिव्यक्त करना सीख सकते हैं, इस बात को समझ सकते हैं कि कोई एक बात या विचार ही सही नहीं है और न ही ऐसा कोई 'एकमात्र तरीका' है।
इस तरह पूरे दो दिन तक यह अत्यंत विचारोत्तेजक कार्यशाला चली और हमारे शिक्षकों को बहुत सी नई बातें सीखने का मौका मिला और बहुत से नए आइडियाज़ मिले, जिन्हें अमल में लाकर वे कक्षा में पढ़ाए जाने वाले पाठों के साथ कहानियों को जोड़कर अपनी कक्षा और स्कूल के वातावरण को रुचिपूर्ण और खुशनुमा बना सकते हैं।
औपचारिक कार्यशाला के अतिरिक्त नए मित्रों से मिलना, उनके साथ बातचीत करना, परस्पर अपने स्कूली अनुभव साझा करना अत्यंत रोमांचक और स्फूर्तिदायक रहा। और हाँ, एक साथ बैठकर शानदार भोजन का आस्वाद लेना भी अविस्मरणीय रहेगा!
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