जैसा कि मैं आपको पहले बता चुका हूँ, 2005 में मैं एक बाँसुरी वादक के साथ यात्रा कर रहा था, जिसने मेरे कार्यक्रमों को एक सांगीतिक स्पर्श दे दिया था, जो हमेशा सहभागियों को बहुत पसंद आता था। एक जीवंत संगीतकार को साथ रखना बहुत अच्छा विचार था क्योंकि मेरे कई कार्यक्रम होते थे और उसका बाँसुरी वादन कई बार बहुत सुंदर माहौल निर्मित कर देता था। उसके साथ कुछ वक्त बिताने के बाद मुझे पता चला कि इस व्यक्ति का चरित्र और मानसिकता ऐसी नहीं थी कि उसके साथ इस तरह की यात्राएं और इस तरह का काम किया जाए। यशेंदु ने जब अपने मेजबान के बारे में उससे बात की तो यह स्पष्ट हो गया।
अब हम तीन लोग थे और मेरे हर आयोजक के पास इतना स्थान नहीं होता था कि वह हम तीनों को एक साथ ठहरा सके इसलिए जब भी संभव होता, हम अलग-अलग रह लेते थे। इसके अलावा सदा और भी कई मित्र होते ही थे जो खुशी-खुशी एक या दो मेहमानों को अपने यहाँ एकाध हफ्ते के लिए ठहरा लेते थे। एक कस्बे में मेरे एक पुराने मित्र थे जिनके यहाँ मैं हमेशा रुका करता था। इस नए मित्र दंपति ने यशेंदु और उस बाँसुरी वादक को अपने यहाँ रुकने का न्योता दिया। इसी दंपति ने बाँसुरी वादक का वीजा निकलवाने में बड़ी मदद की थी।
जब मैं किसी के यहाँ रुकता हूँ तब आम तौर पर खाना मैं ही बनाता हूँ जिससे मुझे अपने मेजबानों के उपकार का कुछ अंश चुकाने का संतोष प्राप्त हो जाता है और मैं उन्हें एक से एक बढ़कर भारतीय खानों से अवगत भी कराता रहता हूँ। यशेंदु भी यही करते हैं और यह एक तरह का नियम सा है कि जो खाना नहीं बनाते वे खाने के बाद बर्तन साफ करते हैं। हमारे पूरे प्रवास के दौरान और यहाँ भी हमारे बाँसुरी वादक साथी कभी भी मदद करने में कोई रुचि नहीं लेते थे- न खाना बनाते थे और न बर्तन साफ करते थे। खैर, भारत में तो कई लोग बर्तन साफ करने के काम को नीचा काम मानते ही हैं। जब हमने कहा कि यहाँ यह एक सामान्य बात है कि मेहमान को भी मेजबान की किसी न किसी तरह मदद करनी चाहिए और अगर आप खाना बनाने में कोई मदद नहीं कर सकते तो बर्तन साफ करने में ही कभी-कभी हाथ बंटा दिया कीजिये, तो उन्होंने तुनककर कहा, ‘मैं एक ऊंची जाति का व्यक्ति हूँ मैं किसी के झूठे बर्तन साफ नहीं कर सकता!’ यशेंदु ने नम्रता के साथ उन्हें समझाया कि ‘भाई ये भारत नहीं है, यहाँ यह गलत सोच नहीं चलेगा! आप जर्मनी में हैं, यहाँ हर कोई बराबर है!’ उन्होंने कुछ देर सोचा और सिर्फ अपने झूठे बर्तन साफ करना शुरू कर दिया, लेकिन बस इतना ही।
खैर, यह एक छोटी सी बात थी जिस पर हम थोड़ा विचलित हो गए थे मगर उनकी इस मानसिकता के कारण वास्तविक समस्या तब पेश आई जब वे जर्मनी छोडकर वापस लौटने लगे। उन्होंने यशेंदु को अपनी ट्रेन का समय बताया और कहा, ‘तो उन्हें बता दीजिएगा कि मेरी ट्रेन 10 बजे है, वे मुझे ट्रेन पर छोड़ दें और उसके बाद…।’ यशेंदु ने बीच में टोकते हुए कहा, ‘नहीं, रुकिए! वे आपको छोडने नहीं जा पाएंगे क्योंकि वह उनके ऑफिस का वक़्त होता है। आप टॅक्सी कर लीजियेगा।’ यह सुनना था कि हमारे बाँसुरी वादक बिफर उठे। बोले, ‘ये क्या बात हुई? वे मुझे छोडने भी नहीं आएंगे? ये कैसे मेजबान हैं? वाकई ये अपने मेहमानों के साथ बड़ा बुरा व्यवहार करते हैं! आपको उनके घर में बर्तन साफ करना पड़ते हैं और वे आपको खुद अपना बोरिया बिस्तर समेटकर ट्रेन पकड़ने की भाग-दौड़ करनी पड़ती है। एक बार वे मेरे यहाँ आएँ, मैं बताता हूँ कि मेहमान नवाज़ी किसे कहते हैं!’ वे और भी बहुत कुछ कहना चाहते थे मगर यशेंदु ने फिर उन्हें रोक दिया, इस बार कुछ झल्लाते हुए और उनकी अहसान फरामोशी पर थोड़ा हैरान होकर गुस्से के साथ बोले, ‘थोड़ा ज़मीन पर आइये, महाराज! ये लोग आपके लिए इतना कुछ कर रहे हैं और आप संतुष्ट नहीं हैं! आपको उन्होंने बुलाया तब आप जर्मनी आ सके हैं! उन्होंने आपको रहने के लिए घर दे दिया, आपको खाना खिलाते हैं, वे आपके मित्र हैं और आपके सारे कार्यक्रमों में भी वे आए।’
स्वाभाविक ही उनकी बातें कुछ और आगे तक चलीं जिन्हें यहाँ लिखना समय का अपव्यय होगा। लेकिन आप समझ ही गए होंगे कि हमारे संगीतज्ञ महोदय किस तरह की मानसिकता का इज़हार कर रहे थे! यह अविश्वसनीय था और जब मेरे भाई ने मुझे इस विषय में बताया तो मैं समझ गया कि मेरे लिए अब इस व्यक्ति को अपने साथ ले जाना संभव नहीं होगा! दुर्भाग्य से मेरी किस्मत में ऐसे और भी कई भारतीयों का साथ लिखा था जिनके अकृतज्ञ रवैये के कारण मेरी यात्राएं कई बार शर्मिंदगी से भर गई हैं। मुझे लगता है कि यह बचपन में उनको मिले संस्कारों का असर है जिसने उनके मन में भर दिया है कि जीवन में वे बहुत कुछ मुफ्त पाने के हकदार हैं और लोग उन्हें लाभ पहुंचाकर कोई अहसान नहीं करते।
मुझे खुशी है कि हमारे मेजबान मित्र इस घटना को कभी भी जान नहीं पाए और वे हमेशा समझते रहेंगे कि मैं एक अच्छे मित्र की तरह उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करता रहूँगा।
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