कैसे मुझे मेरे दो अनमोल मित्र मिले – 13 जनवरी 13

मेरा जीवन

आज मैं आपको जर्मनी में 2005 के साल में हुई अपनी उस मुलाकात के बारे में बताना चाहूंगा जो दो बेहद प्यारे व्यक्तियों से एक बेहद घनिष्ठ मित्रता, एक पारिवारिक सदस्य जैसे रिश्ते की शुरुआत थी। शायद आपको याद हो मैं एक महिला का ज़िक्र किया था जिनसे मैं माइन्ज़ के एक रेस्तरां में मिला था। वे बाद में निजी सत्रों के लिए आई थीं और इससे उन्हें काफ़ी मदद मिली थी। उनका एक छोटा सा बच्चा भी था। हम मित्र बन गए थे। पहले भी मैं उनसे मिलने उनके घर पर जा चुका था, 2005 में भी मैं उनके यहां रुका था। वो और उनके पति ने मिलकर वीसबाडन में एक फ़्लैट ख़रीदा था और मैंने उनके नये घर में उस दंपत्ति और उनके प्यारे बच्चे के साथ थोड़ा वक़्त बिताया था।

जब भी हमारी मुलाकात होती, वो अपने एक बेहद क़रीबी दोस्त का ज़िक़्र करतीं और कहतीं कि मुझे उनसे ज़रूर मिलना चाहिए। वो उसे हमेशा आमंत्रित करना चाहती थीं लेकिन किसी न किसी वजह से ऐसा संभव ही नहीं हो पाता। लेकिन उन्हें यक़ीन था कि हम दोनों एक-दूसरे को पसंद करेंगे – ख़ासकर इसलिए कि उनके दोस्त भी एक बेहद आध्यात्मिक व्यक्ति थे, भारत को लेकर, विशेषतः भारतीय संगीत में उनकी बहुत रूचि थी। अब आख़िरकार उनके नये घर में, समय हमारे मिलने के लिए बिल्कुल अनुकूल था।

उनके ये मित्र अपनी पत्नी के साथ मुझसे मिलने आए और हमने भारत और भारतीय संगीतों के बारे में बातचीत करते हुए बहुत अच्छा समय व्यतीत किया। वो वास्तव में एक आध्यात्मिक रुचि वाले और संगीत को समर्पित व्यक्ति थे। ज़ाहिर है हमारी मुलाकात अच्छी थी लेकिन उस समय मैंने यह नहीं सोचा था कि हम एक-दूसरे के लिए आगे भी एक मज़बूत जुड़ाव महसूस करेंगे।

उन्होंने मुझे एक बार बाद में दोस्तों के बीच हो रही बातचीत के दौरान बताया कि पहली मुलाकात से पहले वो संदेहवादी न भी कहें, तो थोड़ा सावधान ज़रूर थे। वो दो-चार बार भारत आ चुके थे और भारत व यूरोप दोनों देशों में, विभिन्न पंथों के कई गुरुओं के साथ उनका अनुभव भी रहा था। व्यावहारिक रूप से कहें तो उन्होंने अध्यात्म के बाज़ार में ब्रह्मा कुमारियों से लेकर इस्कॉन तक द्वारा परोसी जा रही सभी चीज़ों को आज़माकर देख लिया था। जब हमारे कॉमन मित्र ने उन्हें मेरे बारे में बताया था तो उन्हें लगा कि मैं भी एक और गुरू हूं। लेकिन जब हम मिले, तो उन्होंने महसूस किया कि यहां कुछ अलग था– कि मैं भक्तों की भीड़ जुटाने में नहीं लगा था।

जिस तरह मैं उनसे मिला था, वैसी मुलाकातें मेरी दिनचर्या का हिस्सा हैं। ऐसे लोग हमेशा रहे हैं जो मिलना चाहते थे, मित्र, मित्रों के मित्र, वो लोग जिन्हें मैं न के बराबर जानता था या बिल्कुल भी नहीं जानता था। कई लोग आए और कइयों के साथ मुलाकात एक बार से अधिक नहीं बढ़ी।

इन दो लोगों यानी मेरी मित्र के मित्र और उनकी पत्नी के साथ हालांकि यह मुलाकात एक रिश्ते के रूप में बदल पाई। थोड़ी-बहुत जान-पहचान से हम बेहद अच्छे दोस्त बन गए। पहली मुलाकात महत्वपूर्ण नहीं होती है, बल्कि बाद की मुलाकातें बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं, ख़ासकर उस दौर में जब आप अपनी ज़िंदगी में कई बदलावों से गुज़र हो रहे हों।

एक सच्ची मित्रता वो होती है जो सिद्धांतों या दर्शन में आए परिवर्तनों की वजह से खत्म नहीं होती। ये दोनों मित्र जिनसे मैं एक कॉमन दोस्त के फ़्लैट पर 2005 में मिला था, तब से आज तक मेरे और मेरे परिवार के सुख-सुख में शामिल रहे हैं। हमने साथ में हर्षोल्लास भी देखा है और साथ मिलकर रोए भी हैं। हमने घंटों बैठकर बातें भी की हैं और कई बार साथ बैठकर घंटों चुप भी रहे हैं। हम एक साथ बढ़े हैं, भले ही भौतिक रूप से हम एक-दूसरे से दूर हैं। और इन सब के साथ हमारा प्यार और हमारी दोस्ती भी बढ़ी है।

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