योग गुरु कैसे अपने समलैंगिक शिष्यों के मन में आतंरिक कलह पैदा करते हैं! 25 मई 2014

मैंने आपको पहले बताया था कि सन 2006 में मेरा बहुत से समलैंगिकों से संपर्क हुआ था। उनमें से एक पुरुष समलैंगिक मेरा अच्छा दोस्त बन गया था। योग में उसकी बहुत रुचि थी और उसका एक भारतीय योग-गुरु भी था। लेकिन इसी कारण मैं हमेशा देखता था कि उसके भीतर कोई मानसिक उथल-पुथल मची हुई है: उसका गुरु उसकी समलैंगिकता को स्वीकार नहीं करता था।

तब मेरा मित्र 23 साल का युवक था। सालों से उसकी भारत में रुचि रही थी और हालाँकि वह कभी भारत नहीं आया था, वह उसकी संस्कृति परम्पराओं और धर्मग्रंथों से बड़ा प्रभावित और उन पर मोहित था। उसने भारत के बारे में बहुत सी किताबें पढ़ रखी थीं और स्वाभाविक ही उनका उस पर गहरा असर था। वह बहुत शांत-चित्त, ठन्डे दिमाग वाला और आध्यात्मिकता, योग और ध्यान आदि में रुचि रखने वाला युवक था। इन सब बातों ने उसे इस भारतीय गुरु की ओर, जो कई सालों से पश्चिम में रहकर योग और भारतीय दर्शन की शिक्षा दिया करता था, आकृष्ट किया। वह गुरु लोगों को दीक्षित भी किया करता था, लिहाजा मेरे मित्र ने उस गुरु से दीक्षा प्राप्त कर ली और उसका शिष्य बन गया।

सन 2006 की गर्मियों में हमने बहुत सा समय साथ बिताया। वह सिर्फ मुझे देखने मेरे कार्यक्रमों में आता रहता था और एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर यात्रा करते हुए हम लोग कई विषयों पर लम्बी चर्चाएँ किया करते थे। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान उसने मुझे बताया कि एक किशोर के रूप में वह कभी भी स्त्रियों की ओर आकृष्ट नहीं होता था। इसके विपरीत पुरुषों की ओर आकृष्ट होना उसे अधिक स्वाभाविक लगता था। किसी स्त्री को देखकर ऐसी भावनाएँ उसके मन में कभी भी नहीं उमड़ती थीं। मैंने महसूस किया कि उसकी समलैंगिकता उसके लिए कितनी सहज और स्वाभाविक थी और यही उसने कहा भी: 'यही मैं हूँ, यही मेरा स्वभाव, मेरी प्रकृति है!'

लेकिन जब भी वह जर्मनी में या गुरु के अमरीका स्थित आश्रम में अपने गुरु से मिलता था, उसे हमेशा एक समस्या का सामना करना पड़ता था: उसका गुरु उससे कहता कि समलैंगिकता एक समस्या है, जिससे वह निजात पा सकता है और उसे ऐसा करना चाहिए। हिन्दू धर्म में और योग की कठिन परंपरा में इसकी मान्यता नहीं है। वह अपने गुरु को चाहता था लेकिन इस समस्या के चलते भ्रमित था और जब भी वह अपने गुरु से सुनता कि यह एक प्रकार की बीमारी है, मस्तिष्क में एक तरह का अवरोध या कुछ अनुचित सी बात है, जिसे ठीक करना ज़रूरी है और जिस पर उसे 'कुछ करना' चाहिए तो वह सहम जाता था और अपने व्यक्तित्व को लेकर उसके मन में द्वंद्व पैदा हो जाता था!

मुझे एहसास है कि गुरु की यह बात उसके भीतर कितना द्वंद्व पैदा करती रही होगी। जिस रास्ते पर वह चल पड़ा था, उस पर चलते हुए वह भीतर ही भीतर बहुत असुरक्षित महसूस करता रहा होगा क्योंकि वह ऐसा रास्ता था जो उसके एक अंश को स्वीकार ही नहीं करता था! उसे अपने गुरु की सहानुभूति और सहायता की ज़रुरत थी, उसके मार्गदर्शन की ज़रुरत थी-आखिर इसीलिए तो उसने उस गुरु का चुनाव किया था-लेकिन साथ ही वह आँख मूंदकर गुरु के हर आदेश का पालन भी नहीं करना चाहता था!

अगर वह कोशिश करता कि गुरु का आदेश मानकर अपने आकर्षण को पुरुषों की ओर से हटाकर महिलाओं की तरफ मोड़ दे तो फिर वह अपने आप के प्रति ईमानदार नहीं रह सकता था! वह संघर्ष करता रहा और मैं यह देखकर खुश हुआ था कि अंततः उसका व्यक्तित्व इस संघर्ष में विजयी होकर निकला! वह अपने सहज-स्वाभाविक प्राकृतिक सत्य को लेकर कोई समझौता नहीं कर सकता था।

लेकिन दुर्भाग्य से उस पूरे समय यह मामला उसके मस्तिष्क में उथल-पुथल मचाए रहा करता था।

और यह उसका एकमात्र संघर्ष या द्वंद्व नहीं था-मगर उसके बारे में बाद में फिर कभी।

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