आश्रम में जरूरतमंदों की सहायता करने की परंपरा है – 30 जून 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

जिन मित्रों ने 2005 के आसपास हमारे आश्रम का दौरा किया था वे पीले लंबे कुर्तों में कुछ किशोर बच्चों को आश्रम में तेज़ी से इधर से उधर आते-जाते हुए अवश्य नोटिस करते थे और पूछते थे, ‘ये कौन हैं?’

वे बच्चे आश्रम के ही ‘आवासी बच्चे’ थे। जब मैं गुफा में था तब वे आ चुके थे। हमेशा वही बच्चे नहीं होते थे, वे बदलते रहते थे और जब भी कोई मित्र दोबारा आश्रम आता तो वह कुछ दूसरे लोगों को वहाँ पाता था। आश्रम में अब भी यही होता है। भारतीयों के लिए यह सामान्य बात है मगर विदेशियों के लिए नहीं।

इसलिए इस परंपरा के बारे में हमने उन्हें थोड़ा विस्तार से बताया: आश्रम एक साझा करने की जगह होती है जहां आपको हमेशा भिन्न-भिन्न तरह के लोग मिलते हैं। आध्यात्म में, हिन्दू धर्म में और उसके धर्मग्रंथों में रुचि रखने वाले युवा जानते हैं कि अध्ययन के दौरान आश्रम में वे सम्मान के साथ रह सकेंगे। धर्मग्रंथों का अध्ययन करने के लिए संस्कृत जानना आवश्यक है। हालांकि बहुत से संस्कृत विध्यालय कोई फीस नहीं लेते या परीक्षा आदि के खर्च के लिए बहुत कम फीस लेते हैं, फिर भी आखिर आवास की जगह तो आवश्यक ही है। विद्यालयों के समीप स्थित आश्रम उन्हें यह जगह मुहैया कराते हैं। वहाँ निवास और भोजन प्राप्त करने के एवज में वे आश्रम के दैनंदिन के कामों में हाथ बँटाते हैं।

आश्रम में हम सभी को, उनका हमारे यहाँ रहना बहुत अच्छा लगता है क्योंकि वे युवा और खुशमिजाज़ होते हैं और अगर घर में और भी युवा हैं तो माहौल बहुत जीवंत और खुशनुमा हो जाता है! फिर उनकी तरक्की में, किसी खास विषय की उनकी पढ़ाई-लिखाई में अपना कुछ योगदान देने का सुख प्राप्त होता है, वह अलग! पढ़ाई के बाद वे कोई रोजगार प्राप्त कर सकते हैं, अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं और अपने परिवार की मदद कर सकते हैं, यह विचार ही बहुत सुखद होता है। उनकी मदद करने की गरज से हम कई बार उनकी परीक्षा फीस भी अदा कर देते हैं।

2003 में हमने अपने आश्रम में ही संस्कृत की शिक्षा देने की व्यवस्था की। हमने अपने इलाके के सबसे योग्य शिक्षक की नियुक्ति की जो रोज़ सबेरे आश्रम आकर संस्कृत पढ़ाते थे। इस कक्षा को सिर्फ आश्रम वासियों के लिए आरक्षित नहीं किया गया था और आश्रम के बाहर रहने वाले भी बड़ी संख्या में ज्ञान प्राप्त करने आते थे। तो इस तरह आगे आने वाले सालों में लगभग सौ लोग रोज़ सबेरे संस्कृत सीखने के लिए आश्रम का रुख कर रहे थे।

स्वाभाविक ही जो विद्यार्थी आश्रम में रहते हैं वे लाभ की स्थिति में होते हैं। जब आप किसी के साथ रहते हैं तो उन्हें जानने का आपको बेहतर अवसर प्राप्त होता है और भावनात्मक संबंध मजबूत होते चले जाते हैं, भले ही सामने वाला आपके साथ थोड़े समय के लिए ही रहने वाला है और पढ़ाई समाप्त होते ही वापस चला जाएगा या कोई दूसरी जगह ढूंढ लेगा। हम हमेशा बच्चों की सहायता की जुगत में रहते थे और मेरी बहन, जो अँग्रेजी में एम ए थी, उन्हें अँग्रेजी पढ़ाना चाहती थी।

जो लोग हमारे यहाँ 2005 में आए थे उन्होंने देखा कि वे किशोर बच्चे अँग्रेजी और संस्कृत में प्रवीण हो गए और दैनिक व्यवहार में आने वाली बहुत सी बातें भी सीखीं। वह बहुत अच्छा समय था, अपनी हर चीज़ साझा करते हुए जीना और लोगों को अपने जीवन में आगे बढ़ते हुए, स्थापित होते हुए देखना।