असुरक्षा और आत्मविश्वास की कमी लोगों को गुरु की खोज में लगा देते हैं – 2 जून 2013

मेरा जीवन

पिछले हफ्ते मैंने आपको एक आयरिश महिला के बारे में बताया था जिससे मैं 2005 में मिला था और जिसके जीवन में व्याप्त असुरक्षा के चलते वह आत्मिक शांति की खोज में विभिन्न गुरुओं के चक्कर लगाती रहती थी कि कभी न कभी कोई उपयुक्त व्यक्ति उसे मिल जाएगा। कुछ मुलाकातों के बाद मैंने नोटिस किया कि जो वह चाहती थी वह था: एक गुरु जो उसकी जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर उठा ले।

उसके भीतर आत्मविश्वास की बहुत कमी थी। ऐसे लोग बहुतायत से मिलते हैं, विशेषकर पश्चिम में जहां लोगों को यह समझने में काफी दिक्कत आती है कि आखिर जीवन में वे ठीक-ठीक चाहते क्या हैं। इसलिए वे किसी बात पर पक्का निर्णय नहीं कर पाते और क्या उचित निर्णय लिया जाए, दूसरों से पूछते हैं। इस महिला को भी यह ठीक-ठीक पता नहीं था कि वह क्या चाहती है और आत्मविश्वास भी नहीं था।

ऐसे असुरक्षित व्यक्तियों के पास जो होता है वह है दूसरों पर सहज विश्वास करने का माद्दा और यह उस महिला में भी कूट-कूटकर भरा था। जब ऐसे किसी व्यक्ति को वह पा जाती थी तो उस पर आँख मूंदकर भरोसा करती थी। वह इसी तरह मुझ पर भी भरोसा करने लगी और उसे विश्वास हो गया कि मैं किसी जादुई तरीके से उसके भविष्य के बारे में कोई इशारा कर सकता हूँ या अपने आत्मज्ञान से उसे ऐसी सलाह दे सकता हूँ जिस पर अमल करना उसके लिए उचित होगा। उसके इस विचार को मैं इतना समय गुज़र जाने के बाद उसका अंधविश्वास ही कह सकता हूँ लेकिन उस समय मुझे सिर्फ यह महसूस हुआ कि यह महिला मुझमें किसी गुरु की खोज कर रही है। मगर बहुत पहले, गुफा के एकांत में पर्याप्त वक़्त गुजारने के बाद, यह काम मैं छोड़ चुका था।

यह समझते ही मैंने तुरंत अपनी अगली मुलाक़ात में उससे स्पष्ट कहा कि मैं कोई गुरु-वुरु नहीं हूँ और मेरा उसे अपना शिष्य बनाने का कोई इरादा नहीं है। मैंने इसके बारे में बहुत गंभीरतापूर्वक उससे बात की और उसे उसकी जिम्मेदारियों के बारे में समझाया। मैंने उससे कहा कि एक व्यक्ति के रूप में कभी भी वह मुझसे सलाह ले सकती है। उसकी बात तल्लीनता के साथ सुनने के लिए और उस पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए भी मैं प्रस्तुत हूँ। मगर मैं उसे यह नहीं बता सकता कि उसे ठीक-ठीक क्या करना चाहिए। उसे खुद सोच-समझकर, पूरे एहसास के साथ अपना निर्णय लेना होगा!

हमारी कुछ देर बहुत गंभीर और साफ-साफ बात हुई। उसके बाद मेरे साथ उसका संपर्क धीरे-धीरे कम होता गया, मगर बना रहा। फिर कई वर्षों के अंतराल के बाद उसने मुझे बताया कि उसने एक ऐसे व्यक्ति को पा लिया है जिसे वह प्रेम करती है और जिसके साथ सारा जीवन व्यतीत करना चाहती है। वह उस व्यक्ति को साथ लेकर मुझसे मिलने जर्मनी भी आई। वे बड़े प्यारे लग रहे थे और दोनों का स्वभाव एक जैसा था। जो भी उनसे मिला, यही कहता था कि अपने हंसमुख स्वभाव के कारण ऐसा लगता है जैसे दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हों!

वे हमारे एक ध्यान-सत्र में शामिल हुए और हमें पुनः यह अनुभूति हुई कि वाकई वे एक दूसरे के लिए ही बने हैं। मेरा बोलना अभी जारी ही था कि तभी कमरे के पिछले हिस्से से दोनों की खर्राटे भरने की आवाज़ आने लगी; दोनों अपने आसन पर गहरी निद्रा में लीन हो गए थे और पूरे सत्र में सोते ही रहे! उन्हें एक दूसरे के करीब सोते हुए देखना बहुत मासूम सा, प्यारा दृश्य था। अंत में दोनों मेरे पास आए और गले लग गए। फिर कहा, “यह बहुत शानदार ध्यान-सत्र था!”

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