समलैंगिक – अलग मगर उतने अलग भी नहीं – 4 मई 2014

2006 में यूरोप यात्रा के दौरान भी मेरी ध्यान-योग की कार्यशालाएं और व्यक्तिगत सत्र लगातार जारी रहे और हमेशा की तरह मुझे तरह-तरह के लोगों से मिलने का मौका मिला। पिछले सालों की तरह इस बार भी मैं बहुत से समलैंगिकों से मिला लेकिन इस बार मुझे उनके संगठन को, जिसे वे LGBT कम्यूनिटी कहते हैं, कुछ अधिक करीब से देखने और जानने का मौका मिला।

भारत में समलैंगिक सम्बन्ध अवैध हैं। पश्चिम के आधुनिक देशों में रहने वालों को यह मूर्खतापूर्ण और कुत्सित लग सकता है कि सेक्स जैसी चीज़ पर, जो हमारे जींस की संरचना पर आधारित होती है, इस तरह पाबन्दी लगाई जा सकती है। लेकिन यही दुखद सत्य है और जबकि समलैंगिक शब्द का प्रयोग एक अपमान की तरह किया जाता है, वे लोग जो समलिंगी पुरुष या महिला की ओर आकृष्ट हो जाते हैं, समाज से छिपते फिरते हैं। आप समलैंगिक पुरुषों के विषय में चर्चा सुन सकते हैं, आप अफवाह सुन सकते हैं कि फलां व्यक्ति समलैंगिक है लेकिन वे भी अपने संबंधों को गुप्त ही रखते हैं। महिलाओं के सन्दर्भ में बात दूसरी हो जाती है: भारत में ऐसे संबंधों का ज़िक्र तक नहीं किया जाता, जैसे किसी महिला का किसी दूसरी महिला के प्रति यौन आकर्षण संभव ही नहीं है।

जब मैं पश्चिमी देशों में गया तो मैं पहले से जानता था कि यहाँ मामला बिल्कुल दूसरा है। मैं जानता भी था और इससे मुझे कोई फर्क भी नहीं पड़ता था। जब पहले-पहल मैं देश से बाहर निकला, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वहां किसी महिला से मेरा किसी तरह का सम्बन्ध बन सकता है-और पुरुषों में मेरी कोई रूचि वैसे भी नहीं थी। और जिन्हें थी, उन पुरुषों के लिए, मैं भला क्यों परेशान होता? और अगर कोई महिला पुरुष की जगह किसी दूसरी महिला के साथ हमबिस्तर होती है तो उससे मुझे क्या फर्क पड़ता है? तो, मैंने नोटिस किया कि यहाँ समलैंगिक सम्बन्ध बहुत आम हैं और जिन शहरों में मैं गया, पाया कि वहाँ इन संबंधों को खुले आम जिया जाता है। और यह बात मेरे लिए महज एक सूचना थी, एक तथ्य था, जिसे मैंने उसी सहजता के साथ स्वीकार कर लिया जैसे यह एक तथ्य था कि कुछ लोग फल और सब्जियां हाट-बाज़ार से नहीं सुपरमार्केट से खरीदते हैं और जिसे मैंने सहजता के साथ स्वीकार कर लिया था।

मेरे व्यक्तिगत सत्रों में समलैंगिक पुरुष और महिलाएं आया करती थीं और अपनी साझेदारियों और अपने साथी के साथ सहजीवन के बारे में उनके वही प्रश्न होते थे, जो साधारण दम्पतियों द्वारा अक्सर पूछे जाते थे। जर्मनी में मेरा मेरे कई कार्यक्रमों में गाने-बजाने वाला एक संगीतज्ञ समलैंगिक था और हम लोग अच्छे, सामान्य मित्र थे। एक समलैंगिक महिला, जो हमारे अंतर्राष्ट्रीय योग प्रशिक्षण कार्यक्रम में यशेंदु और मेरे लिए अनुवाद का काम करती थी, के साथ भी मेरा काफी नजदीकी कारोबारी सम्बन्ध था और हम अच्छे मित्र भी बन गए थे। मेरे लिए यह बिल्कुल सामान्य बात थी और बहुत समय तक वह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं बनी मगर एक दिन एक समलैंगिक महिला ने, जो पहले मेरे लुनेबर्ग प्रवास के दौरान मेरे पास सलाह लेने आई थी, और जब मैं कोपेनहेगन में था तब उसने मुझे पत्र लिखा।

मेरी सलाह उसे रास आई थी और मुझे लगता है कि उसे मुझसे कुछ और प्रश्न पूछने थे और इसलिए वह एक कार्यशाला आयोजित करना चाहती थी। अपने समलैंगिक मित्रों के लिए कार्यशाला! यह एक नई बात थी लेकिन मुझे यह विचार अच्छा लगा था। और क्यों न लगता?

और इस तरह कुछ हफ़्तों बाद मैं एक बड़े से हॉल में महिला और पुरुष समलैंगिकों, उभयलिंगियों और शायद परिवर्तित-लिंगी पुरुषों और महिलाओं (transgender men and women) की भीड़ के सामने बैठा था और जीवन की सबसे जीवंत कार्यशाला संचालित कर रहा था। और उसका विषय क्या था? निश्चित ही सेक्स! यौन सम्बन्ध और उनसे जुडी समस्याएँ! आपसी, अन्तरंग सम्बन्ध, सेक्स और स्वतंत्रता, प्रेम आदि, आदि, जो विपरीतलिंगियों (यानी सामान्य लोगों) के लिए जितने रुचिकर हो सकते हैं उतने ही इन लोगों के लिए भी थे।

उन्हें कार्यक्रम में बड़ा मज़ा आया, मुझे भी आया और सच तो यह है कि वह किसी भी तरह दूसरे सामान्य कार्यक्रमों से अलग नहीं था, सब कुछ सामान्य दिनों की तरह था। तो वही प्रश्न फिर उपस्थित होता है: सेक्स और उससे सम्बंधित मामलों में छोटी-छोटी बातों पर हम हौवा क्यों खड़ा कर देते हैं?

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