2006 में जर्मनी यात्रा की बाट जोहते हुए – 30 मार्च 2014

वृन्दावन में होली का उत्सव सम्पन्न हुआ ही था कि मैं एक बार फिर घर छोड़ने की तैयारी में लग गया। होली पर भारत में उपस्थित रहने और उसके तुरंत बाद, जब यहाँ, भारत में गर्मी शुरू हो जाती है, यहाँ से बाहर चले जाने का एक नियम सा बन गया था। लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए मेरी विदेश-यात्राओं के कई पहलुओं में परिवर्तन आता चला गया।

यशेंदु के साथ मैं जर्मनी जाने को तैयार था। एक साल पहले हमने कोलोन विश्वविद्यालय में एक अंतर्राष्ट्रीय योग-शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स शुरू किया था और उस वक़्त उस द्विवर्षीय प्रशिक्षण के ठीक बीचोंबीच पहुँच चुके थे। इसलिए हम साथ जा रहे थे, मैं उसके बाद कभी यात्रा पर अकेला नहीं निकला।

अब तक मैं इस बात का निर्णय कर चुका था कि मैं भारत के बाहर कहाँ जाने वाला हूँ: जर्मनी। सिर्फ इसलिए नहीं कि योग-शिक्षक प्रशिक्षण के संबंध में मेरा वहाँ कुछ काम था बल्कि इसलिए भी कि मुझे जर्मनी जाना अच्छा लगता था। मैंने वहाँ बहुत समय बिताया था और मैं वाकई इस देश से, वहाँ की संस्कृति से, वहाँ की नैसर्गिक शोभा और वहाँ के सम्पूर्ण भूदृश्य से लगाव महसूस करता था। और सबसे अधिक मुझे वहाँ के लोग आकर्षित करते थे।

मुझे उनका स्पष्टवादी और निष्कपट व्यवहार पसंद था। उनकी व्यवस्था और उनकी विश्वसनीयता का कोई जवाब नहीं! जब वे कोई काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं तो अपनी ज़िम्मेदारी को बहुत गंभीरता से लेते हैं और आप इस बात पर निश्चिंत हो सकते हैं कि आपका काम पूरा होकर रहेगा। और फिर वहाँ मेरे बहुत से दोस्त बन गए थे, जिनसे मिलने की उत्कंठा तो थी ही। इसलिए जब हम एयरपोर्ट की तरफ जा रहे थे तो मैं वाकई इस यात्रा को लेकर बहुत खुश और उत्साहित था।

यहाँ तक कि भारत में यात्रा करने की तुलना में यह यात्रा बहुत अलग भी थी। भारत में जब भी मैं रेल यात्रा करता था तो अपना मुंह बंद रखता था और आसपास बैठे लोगों के साथ चर्चा में नहीं उलझता था। मैं उनके साथ बात नहीं करना चाहता क्योंकि बातें अक्सर एक ही दिशा में मुड़ जाती हैं: कोई मुझसे अपने जीवन के बारे में सलाह या आशीर्वाद चाहेगा या फिर धर्मग्रंथों की ज्ञानपूर्ण बातें जानना चाहेगा। वैसे मैं लोगों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहता हूँ लेकिन अगर मैं डेढ़ दिन की रेल-यात्रा के दौरान ऐसी चर्चाओं में उलझ जाऊँ तो यकीन मानिए, डिब्बे के सारे यात्री मुझे सुनने के लिए मेरे इर्दगिर्द जमा हो जाएंगे क्योंकि रेल यात्रा में कोई काम तो होता नहीं। और इस तरह मैं एक सार्वजनिक सवारी-गाड़ी में अपना व्याख्यान दे रहा होऊंगा! लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने की मेरी कोई इच्छा नहीं होती इसलिए मैं अक्सर चुपचाप, शांतिपूर्वक यात्रा करता था।

भारत से बाहर की यात्राओं में यह स्थिति नहीं होती। वैसे भी मैं कुछ नया, कुछ अलग करने के लिए ही भारत से बाहर निकला था। मैं विभिन्न लोगों से मिलना चाहता था- और इसलिए चाहे मैं एयरपोर्ट पर होऊँ, रेलवे स्टेशन पर होऊँ, ट्रेन या हवाई जहाज़ में बैठा होऊँ, मौन कभी नहीं रहा। मैं सिर झुकाकर या खिड़की से बाहर देखता बैठा नहीं रहा बल्कि आसपास के वातावरण का निरीक्षण करते हुए, लोगों के हाव-भाव और व्यवहार को बारीकी से देखता था। मैं पूरे समय अपनी आंखे और मस्तिष्क खुला रखता था- और लोग इस बात को महसूस करते थे।

अक्सर लोग मुझसे मिलने आते, मेरे पहरावे के बारे में पूछते, क्या करता हूँ, आगे कहाँ जाऊंगा, पूछते। मेरे फलसफे के बारे में, मेरा नाम, संपर्क सूत्र और मेरी अगली कार्य-योजनाओं के बारे में जानना चाहते। अपनी यात्रा के दौरान ही मेरा संपर्क विस्तृत होता रहता। लोग मुझे आमंत्रित करते, अक्सर उनसे चर्चा होती रहती और दोस्त भी बनते चले जाते। इस तरह मैं बहुत से लोगों को जानने लगा-घूमते-फिरते हुए। और मुझे इसमें बड़ा आनंद प्राप्त होता।

ऐसी ही एक आकस्मिक भेंट बड़ी रोचक रही लेकिन उसके बारे में मैं अगले हफ्ते आपको बताऊंगा।

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