जीवन में असुरक्षा के एहसास के कारण आपको दूसरों से आश्वस्ति की ज़रूरत होती है – 26 मई 2013

मेरा जीवन

एक व्यक्ति, जिससे मैं 2005 में डब्लिन में हुए अपने एक बड़े आयोजन के दौरान मिला था, वहाँ की एक महिला थी। मेरी उससे मुलाकात हुई, उसे वह कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा और उसने मेरे व्यक्तिगत सत्र में भी भाग लिया। बाद के कई सालों तक मैं उसके लिए मददगार साबित होता रहा, मगर सिर्फ एक ही एतबार से: जो कुछ भी वह बताती थी उसे मैं ध्यान से सुनता था!

पहले मैं आपको इस महिला के बारे में कुछ जानकारी दे देता हूँ। वह उम्र की तीसरी दहाई में थी और अकेली थी। उसका रीयल इस्टेट का व्यापार था और जहां तक मुझे याद है उसे हमेशा यह डर बना रहता था कि कहीं उसे धंधे में कोई बड़ा नुकसान न हो जाए। बाद की उसकी बातों से मुझे ऐसा लगा कि आर्थिक मामले ही उसकी बातों का केंद्रीय विषय होते थे और उसकी बातें आर्थिक नुकसान, पूरी तरह आर्थिक बर्बादी या यह सामान्य एहसास कि भविष्य में उसके पास पर्याप्त धन नहीं होगा, इन बातों पर सम्पन्न होती थी। निस्संदेह, जैसा कि कुछ साल बाद आयरिश अर्थव्यवस्था में आई मंदी और बाज़ार में आई तेज़ गिरावट ने ज़ाहिर भी किया, उसका डर निराधार नहीं था। लेकिन उसके डर का मूल कारण यह तर्कसंगत आर्थिक विचार नहीं था; दरअसल उसका डर अकारण था और उसकी भावनाओं से उद्भूत था। मुझे अक्सर यह लगता था कि यह महिला भीतर ही भीतर असुरक्षित महसूस करती है।

यह असुरक्षा सिर्फ धन संबंधी नहीं थी बल्कि उसके जीवन के सभी पहलुओं पर उसकी छाया दिखाई देती थी। जैसा कि हर सामान्य सिंगल स्त्री या पुरुष होता है, वह भी एक जीवन-साथी की तलाश में थी और क्योंकि वह एक खुशमिजाज और खुले दिल वाली महिला थी, मैंने इन सालों में जाना कि उसने विभिन्न देशों के कई पुरुषों के साथ संबंध बनाने का प्रयास किया। अधिकांश मामलों में उसकी यही असुरक्षा की भावना किसी भी संबंध को किसी गंभीर शुरुआत से पहले ही खत्म कर देती थी। किसी बात पर अंतिम निर्णय लेना ही उसके लिए एक मुश्किल काम था।

उसकी असुरक्षा की भावना ही उसे एक के बाद दूसरे गुरु के पास जाने के लिए मजबूर कर देती थी, किसी आध्यात्मिक गुरु की तलाश में, जिसके चरणों में उसे सहारा मिले। जो उसे बताए कि उसे क्या करना चाहिए जिससे उसे यह एहसास हो कि जो कुछ वह कर रही है, सही कर रही है। उसने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा एक आध्यात्मिक गुरु की तलाश में लगाया था और शायद मेरे आयोजन में भी वह इसी खोज के उद्देश्य से आई थी।

मैंने सिर्फ इतना किया कि उसकी समस्याओं को ध्यान से सुनता था। और स्वयं उसके पास अपनी समस्याओं के त्वरित समाधान उपलब्ध थे। वह बहुत समझदार महिला थी और उसके विचारों में कोई दोष नहीं था इसलिए शायद वह पहले से ही समझ जाती थी कि उसके समाधानों को सुनकर मैं क्या कहूँगा। और मुझे चुपचाप उसकी बात को ध्यान से सुनना होता था और सहमति में ‘हाँ’ कहना होता था। अक्सर यही बात उसे किसी काम में आगे बढ़ने का पर्याप्त ढाढ़स प्रदान करती थी। उसे इसी बात की ज़रूरत थी; कोई उसकी बात सुने और कहे, ‘हाँ, ठीक है, तुम बिल्कुल ठीक कर रही हो!’
फिर भी, कभी कभी ऐसा होता था कि मुझे उसके विचार के विपरीत बात कहनी पड़ती थी। मैं स्पष्टवादी हूँ और ईमानदारी के साथ और साफ-साफ उससे कहता था कि जो वह कह रही है, वह बात पूरी तरह मूर्खतापूर्ण है और मैं किसी भी हालत में ऐसा करने के बारे में सोच भी नहीं सकता। मेरी बात स्पष्ट होती थी और यही उसके लिए महत्वपूर्ण था। वह मेरी बात को स्वीकार कर लेती थी, भले ही वह उसकी बात से पूरी तरह अलग ही क्यों न हो। वह मेरे विचार की तरफ मुड़ जाती थी और कहती थी, ‘ओह, आप ठीक कह रहे हैं।’

जब मुझे यह समझ में आया मैंने सोचा कि मैं अपने पुराने गुरु के रोल के काफी नजदीक चला आया हूँ और यह मैं अब बिल्कुल नहीं चाहता था। मैं अब किसी भारतीय या आयरिश व्यक्ति का गुरु नहीं बनना चाहता। मैं अपने इस निर्णय के बारे में क्या कर सकता हूँ?

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